मेरी
आदत है कि मैं हर वक्त समाज समझने की कोशिश करता रहता हूं। और ये अनायास है। इसके
लिए मुझे कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। एक दशक पहले शुरू हुई ब्लॉगिंग ने मुझे मंच
भी दे दिया। अभी मैं तिरुपति दर्शन के लिए गया था, चेन्नई होकर। संयोग से वो समय
सरकारी हिन्दी पखवाड़े के समय का था। हिन्दी दिवस के पहले नोएडा वापस आ गया।
छोटी-छोटी कई बातें मेरे ध्यान में आईं। कुछ टुकड़ों में फेसबुक, ट्विटर पर लिखा।
अब उसे समेटकर ब्लॉग पर डाल रहा हूं। जिससे ये आसानी से सब पढ़ सकें।
भीमराव
अंबेडकर की दक्षिण भारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। चेन्नई शहर से लेकर ग्रामीण इलाके
तक में चमकीले, पीले
रंग के बाबा साहेब नजर आ जाएंगे। अंबेडकर भी हिन्दुस्तान जोड़ सकते हैं। हालांकि, एक गड़बड़ हो गई है।
अंबेडकर ने दलितों को उस समय के #EliteClassके बराबर लाने के लिए जो अंग्रेजी सीखने की सलाह दी थी। दक्षिण भारत
ने उसे हिन्दी विरोध के तौर पर शायद ले लिया।
ये
चेन्नई में स्कूलों से पढ़कर लौट रहे बच्चे हैं। लेकिन, ये इतना पढ़े-लिखे
नहीं हैं कि मेरा लिखा, समझ सकें। ये अच्छा पढ़ रहे हैं। लेकिन, जैसे हम हिन्दीभाषी अपने बच्चों को हिन्दी के साथ
स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते हैं। वैसे ही ये भी तमिल के साथ अंग्रेजी पढ़ाते हैं।
इसलिए हम उत्तर भारतीयों के पढ़े-लिखे बच्चे और दक्षिण भारतीयों के पढ़े-लिखे
बच्चे जब खूब पढ़-लिख जाएंगे, तो एक दूसरे से अंग्रेजी में बात करेंगे। किसी भारतीय भाषा में नहीं।
इतनी छोटी सी बात समझने के लिए नासा का वैज्ञानिक होने की जरूरत थोड़े ना है। हो
सकता है दिल्ली के हमारे नेता ये समझते हों। और इसलिए चाहते हों कि उत्तर भारत का
हर नेता दक्षिण भारत के हर नेता से अच्छे से बात न कर सके।

Dr MGR के नाम से प्रसिद्ध मरुधर गोपालन
रामचंद्रन 3 बार
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। 1988 में भारत रत्न की उपाधि दी गई। लेकिन, भारत रत्न MGR
की मरीना बीच पर बनी समाधि में हिन्दी में कुछ
नहीं लिखा है। वो उत्तर भारतीय जो अंग्रेजी नहीं जानते, उन्हें नहीं समझ
आएगा कि ये रामचंद्रन की समाधि है। ऐसे ही चेन्नई के कई चौराहों पर वहां के बड़े
नेताओं की मूर्तियां लगी हैं, जिनके बारे में हर भारतीय को जानना चाहिए। लेकिन, कई चौराहों पर तो
सिर्फ तमिल में लिखा है। कम से कम हिन्दी में नाम और थोड़ी जानकारी लिखी रहे, तो हिन्दीभाषी भी
ऐसे महान लोगों के बारे में जान समझ सकेंगे। और ये वकालत हिन्दी की नहीं है। ये
वकालत देश के हर हिस्से के लोगों के बारे में एक दूसरे को जानने की है। और इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिन्दी देश की सभी भाषाओं के बीच संवाद की भाषा बन सकती है। वैसे एमजीआर के
बारे में एक और जानने वाली बात, उनका जन्म श्रीलंका में हुआ था।