कुछ बदलाव ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत पहले से सोचकर करना शायद ही संभव हो। यहां तक कि कई बार जो बुराई दिख रही होती है उसी में छिपे बदलाव कुछ मायनों में बड़े सुखद होते हैं। मैं ये बदलाव महसूस तो पहले भी कर रहा था। लेकिन, अभी जब बिटिया के साथ इलाहाबाद में था तो, उत्तर प्रदेश के राज्य-शहर के लिए इस अच्छे बदलाव को समझा। पहले भी मैं इलाहाबाद के रिक्शा बैंक की कहानी बता चुका हूं।

अल्लापुर के साकेत हॉस्पिटल में हमारी बिटिया हुई। रोज शाम को मैं हॉस्पिटल के सामने से शानदार पीली बसें गुजरते हुए देखता था। शंभूनाथ इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी। शानदार पीली बसों पर ऐसे ही यूनाइटेड, वाचस्पति, पुणे, एलडीसी, मदर टेरेसा और जाने कितने नामों का बैनर लगाए बच्चों को उनके घर छोड़ने ये बसें आती हैं। ये बच्चे इंजीनियरिंग, मेडिकल, पैरामेडिकल, फार्मेसी, मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे हैं। और, वो भी अपने शहर में रहकर। इन्हें अब दक्षिण भारत या देश से बाहर नहीं जाना है।

वैसे तो, शिक्षा के निजीकरण की बुराई का हल्ला ही इस पर होता है। और, ये सही भी है कि कॉलेज, इंस्टिट्यूट खोलना बाकायदा कमाई के दूसरे धंधे जैसा ही हो गया है। मायावती की सरकार हो या फिर उसके पहले की मुलायम सरकार बाकायदा रेट तय हैं कि बीएड, MBA, MBBS, BDS, BHMS, इजीनियरिंग, पैरामेडिकल कॉलेज के लिए कितना घूस खिलाना होगा। लेकिन, इस भ्रष्टाचार के बीच अच्छी बात जो निकलकर आई वो, ये कि इलाहाबाद शहर में ही करीब 19 इंजीनियरिंग कॉलेज हो गए हैं। और, दक्षिण भारत के इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेजों में दाखिले जैसा डोनेशन भी नहीं देना पड़ रहा है।

और, चूंकि इलाहाबाद के बच्चों को उनकी मनचाही शिक्षा उनके शहर में ही मिल रही है तो, उनका खर्च बचने के साथ उन्हें शहर भी नहीं छोड़ना पड़ रहा है। सरकारी राजस्व भी बढ़ रहा है। बच्चे पढ़ अपने शहर में रहे हैं तो, विस्थापन (MIGRATION) के खतरनाक दुष्परिणाम से भी वे बचेंगे। राज ठाकरे जैसों को लुच्चई का कम मौका मिलेगा। पढ़ाई पुणे या बुंगलुरू में होती है तो, बच्चा भी उसी के आसपास नौकरी खोजने लगता है। इलाहाबाद में परिवार में कुछ प्रयोजन पर ही साथ रह पाता है। अब यहां आसपास थोड़े कम पैसे की नौकरी भी वो कर सकेगा। इतना स्किल्ड वर्कर जब इलाहाबाद में ही मिलेगा तो, शायद यहां लगी कंपनियां बाहर से लोगों को नहीं बुलाना चाहेंगी और कुछ नई कंपनियां भी इधर का रुख करें।

80 के दशक में देश के विश्वविद्यालयों और सरकार संस्थानों के बाद बचे लोग रूस डॉक्टर, इंजीनियर बनने चले जाते थे। इस मौके को दक्षिण भारत और फिर महाराष्ट्र ने अच्छे से समझा। थोक के भाव में वहां इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज खुल गए। और, जनसंख्या बहुल उत्तर भारत के ही राज्यों  के बच्चे वहां मोटी फीस देकर पढ़ते थे। माता-पिता की गाढ़ी कमाई का पैसा वहां चला जाता था। विस्थापन के चलते यहां के घरों में रहने वाले लोग कम बचते थे और बच्चा दक्षिण भारत, महाराष्ट्र में जाकर वहां की प्रॉपर्टी के रेट भी बढ़ाता था।

अब बस जरूरत इस बात की है कि जहां ये प्रतिभा तैयार हो रही है। वहीं पर उसे कमाने के मौके मिल जाएं। वैसे, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार से ऐसी कोई लगाना बेवकूफी हो होगी। लेकिन, कई बार बदलाव बिना किसी सरकार और लोगों की मंशा के हो जाते हैं। वो अपने निजी लालच में समाज का कुछ भला कर जाते हैं। इसका उदाहरण ऊपर मैं दे ही चुका हूं। उम्मीद करता हूं ये बदलाव होगा और तेजी से होगा। ये बीमारू राज्य में शामिल उत्तर प्रदेश को बेहतर कर सकता है। क्षेत्रीयता की राजनीति करने वाले लोगों को सार्थक जवाब भी यही होगा।


11 Comments

संजय बेंगाणी · November 18, 2009 at 5:41 am

कुछ बदलाव सरकार पर निर्भर नहीं होते या सरकारें उन्हे रोक नहीं सकती. भारत इसी के बल पर खड़ा है. वरना नेताओं के भरोसे…. 🙂

Rakesh Singh - राकेश सिंह · November 18, 2009 at 6:03 am

बच्चे माँ बाप के साथ रह कर ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं तो इसमें बच्चे के बिगड़ने की संभावना थोड़ी कम होती है | देखने मैं तो यही आया है की IIT आदि के क्षात्र घर से दूर होने के कारण काफी उत्पाती हो जाते हैं …

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · November 18, 2009 at 7:11 am

बिल्कुल सही टिप्पणी किया आपने। स्थानीय विद्यार्थियों के साथ-साथ इलाहाबाद के इन्जीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश लेने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के अलावा मध्य प्रदेश और अन्य प्रान्तों से भी अभ्यर्थी आ रहे हैं और डिग्रियाँ बटोरकर दिल्ली लखनऊ बम्बई और विदेश का रुख भी कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन की हालत बिल्कुल ठीक नहीं है। इस दिशा में भी निजी क्षेत्र से ही उम्मीद है।

आपकी इलाहाबाद यात्रा अच्छी पोस्ट उत्पादक भी रही। बधाई।

अंशुमाली रस्तोगी · November 18, 2009 at 9:32 am

हो तो नहीं पर हां इंतजार है 'उस' बदलाव का।

Suman · November 18, 2009 at 12:13 pm

nice

MANOJ KUMAR · November 18, 2009 at 12:35 pm

निःसंदेह यह एक श्रेष्ठ रचना है।

अभिषेक ओझा · November 18, 2009 at 9:31 pm

'कुछ नई कंपनियां भी इधर का रुख करें' ये होता नहीं दिख रहा.

हिमांशु । Himanshu · November 19, 2009 at 4:54 am

सही कहा आपने – बात और भी बनेगी यदि कमाई के साधन भी उपलब्ध होने लगें ।
आलेख का आभार ।

Tiwariji · November 20, 2009 at 10:27 am

रचनाअच्छी थी साथ ही हमारी सोच के लिये एक खुराक थी उम्मीद करता हूँ ऐसी और प्रेरकरचनैए पढ़ने को मिलेन्गि

काजल कुमार Kajal Kumar · November 21, 2009 at 12:34 pm

उत्तर भारत का शिक्षा माफिया देर से जागा, पशि्चम व दक्षिण भारत की तुलना में.

Mrs. Asha Joglekar · November 22, 2009 at 2:26 am

कोई भी काम शत प्रतिशत बुरा नही होता । सही बदलाव के परिणाम भी सही ही आयेंगे ।

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