रामलीला मैदान पर अन्ना का एक मुस्लिम समर्थक 

जो लोग इस आंदोलन में मुसलमानों की गैरमौजूदगी की बात कर रहे हैं। उन्हें टीवी चैनलों को ध्यान से देखना चाहिए। मेरे कैमरे पर भी कई मुसलमानों ने बुखारी की बददिमागी को नकारा है।

इस आंदोलन में दलितों की हिस्सेदारी कितनी ज्यादा है। ये रामलीला मैदान में एक बार आंख खोलकर घूमने से पता चल जाएगा। कल करोलबाग के अंबेडकर टोले से 400 दलित आए थे। सबसे मैंने कैमरे पर ये पूछा कि क्या आप लोग सिर्फ भावनाओं में बहकर यहां चले आए हैं। जबकि, तथाकथित दलित नेता तो, कह रहे हैं ये शहरी, इलीट सवर्णों का आंदोलन है। तो, सबका जवाब था- अन्ना को गरियाने वाले बेवकूफ हैं।

मैंने उनसे नाम के साथ वो, क्या कर रहे हैं। ये सब पूछा है। कुछ भी भुलावे में रखकर नहीं। ये तथाकथित एक धर्म, वर्ग, जाति के नेताओं को दुकान बंद होने का खतरा हमेशा ही सताता रहता है। और, उसमें ये बेवकूफियां भी करते रहते हैं।

5 Comments

ajit gupta · August 23, 2011 at 11:40 am

सच है इनकी दुकानदारियां बन्‍द हो जाएंगी।

डॉ. मनोज मिश्र · August 23, 2011 at 1:37 pm

आप सही कह रहे हैं,सहमत.

भुवन भास्कर · August 23, 2011 at 6:52 pm

दलितों और मुसलमानों की रहनुमाई का दावा कने वालों की आंखें जितनी जल्दी खुल जाएं, उतना अच्छा है।

आशा जोगळेकर · August 26, 2011 at 10:30 pm

बौखला गये हैं और क्या ?

प्रवीण पाण्डेय · August 27, 2011 at 3:06 pm

धीरे धीरे देश में फूट डालने वालों की दुकान बंद होगी।

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