बिहार में नकल
की तस्वीरें और वीडियो देखकर देश सोच रहा है कि बिहार ऐसे पढ़ता-बढ़ता है।
तस्वीरें दिखें, सामने आती हैं तो उत्तर प्रदेश के लोगों को भी ऐसी ही लजाना पड़ता
हो। मुझे बचपन में इलाहाबाद के गांव के एक स्कूल में ऐसे ही नकल कराने का वाकया
बड़े अच्छे से याद है। लगभग इसी तरह खिड़कियों से नकल की पुर्ची फेंकना और बीच-बीच
में, कानून व्यवस्था कायम है का अहसास दिलाने के लिए, पुलिस
वालों का डंडा लेकर नकल कराने वालों को दौड़ाना। बचपन में गर्मी की छुट्टियों में हम
करीब डेढ़-दो महीने के लिए गांव जाते थे। हम सभी भाई-बहन इलाहाबाद में रहते—पढ़ते थे।
नकल जैसी संस्थागत व्यवस्था से परिचय नहीं था। इसका मतलब ये भी नहीं है कि कभी नकल ही नहीं किया। हां, पढ़ाई के दौरान दो बार छोड़कर कभी नकल नहीं किया। एक बार वाला परिणाम अच्छा हुआ निराशाजनक रहा। एलएलबी में दाखिले के लिए की गई नकल काम नहीं आई। दोबारा वाली नकल काम आई। लेकिन, गांव में छेउंगा में जो
विद्यालय था, वहां की पढ़ाई अद्भुत तरीके से होती थी। ऐसे ही सब जिस बोरे पर बैठते
थे। उसी बोरे के नीचे पेपर में लिखे प्रश्नों के उत्तर खोजने का जुगाड़ होता था।
उसमें भी ज्यादा जुगाड़ी/प्रतिष्ठित जुगाड़ी लोगों की तो पूरी
कॉपी बाहर जाकर अंदर आ जाती थी। हां, उत्तर प्रदेश में अब बहुतायत में ये हाल नहीं
है। लेकिन, ये किसे भूला होगा कि उत्तर प्रदेश में नकल विरोधी कानून भी भारतीय
जनता पार्टी की सरकार की जड़ में मट्ठा डालने में अहम भूमिका में था। सवाल ये है
कि कौन लोग हैं जो, अपने बच्चों को इस तरह से पास कराकर डिग्री दिला देना चाहते
हैं। सवाल ये है कि कौन सी सरकार और अधिकारी हैं, जिन्हें इस संस्थागत नकल
व्यवस्था का पता नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ बिहार की समस्या है। या ये
यूपी-बिहार की समस्या है। अच्छा है कि मीडिया में बहुतायत उत्तर प्रदेश-बिहार के
लोग हैं और वो खुद की बुराई करने में पीछे नहीं रहते। तो, देश देख रहा है कि देश
कैसे पढ़ रहा है, कैसे पास हो रहा है और कैसे डिग्री ले रहा है।

लेकिन, क्या ये
समस्या सिर्फ यूपी-बिहार की है। ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश-बिहार के पढ़ने में
कमजोर लड़के दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात जाकर कैसे डॉक्टर, इंजीनियर बनकर चले
आते हैं। और ये आज से नहीं हो रहा है। इसीलिए जब इस तरह के पढ़ाकुओं में से ही कोई पढ़ाने
वाला बन जाता है तो, क्या हाल होता है। हाल ये होता है कि नकल की तस्वीरें दिखा
रहे टीवी चैनलों के कैमरे जब शिक्षकों से पूछते हैं कि गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता
दिवस में अंतर क्या है तो, वो खिसिया रहे होते हैं। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक
का नाम नहीं जानते। कई लोग तो राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बता देते हैं।
ये बिहार की या यूपी की समस्या नहीं है। ये समस्या से आंख मूंद लेने की समस्या है।
अगर ऐसा नहीं होता तो, दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, विद्यालयों में भारत
क्यों नहीं है। मेरा निजी मत इस मामले में साफ है कि डिग्री के आधार पर समाज में
प्रतिष्ठा पाने का पैमाना भी इसकी बड़ी वजह है। हां, सचिन का हाईस्कूल ही पास होना
किसी को सताता नहीं है। लेकिन, बगल का कोई बच्चा हाईस्कूल ही पास हो तो देखिए, गजब
हो जाएगा। जब बुनियाद मजबूत नहीं होगी तो, हाईस्कूल पास या फेल, किस काम का।
लेकिन, इस पर कौन सी सरकार सोच रही है। राज्य सरकारों के स्कूल आर्थिक कमजोरों को
पढ़ने का अहसास कराने और इसी तरह नकल करके डिग्री पाने की संस्था बनकर रह गई हैं।
और कमाल तो ये सरकारी स्कूलों की इसी बुनियाद को अब निजी शिक्षण संस्थाओं में नकल
कारोबार बना दिया गया है। विद्यालय विद्या के लिए नहीं डिग्री बांटकर और कारोबार
बढ़ाने के लिए खुल रहे हैं। और ये सरकार की चिंता का विषय नहीं है। इसलिए बिहार की
तस्वीरों पर हंसने की जरूरत नहीं है। ये तस्वीरें भारत की उस बेबुनियाद प्राथमिक
शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद का सजीव चित्रण है, जिस पर गांव के बहुतायत बच्चे अपनी
डिग्री की इमारत बनाते हैं। इस डिग्री के बूते उन गांव के बच्चों का देश बनाने की
व्यवस्था में हिस्सेदारी होना तो लगभग असंभव ही है। फिर कैसे गांव के उन नकल कराकर
डिग्री दिलाने वाली फैक्ट्रियों को बंद कराने के बारे में कोई चिंता कर सकता है। हां,
सालाना दूसरी खबरों की तरह इस तरह की तस्वीरों का भी रुदन हो सकता है। टीवी पर
बैठकर शिक्षा व्यवस्था पर चिंतित हुआ जा सकता है। बिहार को गरियाया जा सकता है।
लगे हाथ उत्तर प्रदेश को भी। आखिर देश की सारी अव्यवस्था की जड़ तो यूपी-बिहार ही
है। ऐसे लगता है कि यूपी-बिहार देश में नहीं होता तो, देश गजब, अद्भुत, अकल्पनीय
होता। बस हमारा काम हो गया है।

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