राज ठाकरे की ठकुरैती इस समय शांत हो गई है। लेकिन, मराठी अस्मिता के नाम पर कब वो जाग जाए ये कोई नहीं जानता। मैं दैनिक जागरण अखबार में इलाहाबाद का पन्ना पढ़ रहा था। मैं खुद भी इलाहाबाद का हूं और मेरे मोहल्ले दारागंज के ही मराठियों से जुड़ी खबर है। मुझे आजतक अंदाजा नहीं था कि मेरे मोहल्ले में ही 1000 से ज्यादा मराठी रहते हैं। ये मराठी क्या सोचते हैं पढ़िए

4 Comments

Tarun · February 19, 2008 at 3:07 am

राज ठाकरे चुप इस लिया हुआ क्योंकि उसकी पार्टी के २० लोग उसकी इस बात का विरोध कर वापस शिव सेना में चले गये।

Debashish · February 19, 2008 at 8:08 am

राज ठाकरे जो इंस्टैंट पॉलिटिकल माईलेज चाहते थे वो उनको मिल गया पर अनजाने ही वे शहरी मानस के मानस का विभाजन तो कर ही गये। मुझे दुःख नहीं अगरचे मुझे महाराष्ट्र से लात मारकर निकाल दिया जाय, शायद वाकई मैं किसी स्थानीय का हक मार रहा हूं, पर मैं यही लात कस के मध्यप्रदेश की सरकार को मारुंगा जहाँ मैं पैदा हुआ और जिसने मुझे रोजगार के सही मौके नहीं दिये और महाराष्ट्र सरकार को मारुंगा जिन्होंने ये नहीं सोचा कि माईग्रेंट्स के लगातार बढ़ते इंफ्लक्स से कैसे निबटा जाय। और राज को एक लात उस मराठी परिवार के लोग ज़रूर मार आयें जिसने इस बवाल में अपनी जान गवाईं।

Gyandutt Pandey · February 19, 2008 at 11:49 am

इस देश में हर शख्स परेशान सा क्यूं है?

दिनेशराय द्विवेदी · February 19, 2008 at 12:02 pm

राज ठाकरे को दोष देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। राज नहीं होंगे तो और कोई बाज आ खड़ा होगा। इन्हें पैदा करने वाली तो वह व्यवस्था है जो बेरोजगारी का कोई समाधान नहीं खोज पा रही है। जब जब भी चुनाव आएंगे लोगों का ध्यान बंटाने के लिए यह निष्फल व्यवस्था नए नए राज और बाज खड़े कर देगी लोगों का ध्यान जनता की मूल समस्याओं से हटाने के लिए।

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