आम
आदमी पार्टी। नाम भी कमाल के होते हैं। देश के ढेर सारे खास लोगों के इससे जुड़ने
के बाद भी ये आम आदमी पार्टी है। और इस पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल सबसे
ईमानदार हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई
को अपनी पार्टी का मूलमंत्र बताने वाले अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी का नाम
ईमानदार पार्टी क्यों नहीं रखा। अरविंद केजरीवाल अब तक ईमानदार दिख रहे हैं। इसमें
मुझे कोई संदेह नहीं दिखता। ईमानदारी भले ही सापेक्ष हो। अब मैं क्यों कह रहा हूं
कि अरविंद सापेक्ष तौर पर ही सही ईमानदार हैं। इसकी वड़ी सीधी-सीधी वजहें हैं। अरविंद
ने राजनीति करनी शुरू की है। या कहें कि राजनीति के इरादे से ही ईमानदारी की बात
करनी शुरू की। या और आगे जाकर ये कहें कि राजनीति के इरादे से ईमानदारी का अकेला
चेहरा बनने के लिए भ्रष्टाचार को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया। और आगे जाएं तो राजनीति
के लिए देश के दूसरे सारे राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचारी बताया। अब भ्रष्टाचारी
बताया तो इससे होता क्या। क्योंकि, भ्रष्टाचार तो हम सब करते हैं। लेकिन,
भ्रष्टाचार भी दाल में नमक की तरह हो। या खाने में मिर्ची की तरह हो तो चलता है। किसी
को थोड़ी कम मिर्ची वाला खाना अच्छा लगता है। किसी थोड़ा ज्यादा मिर्ची वाला खाना।
अब कोई मिर्ची ही खाकर जीवन बिताता है तो, उसे समाज या हम लोग अजीब सी नजरों से
देखते हैं। कुछ ऐसा ही भ्रष्टाचार का भी होता है। समाज थोड़े बहुत भ्रष्टाचार के
साथ रहने का आदी होता है। लेकिन, भ्रष्टाचारी को कभी मान्यता नहीं मिलती। ठीक वैसे
ही जैसे मिर्ची खाने में हो सकती है लेकिन, मिर्ची से ही खाना नहीं बन सकता। बनेगा
तो स्वस्थ शरीर नहीं बना पाएगा। और भारतीय समाज में यही हुआ। भ्रष्टाचार को गाली
देते-देते लेकिन, अपने हिस्से का भ्रष्टाचार जमकर करते हम भारतीय कब मिर्ची से ही
खाना बनाकर खाने लगे। यानी संपूर्ण भ्रष्टाचारी हो गए पता ही नहीं चला।

जाहिर
है नेता भी तो हमारे अपने ही हैं। तो उनको भी पता नहीं चला कि कब अपने चुनाव, राजनीति
भर के लिए चंदे का जुगाड़ करते-करते वो चंदाचोरी के उस्ताद बन गए। फिर जब पता भी
चला तो दिखा कि अरे इसमें तो मजा ही है। भ्रष्टाचार मजा बन गया। भ्रष्टाचार तो आम
आदमी भी कर रहा था। लेकिन, बेचारा भ्रष्टाचार की मार भी सबसे ज्यादा खा रहा था।
इसीलिए कांग्रेस सालों से अपना हाथ आम आदमी के साथ रखे हुए उससे वोट ले रही थी।
लेकिन, वो एक ही हाथ था। दूसरे हाथ से भ्रष्टाचार कर रही थी। और दबाकर कर रही थी। अरविंद
केजरीवाल का राजनीति का इरादा तो तभी बन गया रहा होगा जब वो आईआरएस यानी असिस्टेंट
कमिश्नर इनकम टैक्स की नौकरी और फिर उसे छोड़कर एनजीओ चलाने में जुटे थे। पता चल
गया होगा। सब राजनीति से होता है। पैसा राजनीति से आता है। पैसा राजनीति में जाता
भी है। इसीलिए उद्योगपति उद्योग जैसे ही राजनीति में भी पैसा लगाता है। फिर उससे
जो राजनीति बनती है। उससे राजनीति में भी पैसा आता है। उस लगाने वाले उद्योगपति के
पास भी आता है। अरविंद ने इस बात को समझा। समझा ये भी आम आदमी के नाम पर बनी
पार्टी के लिए भले ही कुछ खास लोग पैसे दे दें। लेकिन, उद्योगपति तो राजनीति के
लिए ही पैसा देता है। और आम आदमी के नाम पर वोट भले मिलता रहे। लेकिन, आम आदमी के
नाम पर बनी पार्टी में पैसा लगाकर पैसा आता नहीं दिख रहा। तो क्या करें। अरविंद ने
पार्टी तो आम आदमी के नाम पर ही बनाई। इसलिए आम आदमी के साथ दिखो। आम आदमी जैसी
हरकतें करो। मतलब आम आदमी जैसा इसलिए कि लाखों-करोड़ों के फंड वाले एनजीओ के
संचालक होने के बावजूद वैगन आर में चलो। मफलर ऐसे बांधो जैसे साइकिल, रिक्शा, बाइक
तक से चलने वाले आम लोग बांधते हैं। खांसी आए तो विधानसभा में खांसो, शपथ ग्रहण
में भी। हरकत आम आदमी जैसी इतनी ही नहीं। आम आदमी जैसी मतलब ऐसा दिखाओ कि भविष्य
की मैं नहीं सोचता। आम आदमी हूं। बड़ा छोटा आदमी हूं। ये सब इसलिए कि आम आदमी का वोट
बैंक है। आपमें से कोई ईमानदारी से ये कह सकता है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में
ईमानदारों का कोई वोट बैंक है। मुश्किल है। सापेक्ष ईमानदारों का वोट बैंक हो सकता
है। ठीक वैसे ही जैसे अरविंद केजरीवाल आज की राजनीति के सापेक्ष ईमानदार हैं।
इसीलिए
अरविंद केजरीवाल की पार्टी का नाम आम आदमी पार्टी है, ईमानदार पार्टी नहीं। अरविंद
केजरीवाल कितने ईमानदार हैं देखिए। अरविंद ने कहा था मुझे राजनीति नहीं करनी,
राजनीति में नहीं आना लेकिन, आ गए। अरविंद ने कहा था मुझे लोकपाल चाहिए। लोकपाल आ
गया। लेकिन, अब वो मेरा लोकपाल उनका लोकपाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि बिजली
की कीमतें आधी करेंगे। कीमतें आधी नहीं हुईं। उन्होंने बिल न भरने वाले आम आदमी
पार्टी के साथ खड़े लोगों के बिल माफ कर दिए। ये ईमानदारी कैसे हो सकती है।
लोकतंत्र में ये तो बड़ी बेईमानी है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी या फिर
डीएमएक, एआईएडीएमके दूसरी तरह से अपने समर्थकों को खुश करते हैं। पश्चिम बंगाल में
लंबे समय तक वामपंथी अपने कैडर के जरिए सरकार चलाता रहा। क्या ये ईमानदारी है। आशुतोष
क्या अरविंद केजरीवाल के ही पैमाने पर भ्रष्ट मुकेश अंबानी के चैनल में काम नहीं
कर रहे थे। क्या ढेर सारे लोगों की छंटनी के बाद भी आशुतोष चुप नहीं रहे। क्या ये
ईमानदारी है। इसीलिए अरविंद केजरीवाल की पार्टी का नाम ईमानदार आदमी पार्टी नहीं
है। अरविंद केजरीवाल चिल्लाते थे कि सरकार बनी तो शीला दीक्षित जेल में होंगी।
कांग्रेस-भाजपा के नेता जेल में होंगे। क्या हुआ शीला को भ्रष्ट बनाने के लिए
भाजपा से सबूत जुटाने को कह दिया। अब खुद ही अरविंद ये कहते रहे हैं कि भाजपा-कांग्रेस
मिले हुए हैं। और खुद ही दोनों से कह रहे हैं कि एक दूसरे के खिलाफ सबूत दो। मुकेश
अंबानी, वीरप्पा मोइली और दूसरे लोगों के खिलाफ गैस कीमतों में की गई एफआईआर
ईमानदारी है या सिर्फ राजनीति। क्या ईमानदारी से अरविंद इस सवाल का जवाब दे
पाएंगे। रिलायंस इंडस्ट्रीज और दूसरी कंपनियां अपने कारोबारी हितों के लिए ढेर
सारे सही-गलत काम करती होंगी। लेकिन, इस तरह की एफआईआर जो कानूनी तौर पर गिर जाएगी
ये इसलिए अरविंद ने की कि प्रतीक बना दें ईमानदारी का और राजनीतिक फायदा उठा लें।
तो ये मुकेश अंबानी के कारोबारी हितों को साधने के लिए किए गए कामों की तरह अरविंद
का राजनीतिक फायदा लेने के लिए भ्रष्ट आचरण नहीं है।
तय
ये था कि सब जनता तय करेगी। फिर इस्तीफा देने से पहले जनता से क्यों नहीं पूछा।
यानी अपनी सहूलियत के लिए जनता से पूछेंगे और सहूलियत नहीं है तो नहीं पूछेंगे। ये
कौन सी ईमानदारी हुई। अरविंद इस बार जनता से पूछने का साहस इसलिए नहीं जुटा पाए कि
लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए ये सबसे सही समय था। दिल्ली विधानसभा छोड़ो, देश की
लोकसभा पर नजर गड़ाओ। सिर्फ 20 टिकट बांटे हैं अभी आम आदमी पार्टी ने और हाल ये कि
आरोप लग रहे हैं कि टिकट पहले से ही तय थे। पैसे देकर टिकट खरीदने के भी आरोप लग
गए। तो ये ड्रामा क्यों कि दूसरी पार्टियों में हाईकमान तय करता है हमारी पार्टी
में आम आदमी तय करेगा। यहां भी तो अरविंद और उनकी कोर टीम ही सब तय कर रही है। इसीलिए
अरविंद की पार्टी का नाम ईमानदार आदमी नहीं है। हालांकि, मैं खुद इस बात से
इत्तफाक रखता हूं कि सबकुछ लोगों से पूछ पूछकर होगा तो कोई पार्टी, संगठन, संस्था
कुछ कर ही नहीं सकती। इसके लिए तो जरूरी है कि कुछ पूरी तरह से उस विचार, कार्य के
प्रति प्रतिबद्ध लोग ही फैसले लें। लेकिन, फिर ये सारी बात अरविंद ने क्यों की कि हम
सारे फैसले सड़क पर ही लेंगे। क्या इस तरह का भ्रम फैलाना ईमानदारी है। इसीलिए
अरविंद की पार्टी का नाम ईमानदार आदमी पार्टी नहीं है। अरविंद अभी भी ये कह रहे
हैं कि उनका पहला प्यार दिल्ली है। फिर दिल्ली विधानसभा में जब काम करने का मौका
था तो दिल्ली लोकसभा के जरिए जीतने की इच्छा क्यों जाग पड़ी है। आम आदमी वोट बैंक है। आम आदमी भीड़ है। आम आदमी सड़क पर निकलकर संसद वालों को चुनौती दे सकता है। आम आदमी आम को खास और खास को और खास बना सकता है। ईमानदार आदमी वोट बैंक नहीं है। ईमानदार आदमी भीड़ नहीं है। ईमानदार खुद को सबसे खास समझता है। इसीलिए वो राजनीतिक दलों के काम का नहीं है। इसीलिए कोई भी दल ईमानदारों को भरोसे पार्टी नहीं चला सकता। इसीलिए अरविंद की पार्टी का नाम आम आदमी पार्टी नहीं है। इसीलिए आम आदमी की पार्टी में अरविंद केजरीवाल अकेले ईमानदार बने रहेंगे। और उनकी ईमानदारी बचाने के लिए आम आदमी पार्टी में आम आदमी।

2 Comments

Yashwant Yash · February 20, 2014 at 10:03 am

कल 21/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !

प्रवीण पाण्डेय · February 21, 2014 at 7:50 am

रोचक उदय और उद्भव राजनैतिक दल

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