कोस कोस
पर पानी बदले चार कोस पर बानी। ये हिन्दुस्तान की विविधता को लेकर कहा जाता है।
लेकिन, मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में चार कोस तो क्या कितना भी लंबा सफर तय कर
लिया जाए, एक जैसा ही है। और ये एक जैसा पानी या बानी नहीं, उससे भी बढ़कर हर हिन्दुस्तानी
की वीआईपी बनने की ललक है। और ये वीआईपी या वीवीआईपी बनने की ललक बेवजह नहीं है।
इसकी बड़ी पक्की टाइप की वजह है। क्योंकि, बिना वीआईपी या वीवीआईपी बने धौंस नहीं
जमती। यहां तक चौराहे पर खड़े ट्रैफिक वाला शायद नियम कानून से चलने वाले पर तो
फटकार लगा देगा। लेकिन, अगर वीआईपी, वीवीआईपी टाइप का कोई बिल्ला, पट्टा स्टिकर की
शक्ल में कार, SUV पर चिपका
है, तो फिर कहां किसी की मजाल। यही वो अहसास है जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक सूत्र
में बांध रखा है और इसी मसले पर देश की सारी विविधता, एकता में अद्भुत तरीके से
बदल जाती है। रक्षाबंधन पर घर जाना था। 17 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से जाना और
18 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से आना। 16 तारीख दफ्तर से लौटते बोटैनिकल गार्डन
वाले चौराहे के पहले एक स्कॉर्पियो में Press
के साथ VIP
का स्टिकर लगा देखा। लेकिन, जब उसी के नीचे VVIP का भी स्टिकर लगा
देखा, तो मुझे लगा कि ये तो अतिमहत्वपूर्ण होने के अहसास से जितना लदे हैं, इनके
इस अहसास की तस्वीर तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचनी चाहिए। आखिर 48 घंटे से भी कम समय में ऐसा राष्ट्रव्यापी वीआईपी अहसास मिला रहा है।

18 की
सुबह इलाहाबाद पहुंचे। छोटे भाई के साथ स्टेशन से घर के रास्ते में थे कि सिविललाइंस
वाले हनुमान मंदिर चौराहे के आगे एक साहब की कार दिखी। पहली नजर में भारतीय जनता
पार्टी के किसी विधानसभा टिकट के इच्छुक टाइप की कार लगी। थोड़ा नजदीक से देखने पर
समझ आया कि कोई जनकल्याण पार्टी के महासचिव हैं। नंबर प्लेट पर नजर पड़ी, तो समझ
में आया कि ये तो वकील भी हैं। हाईकोर्ट का स्टिकर जो चस्पा था। मतलब डिग्री है।
साथ ही ये भी मतलब कि वकालत अच्छी चल रही होती, तो ऐसे जन कल्याण पार्टी में क्यों
जाना पड़ता और असली झटका मुझे तब लगा, जब मैंने देखा कि वो कार तो OLACabs के साथ जुड़ी हुई
है। वाह रे वीआईपी हिन्दुस्तान।