#KisaanVirodhiNarendramodi
इस समय ट्विटर ट्रेंड पर सबसे ऊपर चल
रहे हैं। भावनात्मक तौर पर ऐसे नारे बड़े अच्छे लगते हैं। लेकिन, ये नारे जिसके लिए लगते हैं, उसके साथ कैसा अन्याय करते हैं, ये देश के गरीबों, महिलाओं और किसानों की हालत देखकर जाना जा सकता
है। ये ट्विटर ट्रेंड भी उस समय है जब कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी
करीब दो महीने की छुट्टी बिताकर किसानों की चिंता करने लौटे हैं। किसान की फसल
खराब हुई। एक दिन भी राहुल खेत तक नहीं पहुंच सके। किसान ही राहुल के लौटने पर
जैसे उनके घर के बाहर इंतजार में बैठे थे। @narendramodi ने कृषि मंत्री सहित दूसरे कई 
मंत्रियों को खेतों तक भेजा, फसल
की बर्बादी का सही अनुमान लगाने के लिए। मुआवजा बढ़ा, मुआवजे के लिए फसल आधी की बजाए 33% खराब होने
को आधार बना दिया। सवाल ये है कि कौन है जो, किसान, गरीब को नारे से आगे नहीं निकलने देना चाहता।
ये बड़ा सवाल इसलिए भी है कि 21वीं सदी में हर नारेबाज को 6-8 लेन की सड़क पर 100
के ऊपर रफ्तार में फर्राटा भरने वाली कार चाहिए। हर किसी को चमकता, वातानुकूलित घर, दफ्तर, स्कूल चाहिए। लेकिन, हर नारा लगाने वाला किसान को बेहतर नहीं होने
देना चाहता। किसान की ऐसी चिंता क्यों होती है। कहीं ये चिंता तभी तो नहीं उभरती
जब, गलती से किसान का कुछ भला होने जा रहा
होता है। अच्छा है कि राहुल गांधी की वापसी के जश्न को कांग्रेसी किसानों की चिंता
वाली रैली बता दे रहे हैं। एफएम रेडियो पर कांग्रेस की रैली का विज्ञापन भी साफ
करता है कि कांग्रेस को चिंता सिर्फ हरियाणा के किसानों की है। वजह साफ है हरियाणा
का किसान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान ही रामलीला मैदान की भीड़ बढ़ाने में
मददगार हो सकता है। बस इसी तरह होती है किसानों की चिंता। अपनी ताकत बढ़ाने के लिए
ही राजनीतिक पार्टियां किसानों, गरीबों
का इस्तेमाल करती हैं। फिर चाहे वो कांग्रेस हो बीजेपी या दूसरी पार्टियां। इसीलिए
ट्विटर के इस ट्रेंड को आगे बढ़ाने से पहले अच्छे से सोच समझ लें।

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