वैदिक जी के प्रताप के आगे BRICS की महिमा भी फीकी पड़ गई है। अभी तक दुनिया में इस बात की चर्चा होती रही है कि भारत के अपने पड़ोसियों के साथ तनावपूर्ण संबंध हैं। पाकिस्तान से इस तरह कि वो छोटा देश होने के बाद भी आंख दिखाता है और आतंकवादी भेजकर और सीमा पर जब तब फायरिंग करके तनाव फैलाता है। और चीन भारत से ताकतवर है तो सीधे अपनी सेना ही भारतीय  सीमा में भेज देता है। चीन के सैनिक आते हैं और भारत में मौज मस्ती करके चले जाते हैं। अब दुनिया अगर BRICS की चर्चा न कर रही हो तो कोई मुश्किल नहीं लेकिन, अगर भारतीय मीडिया में इतने महत्वपूर्ण मौके की चर्चा न हो रही हो तो ये कचोटता है। कम से कम मुझे तो ये कचोट रहा है। क्योंकि, ये मौका बन रहा है जिसमें भारत सहित गैर पश्चिमी देशों की बढ़ती ताकत नजर आ रही है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका की बराबरी की भागीदारी वाला ये मंच दुनिया की तस्वीर और देखने का नजरिया बदल रहा है। कुछ भारत-चीन के पुराने अनुभव और कुछ पश्चिमी दुनिया की चाहत का असर रहा कि भारत और चीन कभी एक दूसरे के साथ नहीं दिख सके। लेकिन, अभी समीकरण बदले हैं। और अच्छी बात ये है कि ये समीकरण तब बदल रहा है जब वामपंथी, तानाशाही शासन वाला चीन है और दक्षिणपंथी, लोकतांत्रिक शासन वाला भारत है। ये बड़ी महत्वपूर्ण घटना है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति जी जिनपिंग से मिले। और उस मौके पर जिनपिंग ने जो कहा वो दुनिया को सुनना, समझना होगा। जिनपिंग ने कहाकि अगर दोनों देश एक सुर में बोलेंगे तो दुनिया ध्यान से सुनेगी और अगर दोनों देश हाथ मिलाकर चले तो दुनिया देखेगी। और ये सिर्फ बयान भर नहीं था। सबकुछ व्यवहार में भी दिख रहा था। जी जिनपिंग यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय, क्षेत्रीय या फिर अंतर्राष्ट्रीय परिदृष्य में भारत और चीन एक दूसरे के दोस्त हैं, दुश्मन नहीं। जिनपिंग ने नरेंद्र मोदी को एपीईसी की नवंबर में होने वाली बैठक के लिए भी आमंत्रित किया। साथ ही जिनपिंग ने एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक में भी शामिल होने का न्यौता दिया। हालांकि, इसकी अगुवाई चीन कर रहा है। लेकिन, न्यौता बराबरी का है। ये खबर इस तरह से कम से कम भारतीय मीडिया में तो मुझे देखने को नहीं मिली है।


भारतीय मीडिया में अधिकतम जो दिखा है वो है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ब्रिक्स देशों के दूसरे राष्ट्राध्यक्षों की मिलते-मिलाते तस्वीरें। और एक बात जो जरा ज्यादा दिखी है जो, दिखनी भी चाहिए। वो है ब्रिक्स बैंक का बनना। इसे भी अलग-अलग तरीके से देखा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी की सरकार की ये विफलता है या सफलता कि ब्रिक्स बैंक का मुख्यालय शंघाई में होगा। दरअसल इस खबर को अच्छे से समझें तो ब्रिक्स की इस छठवीं बैठक से ब्रिक्स देशों और खासकर भारत को बहुत कुछ मिला है। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताकतवर नेतृत्व ही है कि ब्रिक्स बैंक का मुख्यालय भले शंघाई में होगा लेकिन, इसका अध्यक्ष या सीईओ भारतीय ही होगा। और वो भी पूरे पांच साल के लिए। इसके बाद ब्राजील और रूस इसकी अगुवाई करेंगे। यानी ब्रिक्स बैंक की बुनियाद रखने का काम भारत को ही करना है। भारत और चीन के बीच मुख्यालय और अध्यक्षी को लेकर काफी रस्साकशी हुई। और चीन का प्रभाव बैंक पर एकांगी न हो इसके लिए ही ये तय किया गया कि अगले दो दशक तक बैंक की अध्यक्षी चीन के पास नहीं रहेगी। साथ ही बैंक में लगने वाली पूंजी भी चीन के बराबर ही भारत और ब्राजील भी लगाएंगे। सौ अरब डॉलर के इस ब्रिक्स बैंक की योजना विश्व बैंक पश्चिम परस्त विकास नीतियों के उलट ब्रिक्स देशों की विकास की जरूरतों के लिहाज से फंडिंग का इंतजाम करना। इसे विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक फंड (आईएमएफ) की नीतियों के खिलाफ ब्रिक्स देशों का विद्रोह भी माना जा सकता है। ब्रिक्स देशों ने साफ तौर पर ये मांग की है कि आईएमएफ में विकासशील देशों को भी वोटिंग अधिकार देने होंगे। क्योंकि, बदलती विश्व अर्थव्यवस्था की ये मांग है। 2006 में ब्रिक्स की कल्पना रूस ने की थी। औपचारिक तौर पर ब्रिक्स बैठकों की शुरुआत ही 2009 में हुई थी और करीब पांच सालों में ये कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। ब्रिक्स बैंक ये पक्की बुनियाद भी तैयार करेगा जिससे अमेरिका के विकासशील देशों से स्टिमुलस वापस लेने का असर उन देशों की अर्थव्यवस्था पर न पड़े। ब्रिक्स के इन पांच देशों को आज के संदर्भ में देखना समझना बड़ा जरूरी है। ये पांच देश दुनिया की आधी आबादी हैं। आर्थिक नजरिये से देखें तो ये पांच देश मिलकर दुनिया का पांचवा हिस्सा हैं। ब्रिक्स बैंक 2016 से कर्ज देना शुरू करेगा। इसकी शुरुआत पचास अरब डॉलर से की जाएगी जिसे पांचों सदस्य देश मिलकर देंगे।


ब्रिक्स की इस छठवीं सालाना बैठक में एक और बड़ा काम हुआ है। जो पूरी तरह से पश्चिम के वर्चस्व को तोड़ता है। यूक्रेन और क्रीमिया को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देश रूस के खिलाफ खड़े हैं। उस स्थिति में ब्रिक्स के मंच पर रूस को भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का साथ मिला है। ब्रिक्स में रूस की आलोचना नहीं हुई। बल्कि इस बात को मजबूती से कहा गया कि सबकुछ शांति से तय होना चाहिए। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि अमेरिका की अगुवाई में पश्चिम का अब ये तय करना आसान नहीं होगा कि किसी देश पर वो अपनी सहूलियत से आर्थिक प्रतिबंध लगा दे। आर्थिक तौर पर कैसे दुनिया बदल रही है। इसका अंदाजा वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन के एक आंकड़े से आसानी से लगाया जा सकता है। इसके मुताबिक, दो हजार एक से दो हजार ग्यारह के दौरान ब्रिक्स देशों का निर्यात पांच गुना बढ़ा है जो, विश्व के औसत से दोगुना है। इन पांच देशों की जीडीपी चार गुना बढ़ी है। यही पांच देश हैं जो दुनिया का प्राकृतिक संसाधनों में पचास प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। ये कुछ बड़े कारण हैं जो इक्कीसवीं शताब्दी में बदलती विश्व संरचना की बुनियाद तैयार कर चुके हैं और अब इस पर इमारत खड़ी करने का काम ब्रिक्स के जरिए होगा। धीरे-धीरे ब्रिक्स में दूसरे देश भी शामिल किए जाएंगे। पिछले तीन दशक से हाशिए पर पड़ा रूस इस मंच के जरिए दुनिया में फिर से अपनी मजबूत दखल बनाना चाहेगा। कुल मिलाकर सूरज पूरब से भले उगता रहा है लेकिन, लंबे समय से दुनिया को राजनीतिक, आर्थिक रोशनी पश्चिम से ही मिलती रही है। अब ये ब्रिक्स का नया मंच दुनिया को पूरब की रोशनी की ताकत दिखाएगा।