अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसमें भारतीयों के स्थान का शानदार विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। पहली कड़ी

परिचय और अभिवादन के लिए हम दोनों ने लगभग एक साथ हाथ बढ़ाया। हथेली और उंगलियों के जोशीले स्पर्श के बाद मैने अपना हाथ को पीछे खींचना चाहा, पर उसने पकड़ ढ़ीली नहीं की। मेरे हाथ को पकड़े हुए अंगूठे से अंगूठे को क्रास किया और फिर अंगूठे से हाथ को दबाया। मैने भी उसे वैसे ही अभिवादन लौटाने की कोशिश की। यह सब एक मिनट के भीतर घटित हुआ। मुझे समझ आ गया कि यह दक्षिण अफ्रीका में स्वागत का पारंपरिक तरीका है, जो मेरे हाथ खींच लेने से अधूरा रह जाता। उसने मेरा चेहरा पढ़ लिया था कि मेरे लिए इस अभिवादन से पहला साक्षात है। उसका नाम था एविल, म्युनिशिपल कारपोरेशन में मार्केटिंग मैनेजर। दक्षिण अफ्रीका के सबसे अभिजात्य कहे जाने वाले शहर केपटाउन के एयरपोर्ट पर हमें रिसीव करने आया था।

चेहरे पर तैरती मुस्कुराहट के बीच अभिवादन की व्याख्या से उसने अपनी बात शुरू की। बोला, हाथ मिलाने का मतलब है-आप पूरे परिवार सहित कैसे है? उंगलियों को कसकर पकडऩे और अंगूठे को क्रास करने का आशय है कि पशु-पक्षी, पेड़ और फसलें कैसी हैं? हथेली के पास अंगूठे से स्पर्श से पूछा जाता है कि पड़ोसी और रिश्तेदार कैसे हैं? दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर पांव धरे कुछ मिनट गुजरे थे लेकिन अभिवादन के तरीके और परंपरा ने भीतर से मुझे बांध लिया। मुझे लगा कि मैं अपने देश के किसी गांव में आ पहुंचा हूं, जहां प्रणाम के साथ कोई पूछ रहा है कि पशु-परानी(प्राणी) कैसे हैं। समूह के हित के साथ जीने की सामाजिक व्यवस्था, प्रकृति के साथ पशु तक की चिन्ता करने वाली यह जीवन शैली तो हमारी अपनी है।

उसी क्षण यह महसूस हुआ कि इसी साझेपन के अहसास से महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका के काले लोगों को अपना स्वाभाविक मित्र समझने की दृष्टि दी होगी। गांधी के दर्शन और उदाहरण से उपजी धारा को अपने भीतर समाहित किए नेल्सन मंडेला 27 बरस जेल में गुजारते हैं। सन 1994 में जब अपने देश में लोकतंत्र की बहाली कराने में मंडेला कामयाब होते हैं तो उत्पीडऩ के आरोपी गोरों को माफ कर देते हैं।
दोनों देशों के भीतर विचार और जीवन दृष्टि को पंडित जवाहर लाल नेहरू समझते हैं और एफ्रो-एशियाई फ्रेंडशिप की बुनियाद रखते हैं। हम दोनों देशों ने अंगरेजों की गुलामी साथ-साथ झेली। अपनी आजादी के लिए हजारों-लाखों का बलिदान दिया। अब अपने दम पर खड़े होने की कोशिश कर रहें हैं। हमारे पास आजादी के बाद के 60 सालों का लंबा सफर और अनुभव है तो दक्षिण अफ्रीका के पास 14 बरस का उत्साह। दोनों में इन दिनों संगत भी ठीक बैठ रही है।

दक्षिण अफ्रीका की गलियों में भारतीय के तौर पर घूमना किसी को परदेशी का होना नहीं लगता। ब्लैक, व्हाइट, कलर्ड और इंडियन। यह देश खुद को इन्हीं चार पहचान के साथ देखता है। जोहांसबर्ग हो कि केपटाउन, किसी बाजार में आप घूमें तो हर दस दुकान के भीतर एक या दो भारतीय मिल जाएगा, जिससे आराम से आप हिंदी में बतिया सकते हैं। इनमें वे भी हैं जो चार पीढिय़ों से वहां के हो गए हैं। कुछ वे हैं जो पिछले एक दशक में दक्षिण अफ्रीका रोजगार की तलाश में गए। आपका मजा तब दोगुना हो जाएगा जब आप स्टेलिबाथ मार्केट के इस दृश्य को अक्सर दोहराए जाते पाएंगे। भारतीय नजर आने वाले एक चेहरे को मोबाइल की दुकान पर बैठे देखते ही मैने उससे कुछ जानना चाहा। दो-चार बातों के बाद वो मुस्कुराकर बोला। उूर्द या हिन्दी बोलिए ना। मैं हंस पड़ा। दोनों बरसों के बिछड़े भाई की तरह मिले।

पाकिस्तान के लाहौर शहर का अब्बासी पांच मिनट के भीतर वहां के बाजारों की इतनी जानकारियां दे देता है कि कोई कई दिन बिताए तब भी न पता चले। वह दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ होने वाले हादसों की परिस्थितियां भी बयान करता है। अब्बासी के बयान दूसरे भारतीयों की बातों से मेल खाते हैं। वहां रहने वाले भारतीयों की स्थिति के बारे में तस्वीर थोड़ी साफ होने लगती है।

गुलामी के दिनों में आजादी के लिए लड़ते हुए इंडियन और ब्लैक ज्यादा करीब रहे। कारण था कि गोरे दोनों को बराबर का अस्पृश्य-असभ्य और दास होने लायक मानते थे। जोहांसबर्ग में एक सडक़ पर लिखा गया कि ब्लैक और इंडियन नजर आएंगे तो उन्हें गोली मार दी जाएगी। आजादी के बाद निश्चित तौर पर ब्लैक लोगों में अधिकार का बोध जागा है। देश नए सिरे से बनना शुरू हुआ है। काले लोग आपको सीना तानकर खड़े मिलेंगे। उनके पास इत्मीनान है कि पुलिस और सरकार उनको ही अपराधी की तरह नहीं देखेगी। वेस्टर्न केपटाउन में एक पेइंग गेस्ट हाउस चलाने वाली श्वेत वर्णी महिला एंड्रीला इसे पुलिस का काले लोगों के पक्ष में खड़े होना बताती हैं। हालांकि दक्षिण अफ्रीका में गोरे वहां की सामाजिक व्यवस्था का एक हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए नए दक्षिण अफ्रीका को बनाने की उनकी भी जिम्मेदारी है। लेकिन, गोरे और संभ्रातजनों का समाज भारत से अभी यह नहीं सीख पाया है कि सामाजिक बदलाव के जो राजनैतिक निहितार्थ निकलते है, उसको भी सहज रूप से स्वीकारना होगा।

भारत में आजादी के बाद उच्च वर्णों के बीच बंटी रही सत्ता में जिस तरह मध्य जातियों और दलित राजनीति का जो उभार है, उसे सबने पूरे मन से स्वीकार लिया है। यही वजह है कि यहां एक सामाजिक संतुलन बदले स्वरूप में खड़ा मिलता है, वहां अलगाव की खाई घट नहीं पा रही है। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों ने तो पूरी तरह नई व्यवस्था के साथ चलने की राह पा ली है। लेकिन शासक रहे गोरे काले लोगों के साथ काम तो करते हैं मगर एक कमरे में लंच करने से परहेज करते हैं। दोनों का एक दूसरे के यहां आना-जाना तो बहुत दूर की बात है।

काले लोगों के सत्ता में आने से खुद को एक हद तक असुरक्षित महसूस करने वाले गोरे वहां के भारतीयों से तारतम्य बिठाने की कोशिश में हैं। लेकिन सामाजिक स्तर पर बहुत कुछ बदला हुआ नजर नहीं आता। वजह जो समझ आती है कि वे काले और भारतीयों के बीच किसी तरह परस्परता के बोध से अभी तक नहीं जुड़ पाए हैं। उनकी नस्लीय श्रेष्ठता का भाव पहले से पीढिय़ों को हस्तांरित होता आया है। हमने खुद इसे तब महसूस किया जब माबूला जंगल की सैर के दौरान रेंजर जेक्सन ने जंगल तो घुमाया लेकिन काफी ब्रेक का हिस्सा गोल कर दिया। शाम को हम उसके एक ब्लैक साथी से यूं ही पूछते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया। उसने बताया कि काफी ब्रेक में उसे काफी और स्नैक्स सर्व करने पड़ते। इंडियन या ब्लैक पर्यटक हो तो गोरे रेंजर ऐसा ही करते हैं।


2 Comments

Lavanyam - Antarman · August 22, 2008 at 12:44 am

दुनिया के विभिन्न प्राँतोँ के बारे मेँ जानकर हम कहाँ हैँ उसपे द्रष्टिपात करना कई नये विचारोँ को
खडा करता है ~
– अच्छा आलेख है –
– लावण्या

Udan Tashtari · August 22, 2008 at 2:17 am

एक और बेहतरीन आलेख!! जय हो!

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