आखिरकार
कम से कम बोलने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी बोल ही पड़े। बोल रहे हैं
कि राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का फैसला सही नहीं है। प्रधानमंत्री जी कह
रहे हैं कि ये फैसला कानूनी रूप से सही नहीं है। इसलिए जयललिता सरकार हत्यारों को
रिहा न करे। मनमोहन जी ये भी कह रहे हैं कि कोई भी सरकार, पार्टी आतंकवादियों पर
नरम न हो। हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका
से जयललिता के राजनीतिक दांव को अमल में लाने से भले रोक लग गई हो। लेकिन, क्या इससे जयललिता
का राजनीतिक दांव उलट जाएगा। अब सवाल ये भी है कि जो बात प्रधानमंत्री कह रहे हैं
वो क्या ईमानदारी से वो कह पाएंगे। क्योंकि, कांग्रेस के सारे फैसलों के तरीकों की
जानकारी तो उन्हें कम से कम पिछले दस सालों में मिल ही रही होगी। अगर इस खुले
रहस्य को मान भी लें कि फैसले कांग्रेस पार्टी में उनसे पूछकर नहीं लिए जाते रहे
हैं। तो भी कम से कम वो जानते तो रहे ही होंगे। फिर ये बयान देने का साहस वो कैसे
कर पाए होंगे कि किसी सरकार, पार्टी को आतंकवादियों के प्रति नरमी नहीं दिखानी
चाहिए। ज्यादा पुराना फैसला नहीं है जब लगातार यूपीए के लिए संकट मोचन बनी रहने
वाली उत्तर प्रदेश की सरकार ने मुसलमानों के खिलाफ आतंकवाद के मामले वापस लेने का
फरमान सुना दिया था। हालांकि, अदालत आंख पर पट्टी बांधे हुए भी ये सब देख गई और इस
पर रोक लगा दिया। ऐसे ढेर सारे मामले इससे पहले हुए हैं जब आतंकवाद पर राजनीति की
गई है। और अगर मैं ये कहूं तो ये सिर्फ आरोप नहीं साबित होने वाली बात होगी कि इस
आतंकवाद पर नरमी, गरमी दिखाने वाली राजनीति की बुनियाद खुद कांग्रेस पार्टी ने ही
तैयार की है। वही कांग्रेस पार्टी जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरदार मनमोहन सिंह
को प्रधानमंत्री बनाकर 1984 में सिखों का कत्लेआम करने वाले कांग्रेस आतंकवादियों
के सारे गुनाहों की माफी का भरोसा मन में पाल लिया था। ऐसी लंबी कहानियां सुनाई जा
सकती हैं जो कांग्रेस के आतंकवाद को पुष्पित-पल्लवित करने वाली नीतियों को सबको
समझा सकती हैं। लेकिन, अभी बात सिर्फ और सिर्फ इस मामले की यानी हमारे देश के
प्रिय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी, उम्रकैद और जेल से रिहाई
की।

दरअसल
कांग्रेस अब फंस गई है। छे दशक से एक जैसी राजनीति करती आ रही कांग्रेस ये भूल गई
कि कमजोर से कमजोर पहलवान भी एक जैसे दांव से कितनी बार पटका जा सकता है इसकी सीमा
होती है। लेकिन, कांग्रेस लगातार अपने उसी घिसे-पिटे संवेदनशील से संवेदनशील
मुद्दे पर राजनीतिक रोटी सेंकने वाले दांव से दूसरे राजनीतिक दलों को चित करती रही
है। लेकिन, अब राजनीतिक अखाड़े के पहलवान दांव समझने-चलने के मामले में उतने भी
कमजोर नहीं रहे हैं। वो कांग्रेस के एक तरह के दांव में उस्ताद हो चुके हैं। जयललिता
ने वही दांव कांग्रेस पर दे मारा है जो कांग्रेस इस्तेमाल करके राजनीतिक अखाड़े की
स्वनाम धन्य पहलवान बनी हुई थी। कांग्रेस की राजनीति पर नजर डालिए क्या हुआ। देश
के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सजा से माफी किसने दिलवाई
श्रीमती सोनिया गांधी ने। देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्यारी नलिनी से
मिलने जेल में कौन गई श्रीमती प्रियंका गांधी। ये देश के पूर्व प्रधानमंत्री की
पत्नी और पुत्री थीं जिन्होंने राजीव गांधी की हत्या को देश के प्रधानमंत्री की
हत्या से ज्यादा एक पति और पिता की हत्या बना दिया। जाहिर है फिर देश के लोगों का
किसी के पति और किसी के पिता की हत्या के मामले दखल करने का अधिकार भी घट गया।
क्योंकि, अब वो निजी मामला हो चुका था। देश के प्रधानमंत्री के हत्यारों के साथ जो
व्यवहार होना था वो व्यवहार नहीं होगा। ये तय हो गया था। वजह साफ कि निजी संबंधों
यानी पति और पिता की हत्या में मानवता घुस चुकी थी। सोनिया और प्रियंका के आगे
गांधी लगा हुआ है। गांधी मतलब कांग्रेस है। इसलिए पति और पिता के हत्यारों पर
सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी का लिया गया कोई भी फैसला कांग्रेस का फैसला माना
गया। और मानवतावादी सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी ने हमारे देश के प्रिय
प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों के खिलाफ लिए जाने वाले फैसले को मानवतावाद
की राजनीतिक चाशनी में ऐसे डुबो दिया कि जातीय उन्माद में हुए हमारे प्रधानमंत्री
के खून के धब्बे गायब हो गए। दिख रहा था तो मानवतावादी सोनिया गांधी और प्रियंका
गांधी का चेहरा और उसके साथ देश की अकेली मानवतावादी पार्टी कांग्रेस का चेहरा। ये
कांग्रेस की राजनीति थी जिसमें एक राजनीति ये कि प्रियंका गांधी के पिता के
हत्यारों से जेल में मिलने जाती हैं। सोनिया गांधी भी पति के हत्यारों को फांसी की
सजा दिलवाने के बजाय मानवतावादी चेहरा दिखाने लगती हैं। अदालत तो हर संभव बड़े
मामलों में मानवतावादी होती ही है। अदालत ने राजीव गांधी के हत्यारों की सजा फांसी
से हटाकर उम्र कैद कर दी। लोकसभा चुनाव का मौका है। जाने किस-किस आरोप में घिरी
कांग्रेस के लिए ये चुनाव बेहद निराशाजनक हैं इसलिए कभी तेलंगाना तो कभी मानतावादी
चेहरे के जरिए तमिल संवेदना हासिल करने की कोशिश कांग्रेस कर रही थी। फायदा भी
होता दिख रहा था। नलिनी, मुरुगन के परिवारवाले राहुल गांधी, प्रियंका गांधी से
माफी मांग रहे हैं।  सोनिया गांधी को भगवान
बता रहे हैं। सब कुछ ठीक था। लेकिन, तमिलनाडु की राजनीति की अम्मा जयललिता ने कांग्रेस
सोनिया माता की सारी मानवता तार-तार कर दी। जितनी तेजी में ये फैसला आया कि भारत
देश के प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी की बजाय उम्रकैद होगी। 

जयललिता
अम्मा ने जल्दी से उम्र कैद के सालों का हिसाब जोड़कर राजीव गांधी के हत्यारों की
रिहाई के आदेश दे दिए। हत्यारों को छोड़ दिया। अब राहुल गांधी जागे वैसे ही 2014 उनके
लिए इतने प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़ता दिख रहा था जिसका जवाब शायद ही कभी मिले। उस पर अम्मा
जयललिता की राजनीति ने 2014 की राजनीति के लिए कांग्रेस के दो-चार सही होते जवाबों
पर भी कट्टम-कुट्टम मारने की कोशिश कर दी। अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि आम आदमी
को भी इस देश में क्या न्याय मिलेगा। जब देश के प्रधानमंत्री के हत्यारों को भी इस
तरह छोड़ दिया गया। सच बात है देश के सबसे ताकतवर परिवार, नाम गांधी के हत्यारों
का ऐसा छूटना इस देश में बड़ा सवाल है। वही मासूमियत के साथ राहुल गांधी ने उठाया
है। लेकिन, हम भारत के लोगों के लिए तो हमारे प्रधानमंत्री के हत्यारे खुले में
घूमने वाले हैं। देश के प्रधानमंत्री के हत्यारे, साजिश करने वालों को मौत से कम
की सजा क्यों हो। ये कौन सी मानवता है। हमारे लिए ये कष्ट की बात है। लेकिन, हम
भारत के लोग सवाल कैसे खड़े कर पाएंगे क्योंकि, सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऐसी
राजनीति की बुनियाद रखने और उसे पुष्पित, पल्लवित करने का काम कांग्रेस करती
रहेगी। तो फिर एक राज्य या छोटे-छोटे हितों की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल ऐसे
राजनीति फैसले लेंगे तो सवाल हम भारत के लोग कैसे खड़ा कर पाएंगे।



3 Comments

राजीव कुमार झा · February 21, 2014 at 7:19 am

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 22/02/2014 को "दुआओं का असर होता है" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1531 पर.

प्रवीण पाण्डेय · February 21, 2014 at 11:11 am

सिद्धान्तों में एकरूपता रखनी थी, राजनीति की जगह दी जायेगी, तो हो जायेगी।

Amrita Tanmay · February 21, 2014 at 12:12 pm

सवाल तो जबाब माँगता ही रहेगा..

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