शासन चलाने के साथ विपक्षी भूमिका भी अपने पास रख लेने की कला कांग्रेस से बेहतर किसी के पास नहीं है। नक्सलियों से निपटने पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम का ताजा बयान कुछ इसी नीति को पुख्ता करता है। वैसे इस काम के लिए कांग्रेस अलग-अलग समय पर अलग-अलग नेताओं को इस्तेमाल करती रहती है जो, सरकार में न होकर पार्टी में होते हैं। और, UPA 1-2 में ये भूमिका मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बखूबी निभा रहे हैं। लेकिन, नक्सल समस्या जैसे गंभीर मसले पर शायद कांग्रेसी पॉलिटिक्स सिर्फ दिग्विजय के बयानों से अपना काम नहीं साध पा रही थी इसलिए चिदंबरम को भी ये बयान देना पड़ा कि नक्सलियों के आतंक से निपटने के लिए धैर्य की जरूरत है।

ये वही चिदंबरम साहब हैं जो, नक्सलियों के खिलाफ बेहद कड़ी सैन्य कार्रवाई तक करने के पक्षधर होने की वजह से कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के निशाने पर भी आ गए थे। शायद और कोई रहा होता तो, वो अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में आ गया होता लेकिन, इकोनॉमिक टाइम्स में चिदंबरम की यानी अपनी ही सरकार की नक्सल से निपटने की रणनीति को जिस तरह से बेकार बताया था, उस पर भी सोनिया मैडम ने कुछ भी नहीं कहा। हां, चिदंबरम को जरूर अपनी कड़ी रीढ़ की हड्डी नरम करनी पड़ी। दरअसल अब कांग्रेस को ये लग रहा है कि जिस तरह से रमन सिंह आक्रामक हो रहे हैं अगर इस समय सैन्य कार्रवाई की इजाजत दी गई तो, आम लोगों में उस अभियान की सफलता का सेहरा बीजेपी के मुख्यमंत्री रमन सिंह के सिर बंध सकता है।
संसद में भी कड़े तेवर अपनाते हुए बहस के दौरान विपक्ष के नेता अरुण जेटली खुलेआम कह चुके हैं कि चिदंबरम के साथ हम हैं लेकिन, उनकी पार्टी ही नहीं है। चिदंबरम बेचारे अपनी कड़क मंत्री की छवि बनाए रखना चाहते हैं लेकिन, वो भूल गए कि कांग्रेस की पसंद गृह मंत्री पद के लिए शिवराज पाटिल जैसे ढुलमुल नेता रहे हैं वो, तो मुंबई हमले के बाद बहुत हल्ले की वजह से उनकी बलि लेना पड़ी। अब कांग्रेस को नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने वाला गृह मंत्री नहीं चाहिए। वजह साफ है लालू प्रसाद यादव ने जिस तरह से बिहार चुनाव के मद्देनजर नक्सल नीति पर गंदा बयान जारी किया है उसने कांग्रेसी रणनीतिज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस को भी तो बिहार में अपना हाल थोड़ा ठीक करना है। उस पर बंगाल में ममता और कांग्रेस की बीच गठजोड़ में पड़ी दरार और ममता को माओवादियों का पूरा साथ इन सबने कांग्रेस को रणनीति थोड़ा बदलने पर मजबूर कर दिया है। हो, सकता है इसकी वजह से अब चिदंबरम के गृह मंत्रालय की ओर से जारी होने वाले नक्सल विरोधी बड़े-बड़े विज्ञापन भी बंद कर दिए जाएं। यही कांग्रेसी पॉलिटिक्स है।
एक नहीं कई नमूने हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की फाइल गृह मंत्रालय और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच गजब फंसी हुई है। और, जब मामला खुलने पर सरकार की किरकिरी होनी शुरू हुई तो, हमेशा कांग्रेस की ओर से मुस्लिमों के बड़े नेता बनने की कोशिश करते दिखने वाले परम धर्मनिरपेक्ष दिग्विजय सिंह ने बयान जारी कर दिया कि अफजल गुरु को जल्द फांसी हो। अब अगर ये सिर्फ बयान भर नहीं है तो, ये बात चिदंबरम, शीला दीक्षित को बतानी थी। राहुल गांधी के इस प्रमुख सलाहकार की बात टालने की हिम्मत भला कौन कांग्रेसी इस समय कर सकता है।
इससे पहले बाटला हाउस एनकाउंटर पर भी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ जाकर आतंकी परिवारों तक में अपनी ही सरकार की रिपोर्ट को झुठलाकर आए थे। जांच का आश्वासन भी दिया था। ये अलग बात है कि दिल्ली आते-आते पलट गए। वाह रे कांग्रेसी पॉलिटिक्स।

11 Comments

संजय कुमार चौरसिया · May 21, 2010 at 12:23 pm

rajneeti main sab kuchh jayaj aur sahi hai

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

Suresh Chiplunkar · May 21, 2010 at 12:44 pm

कांग्रेस के लिये ये कोई नई बात नहीं है और इसीलिये 60 साल में चीन और जापान कहाँ से कहाँ पहुँच गये और इस सड़ल्ली पार्टी ने भारत की वाट लगा कर रख दी… फ़िर भी सेकुलरों(?) की प्रिय बनी हुई है, क्योंकि उससे सेकुलरों के भी "हित" सधते हैं…

anitakumar · May 21, 2010 at 12:45 pm

पता नहीं कब तक इस गंदी राजनीति के चलते मासूम जानों की बलि चढ़ती रहेगी। काश ये राजनेता ही न होते तो जिन्दगी कितने आराम से कटती

सुनील दत्त · May 21, 2010 at 1:03 pm

आपने एकदम सही लिखा हमने भी इस पर एक लेख लिखा है अपने वलाग पर कभी वक्त लगे तो जरूर पढ़ना जी।
शीर्शक है
क्या ब्लागजगत आतंकवादियों व उनके समर्थकों…

Sanjay Sharma · May 21, 2010 at 1:15 pm

ये दिग्विजय न , विश्वनाथ प्रताप सिंह का फोटो कॉपी ही है /
और ये कांग्रेस ऐसा हिजड़ा है जिसको ताली भी नहीं बजाने आती

Bhuwan Bhaskar · May 21, 2010 at 1:29 pm

बिलकुल सही बात है। ये कांग्रेस का पुराना इतिहास है। लेकिन अपनी ओछी राजनीति में यह गणित करना भूल जाते हैं कि आगे चल कर इनका बोया विषबेल क्या फल देगा? इंदिरा गांधी ने भिंडरावाले को पाल-पोस कर बड़ा किया और उसी की परिणति $खुद उन की हत्या में हुई। राजीव गांधी ने लिट्टे को बढ़ावा देने की राजनीति की। उसी का शिकार बने। अब सोनिया जी नक्सलियों के बहाने अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रही हैं। ईश्वर उन्हें सलामत रखे…

aarya · May 21, 2010 at 3:14 pm

सब गोलमाल है!
ये ६० साल की मोटी खाल है
रत्नेश त्रिपाठी

डॉ. मनोज मिश्र · May 21, 2010 at 3:55 pm

इनकी राजनीति समझ से बाहर है.

pankaj mishra · May 21, 2010 at 7:49 pm

विपक्षी भूमिका भी अपने पास रख लेने की कला कांग्रेस से बेहतर किसी के पास नहीं है। बिल्कुल सही।

काजल कुमार Kajal Kumar · May 22, 2010 at 10:23 am

दिग्विजय सिंह बेचारे फ़स्ट्रेटेड हैं. किसी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री को लगता है कि उसकी जगह केंद्र में धांस वाले कैविनेट मेत्री से कम हो ही नहीं सकती..भले ही इस तरह के पूर्व मुख्यमंत्री यह नहीं याद रखना चाहते कि उनकी हैसियत उनके ही राज्य में कुछ नहीं रही इसीलिए तो जनता ने भगा दिया. अपनी सीट जीत ली, बस यही सुकून होना चाहिये.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey · May 22, 2010 at 12:33 pm

बेचारे पण्डित चिदम्बरम! लगते नहीं कि गृह मन्त्री हैं।

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