ये कठिन
था। बेहद कठिन। पिता के किसी भी उम्र में हाथ छोड़ने की स्थिति की कल्पना भी असहज
कर जाती है। इस बार जब इलाहाबाद जाना हुआ तो कुछ इसी स्थिति से मैं गुजरा। अच्छी
बात ये रही कि पिताजी अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। दिमाग में खून की बूंदों के जमने का
सफलतापूर्वक ऑपरेशन हो गया। लेकिन, इस बहाने से मैंने अपने जीवन की सबसे लंबी
यात्रा कर ली। वो यात्रा गिनने को तो 200 किलोमीटर की ही थी। रास्ता भी बेहद जाना-पहचाना
था। इलाहाबाद से लखनऊ का रास्ता। लेकिन, जब यात्रा एंबुलेंस से हो रही हो और
एंबुलेंस में बीमारी की अवस्था में पिता हो तो रास्ते से पुरानी पहचान भी जरा सा
भी ढांढस नहीं बंधा पाती। इलाहाबाद के अस्पताल से जब लखनऊ के लिए निकलना हुआ तो
सिर्फ दो ठिकाने बताए गए। ये था लखनऊ का पीजीआई या फिर सहारा का अस्पताल। दिमाग
में खून की बूंदें जमने के ऑपरेशन के लिए वैसे तो इलाहाबाद में भी कई अच्छ डॉक्टर
हैं। लेकिन, मुश्किल वही कि उसके साथ लगी सुविधाओं की कमी साफ नजर आती है। उत्तर
प्रदेश में इलाहाबाद हर तरह से राजधानी लखनऊ के बाद सबसे बेहतर मौके वाला शहर है।
वहां की ये स्थिति है। सवाल ये कि कोई भी सरकार खुद से या निजी उद्यमियों के सहयोग
ये क्या ऐसा नहीं कर सकती कि अधिकतम 100 किलोमीटर की दूरी पर स्वास्थ्य लगभग सारी
सुविधाओं वाला अस्पताल मिल सके।

इलाहाबाद
में डॉक्टर थे। लेकिन, अच्छा अस्पताल न होने से हम लोग लखनऊ के लिए निकल पड़े।
इलाहाबाद शहर से बाहर निकलते ही गंगा पुल के बाद ही लंबे जाम में हम फंस गए। करीब
डेढ़ किलोमीटर लंबा जाम। कोई खास वजह नहीं। बस मामला इतना था कि दो तरफ से आने
वाला यातायात वहां जुड़ रहा था। और इतना संभालने की सरकारी व्यवस्था और निजी समझ अब
तक नहीं बन पाई है। एंबुलेंस को रास्ता न मिलने के ढेर सारे मौके देखे हैं। उस पर
गुस्सा भी आया है। लेकिन, खुद एंबुलेंस में फंसे जब एंबुलेंस बंद करने की स्थिति
आई तो गुस्से का वो अहसास भीतर तक सालने लगा कि हम खुद को सभ्य कह सकते हैं क्या। हालांकि, बात ये भी सच ही थी कि एंबुलेंस के आगे वाला बेहद संवेदनशील भी होता तो भी वो अपनी गाड़ी हटा नहीं सकता था।
इलाहाबाद
से लखनऊ को जोड़ने वाली सड़क कम से कम हम लोगों के पढ़ने के वक्त तक राज्य की सबसे
बेहतर सड़कों में मानी जाती थी। पिताजी को एंबुलेंस में लेकर जब हम निकले तब समझ
में आया कि उत्तर प्रदेश में सड़कों का कितना बुरा हाल है। बड़े-बड़े गड्ढे हो गए
हैं इलाहाबाद को लखनऊ से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क पर। उम्मीद की किरण बस यही
है कि अब वो राष्ट्रीय राजमार्ग में शामिल हो गया है। इसलिए रायबरेली से लखनऊ की
सड़क बेहतर हो गई है।