17 सितंबर 2015 को दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी डिग्री की वैधानिकता के लिए आंदोलनरत FDDI छात्र
सरकारी
नीतियों को बनाने वाले पता नहीं कैसे सोचते-करते हैं। अकसर यूजीसी की सूची निकलती
है, जिसके आधार पर देश में चल रहे फर्जी विश्वविद्यालयों या दूसरे शिक्षा के
केंद्रों के बारे में लोगों को पता चलता है। लेकिन, सेना की भर्ती की तरह भगदड़
वाली भीड़ इस देश में शिक्षा के लिए भी नियति बन गई है। छात्र पढ़ना चाहते हैं।
लेकिन, उनकी मजबूरी ये कि जिस संस्थान में वो दाखिला ले रहे हैं। वो संस्थान सरकार,
यूजीसी के मानकों पर सही भी है या नहीं। इसका अंदाजा पाठ्यक्रम में दाखिला लेने के
बाद और कभी-कभी तो पाठ्यक्रम पूरा कर लेने के कई साल बाद पता लगता है। फर्जी
डिग्री देने वाले निजी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों को लानत भी हम भेजते रहते हैं।
जबकि, सच्चाई ये है कि फर्जी कुछ भी है, तो उसके लिए सिर्फ और सिर्फ जिम्मेदार
सरकार ही है। अब एक और अनोखा उदाहरण देखिए। केंद्र सरकार के ही अंतर्गत चल रहे एक
संस्थान की डिग्री को केंद्र सरकार के मानव संसाधन विभाग के अंतर्गत आने वाला
यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन मान्यता ही नहीं देता है। दिल्ली से सटे नोएडा
में वाणिज्य मंत्रालय FDDI संस्थान चलाता है। इस संस्थान से रिटेल, फुटवेयर और ऐसे कई एमबीए की
डिग्री दी जाती है। अब जब वाणिज्य मंत्रालय का ही संस्थान है। मंत्रालय का ही एक
अधिकारी यहां का मुखिया होता है, तो भला किसे संदेह हो सकता है कि इस संस्थान की डिग्री
भी निजी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों की तरह फर्जी हो सकती है। लेकिन, सच्चाई यही है
कि केंद्र सरकार के संस्थान एफडीडीआई की डिग्री को यूजीसी मान्यता ही नहीं देता
है। इसके लिए यहां के छात्रों ने पढ़ाई छोड़कर पहले संस्थान में ही आंदोलन चलाया।
फिर देश में आंदोलन के लिए तय स्थान जंतर मंतर तक गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी क्या इस
विसंगति को दूर करेंगे। या फर्जी निजी विश्वविद्यालय, कॉलेज की तरह केंद्र सरकार
का भी एक फर्जी डिग्री देने वाला संस्थान यूं ही चलता रहेगा। 

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