बीते एक हफ्ते से कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़
रही है। हफ्ते भर में कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करीब दस डॉलर
प्रति बैरल तक बढ़ गईं। इराक में विद्रोहियों और वहां की सेना के बीच चल रहे युद्ध
की वजह से ये सब हो रहा है। विद्रोही आतंकवादियों ने सेना के कई अहम ठिकानों,
शहरों पर कब्जा किया और जब वो तेल कुओं पर कब्जा करने लगे तो दुनिया की नींद उड़ने
लगी। खबर आई कि इराक की सबसे बड़ी रिफाइनरी पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया। इराक
की राजधानी बगदाद से दो सौ किलोमीटर दूर बैजी की ये रिफाइनरी हर दिन तीन लाख बैरल
कच्चे तेल को इस्तेमाल के लायक बनाती है। हालांकि, ये रिफाइनरी फिर से इराक की सेना
के कब्जे में आ गई है। लेकिन, अगर ये रिफाइनरी ज्यादा समय तक बंद रहती है तो इराक
के लिए घरेलू आपूर्ति पूरा करना मुश्किल हो जाएगा। और इससे दुनिया के तेल बाजार पर
भी सीधा असर पड़ेगा। दरअसल मामला यही है कि इराक में शिया सरकार और सुन्नी विद्रोहियों
के बीच जो युद्ध चल रहा है उसका सबसे बुरा असर फिलहाल इराक पर ही पड़ रहा है। अभी
तक भारत के संदर्भ में देखें तो किसी भी तरह की कोई मुश्किल हमारी आपूर्ति पर नहीं
है। लेकिन, खबरें जिस तरह से आ रही हैं उसमें भारत का कोई भी आम व्यक्ति तेल के
मामलों का विद्वान बनकर सीधे बता देता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार और देश की जनता
मुश्किल में आने वाली है। क्योंकि, इराक संकट की वजह से भारत को कच्चा तेल महंगा
मिलेगा और आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के महंगे होने के असर से
फिर से भारत के लोगों को महंगाई के दुष्चक्र में फंसना पड़ेगा। ये काफी हद तक
सच्चाई है। लेकिन, इसकी वजह सिर्फ इराक में रहा युद्ध नहीं है। इसकी असल वजह ये है
कि भारत अभी भी करीब अस्सी प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। और जिस तरह से देश में
प्याज और दूसरी जरूरी चीजों के दाम अच्छी आपूर्ति के बाद भी बढ़े हैं। ठीक वही
दुनिया में भी हो रहा है। जमाखोरों, तेल एक्सचेंज पर कच्चा तेल खरीदने, बेचने वाले
कारोबारियों ने इराक की स्थिति का फायदा उठाकर कच्चे तेल का भाव बढ़ाना शुरू कर
दिया है। इसी का असर है कि हफ्ते भर में कच्चा तेल दस डॉलर प्रति बैरल महंगा हो
गया है। कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रखने में इस तथ्य का भी कोई असर नहीं हुआ कि
दरअसल इराक में जहां से कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। वो, दक्षिणी इराक अभी भी
इराक के गृह युद्ध से अछूता है।
भारत के संदर्भ में देखें तो अब तक आपूर्ति की
कोई समस्या नहीं है। लेकिन, इराक के संकट की वजह से कच्चे तेल की कीमतें काबू से
बाहर होती दिख रही है। उसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भारत को सालाना करीब 250
मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल की जरूरत होती है और भारत सिर्फ 45 मिलियन मीट्रिक टन
कच्चा तेल ही खुद खोज, निकाल पाता है। जाहिर है जब करीब अस्सी प्रतिशत भारत की
जरूरत आयातित कच्चे तेल से पूरी होगी तो दुनिया के किसी भी कोने में, खासकर पश्चिम
एशिया के देशों सउदी अरब, इराक, कुवैत, इरान में होने वाले हल्के से संकट से भी
भारत में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस जैसी बेहद जरूरी सामानों के दाम बढ़ने की आशंका
हो ही जाएगी। इसके साथ ये भी तथ्य है कि जिस तरह से पूरे इलाके में लगातार गृह
युद्ध हो रहा है और वहां आतंकवादी और विद्रोही मजबूत हुए हैं उसमें इस इलाके में
लंबे समय तक शांति की उम्मीद रखना ही बेमानी है। इसीलिए जरूरी है कि भारत सरकार अब
देश की ऊर्जा नीति पर नए सिरे से विचार करे। भारत की सरकार को ये सोचना होगा कि कब
तक अस्सी प्रतिशत आयातित कच्चा तेल बताकर पेट्रोलियम उत्पादों की सारी समस्या के
लिए विदेशी उतार-चढ़ाव को दोष दिया जाता रहेगा। अब जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार
खुद तेल कुएं खोजने की कोशिश करे। सरकारी तेल कंपनियों के जरिए और देश की निजी
कंपनियों के जरिए। नरेंद्र मोदी की जब सरकार बनी थी तो एक उम्मीद ये भी की जा रही
थी कि पेट्रोलियम के नाम पर बने मंत्रालय को ऊर्जा मंत्रालय में बदला जाएगा। और
ऊर्जा से संबंधित सारे फैसले इसी मंत्रालय के अधीन लिए जाएंगे। हालांकि, ऐसा नहीं
हुआ। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये तो तय करना ही होगा कि देश को वो जिस
स्वाभिमान से जगाने की कोशिश चुनावों के दौरान करते रहे हैं। वो कैसे जाग पाएगा
अगर देश की सबसे बड़ी ऊर्जा की जरूरत हमारे लिहाज से नहीं दुनिया के दूसरे देशों
में होने वाली अच्छी-बुरी गतिविधियों के लिहाज से तय होगी। अच्छी बात ये है कि
यूपीए की सरकार ने जाते-जाते पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी को धीरे-धीरे लगभग
खत्म कर दिया है। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार के पास ये मौका है कि दुनिया के
बाजार के लिहाज से कीमत अदा करने के लिए तैयार भारतीयों को सस्ते पेट्रोलियम
उत्पाद देने की नीति तैयार की जाए। लेकिन, इसके लिए एक काम और करना होगा। जैसे
धीरे-धीरे करके देश की जनता को बिना सब्सिडी के जीने की आदत डाली गई है। वैसे ही देश
की कंपनियों को भी सरकार को समझाना होगा कि वो सरकार से ऐसी किसी मदद की उम्मीद न
रखें जो, देश की जनता के हितों में से काटकर उन कंपनियों का हित पूरा करती हो।
ऊर्जा में सरकार को एक कोशिश ये भी करनी चाहिए कि वो ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा
क्षेत्र में सरकारी कंपनियों को ही प्रोत्साहित करे। जहां जरूरत हो वहां निजी
कंपनियों को भी आगे बढ़ाया जाए। सरकार को नीतियों में एकरूपत रखने की भी जरूरत है।
नरेंद्र मोदी को पांच साल सरकार चलाने का मौका मिला है, पूरी ताकत मिली है। तो
इसका इस्तेमाल उन्हें देश की ऊर्जा ताकत बढ़ाने में करना होगा। अभी रिलायंस के साथ
चल रहा विवाद खत्म हो। लेकिन, इस विवाद के खत्म होने में किसी भी तरह से सरकार (सीधा
सा मतलब देश की जनता) के हितों से समझौता होता नहीं दिखना चाहिए। रंगराजन समिति के
फॉर्मूले पर नरेंद्र मोदी खुद विचार कर रहे हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी इस पर
विचार का प्रस्ताव दिया है। सरकार इस पर जल्दी से फैसला ले। अच्छा होगा कि एक
जुलाई को एक तय नीति के साथ गैस की कीमतें लागू हो जाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी और पेट्रोलियम मंत्रालय को देश, दुनिया के जानकारों की राय लेकर कम से कम
पांच साल की एक बेहतर ऊर्जा नीति तैयार करनी होगी। जिसमें कच्चा तेल, गैस, कोयला, बिजली-
सबकी आपूर्ति के मामले में ज्यादा से ज्यादा आत्मनिर्भर होने की पक्की योजना हो।
वरना बिना आपूर्ति पर असर पड़े भी इराक या दूसरे पश्चिम एशिया के देशों का एक
धमाका भारतीयों की रसोई और सड़कों, मंडियों में आग लगा देगा। और कच्चे तेल की
फिसलन पर पूरा देश फिसलता, गिरता रहेगा।

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