राजनीति में
भावनाएं बड़ी महत्वपूर्ण होती हैं। और इस चुनाव की भावना ये है कि देश
भ्रष्टाचार से ऊबा है। इस चुनाव की भावना ये है कि देश में कारोबारी
होने का मतलब गलत तरीके से कमाई करने वाला हो गया है। इस चुनाव की भावना ये भी
है कि कारोबारियों से रिश्ते रखने वाले नेता भी गलत तरीके से कमाई करने
में कारोबारियों की मदद करते हैं। और इसी भावना को नरेंद्र मोदी से लेकर
राहुल गांधी और केजरीवाल तक भुनाने में लगे हुए हैं। अब इस भावनाओं को
भुनाने वाली लड़ाई में सबसे शानदार तरीके से एंट्री मारी है अपने अरविंद
केजरीवाल जी ने। एकदम झम्म से आए और ऐसा आए लगा कि सब को ले बीतेंगे।
मतलब राजनीति ऐसी साफ हो जाएगी कि लोग भ्रष्टाचार वगैरह सब भूल जाएंगे।
अरविंद बाबू ने कहा कि सब चोर हैं। सारे नेता चोर, सारे कारोबारी चोर। पहले
सारे चोर कारोबारियों की चोरी में साझेदार शीला के साथ कांग्रेस को
बताया। फिर दिल्ली की विधानसभा से जब लोकसभा का सफर तय करने का वक्त आया
तो नरेंद्र मोदी की शक्ल उन्हें ज्यादा बेहतर लगी। अरविंद ने चिल्लाना
शुरू किया कि अरे भइया ये वही नरेंद्र मोदी हैं जिनके गुजरात में
अंबानी-अडानी के अलावा कोई फलता-फूलता ही नहीं। ढेर सारे आरोप लगा दिए नरेंद्र
मोदी और अंबानी-अडानी के रिश्तों को लेकर। दबाव ऐसा बन गया कि ये
भावनाएं इसी चुनाव में गंभीर होने लगीं कि नरेंद्र मोदी ने अंबानी-अडानी
को टॉफी की कीमत यानी एक रुपये में जमीनें दे दी हैं। और अरविंद
केजरीवाल की ये भावना राहुल गांधी को भी ठीक लगीं। उन्होंने भी कह दिया कि
अडानी को नरेंद्र मोदी ने ढेर सारे फायदे नियम-कानून को ताक पर रखकर पहुंचाए
हैं। आखिरकार गौतम अडानी को मीडिया में आकर ये बताना पड़ा कि वो एक
कारोबारी हैं और उनके सभी सरकारों के साथ संबंध हैं। भले ही
नरेंद्र मोदी
की तरफ से इस पर कोई जवाब नहीं आया है।लेकिन, अडानी की कंपनी के
शेयर जिस तरह से छलांग मार रहे हैं उससे इन आरोपों की बुनियाद कुछ पक्की
नजर आने लगती है।

भारतीय जनता
पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी क्या उद्योगपतियों
को निजी फायदा पहुंचाते हैं। क्या नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री
के तौर पर दरअसल अंबानी,अडानी
के हितों को पूरा करते रहे हैं। क्या
अडानी ग्रुप के मालिक गौतम अडानी से नरेंद्र मोदी के निजी रिश्ते हैं।
यही वो सवाल हैं जिसके जरिए पहले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद
केजरीवाल और अब राहुल गांधी भी नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेने की कोशिश करते
हैं। मोदी,अडानी
के रिश्ते को पूंजीवाद के खतरनाक गठजोड़ के तौर पर भी
स्थापित किया जा रहा है। सवाल यही है कि आखिर इसमें कितनी सच्चाई है।
मोदी इस पर बोलते नहीं हैंलेकिन, अडानी ग्रुप के मालिक इसे खारिज करते
हुए कहते हैं कि अगर सरकारों के साथ मिलकर काम करना खतरनाक पूंजीवादी
गठजोड़ का संकेत हैं तो ये हो सकता है। गौतम अडानी का कहना है कि उनकी
कांग्रेस की सरकारों के साथ भी उतनी ही बनती है। और हाल ही में रॉबर्ट
वाड्रा के साथ आई उनकी तस्वीरें इसी सच को और पुख्ता करती दिखती हैं। लेकिन,
नरेंद्र मोदी
और गौतम अडानी के रिश्तों को कसने की एक और कसौटी है और
वो है शेयरबाजार। शेयर बाजार में अगर अडानी ग्रुप के शेयरों की उछल कूद
पर ध्यान दें तो साफ नजर आता है कि शेयर बाजार नरेंद्र मोदी
और गौतम
अडानी के रिश्तों में काफी मजबूती से भरोसा करता है। उसका एक छोटा सा
उदाहरण समझने के लिए 13 सितंबर
की तारीख तय कर लेते हैं। दरअसल यही वो तारीख
है जिस दिन भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री
पद का उम्मीदवार बना दिया था। और होना तो ये चाहिए था कि इससे सिर्फ
और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक बाजार में हैसियत बढ़ती।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी
का राजनीतिक भाव तेजी से बढ़ा भी। लेकिन, लगे हाथ गौतम अडानी की अगुवाई
वाले अडानी ग्रुप की कंपनियों के भाव शेयर बाजार में भी गजब तेजी से
भागने लगे।

नरेंद्र मोदी
के प्रधानमंत्री की दावेदारी का ही असर था कि13 सितंबर को अडानी
एंटरप्राइजेज की कीमत थी 141 रुपये और आज की तारीख में अडानी एंटरप्रइजेज
का एक शेयर खरीदने के लिए 471 रुपये देने होंगे। अडानी ग्रुप की दूसरी
कंपनियां इस दौड़ में शामिल हैं। मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी
के दिन यानी13 सितंबर
को अडानी पावर की कीमत थी 36 रुपये औऱ आज उस शेयर
की कीमत हो गई है 53 रुपये
से ज्यादा। कुछ ऐसी ही तरक्की हासिल की है
अडानी पोर्ट्स एंड SEZ ने
भी। 13 सितंबर
को 136 रुपये
पर बंद हुआ अडानी
पोर्ट्स एंड SEZ।
आज इसकी कीमत हो गई है 196 रुपये। अब नरेंद्र मोदी और गौतम
अडानी के रिश्ते क्या हैं ये तो मोदी या अडानी ही बता सकते हैं। लेकिन,
बाजार को इस
बात का पक्का भरोसा है कि मोदी प्रधानमंत्री हुए तो अडानी
ग्रुप की कंपनियों की तरक्की कोई नहीं रोक सकता। औऱ ये भरोसा है शेयर बाजार
में निवेश करने वाले आम आदमी का। और आम आदमी के नाम पर ही पार्टी बनाने
वाले और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाने वाले अरविंद केजरीवाल कह
रहे हैं कि नरेंद्र मोदी और अडानी मिलकर आम आदमी के हितों को
चोट पहुंचा
रहे हैं। अब सवाल यही है कि ये भावनाएं जो अरविंद केजरीवाल भड़का रहे
हैं वो कितनी सही हैं।

नरेंद्र मोदी
और गौतम अडानी के रिश्ते समझने के लिए इस मुद्दे पर हाल में हुए दो
साक्षात्कारों की चर्चा यहां जरूरी हो जाती है। पहले साक्षात्कार में नरेंद्र
मोदी से जब पूछा गया कि क्या उनकी सरकार आई तो कुछ कारोबारियों
के दबाव में फैसले लेगी। नरेंद्र मोदी का जवाब था कि मोदी जाना ही
इसलिए जाता है कि वो किसी के दबाव में नहीं आता। साथ ही मोदी ने ये भी कहा कि
वो उन नेताओं में से नहीं हैं जो कारोबारियों के साथ परदे के पीछे गलत
तरीके के रिश्ते रखें और खुले में उनसे परहेज करें। मोदी ने कहाकि वो
कारोबारियों के साथ मंच पर दिखते हैं, खुले में दिखते हैं। उसकी सीधी सी वजह
है कि वो कारोबारियों से गलत रिश्ते नहीं रखते, उनको मुनाफा देने के लिए
किसी तरह की शर्तों में ढील नहीं देते। गौतम अडानी भी मीडिया से बोले हैं।
अडानी कह रहे हैं कि अडानी ग्रुप 1993 से काम कर रहा है और देश की सभी
सरकारों के साथ उसके रिश्ते हैं। अलग-अलग राज्यों में अडानी ग्रुप
बुनियादी सुविधाओं को ठीक करने की ढेर सारी योजनाएं चला रहा है। बात ठीक है
लेकिन, जिस
तरह से शेयर बाजार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की
संभावना से अडानी ग्रुप के शेयरों में भरोसा करता जा रहा है वो किसी न किसी
रिश्ते की तरफ इशारा तो करता है। हालांकि, नरेंद्र मोदी का इतिहास उनके
दबाव में आने की बात को नकारता दिखता है। फिर वो पार्टी का दबाव हो,
पत्नी का
दबाव हो या परिवार का। तो फिर कारोबारी कहां से दबाव बना पाएंगे।
लेकिन, समय
चुनावों का है। भावनाएं बदलती तेजी से हैं इसलिए इस भावना का
भी चुनाव के समय बड़ा महत्व है कि नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो उसे कौन
चलाएगा।

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