ये मांग पहले भी उठी थी। लेकिन, दिक्कत तो ये है कि अतिमानवतावादी लोग तो, अब मृत्युदंड की सजा के ही खिलाफ दुनिया में मोर्चा मजबूत कर पा रहे हैं। ऐसे में ये मांग कितनी सफल हो पाएगी, पता नहीं लेकिन, इतना तो, तय है कि दिल्ली में जिस तरह से एक लड़के के साथ रहते कुछ कुकर्मियों ने उस लड़की के साथ दुष्कर्म किया उसके बाद निजी तौर पर मुझे लगता है कि सरकार को और न्यायपालिका को इस बारे में कुछ सोचना चाहिए कि इसकी सजा क्या मौत की सजा से कम हो सकती है। न्यायपालिका भी इसलिए जोड़ रहा हूं कि सरकार कैसे सोचती/करती है। वो, तो इसी से साफ हो जाता है कि दिल्ली में हुए दुष्कर्म के मुद्दे को बीजेपी ने सदन में उठाया तो, कांग्रेसी मंत्री राजीव शुक्ला की हंसी के साथ जवाब देने की कोशिश करते जो, तस्वीरें दिखीं उसने फिर ऐसा अहसास कराया कि हमारी सरकार तो, हर समय हमारे साथ दुष्कर्म कर रही है। और, ऐसा किया ये बताने पर हंस रही है।

इसी साल जुलाई में कुछ इसी किस्म की गुवाहाटी की घटना पता नहीं कितने लोगों को याद है। बड़ा हंगामा हुआ था। लेकिन, क्या सरकार की हनक वो बन रही है कि ऐसी घटनाएं न हों। मुंबई में 2007 की आखिरी रात की पार्टी के बाद की घटना तो, क्या लोगों को याद होगी। इसमें राजनीति ऐसी जुड़ी थी कि लगा कि मराठी मानुष ऐसे क्यों सोचता है।  वैसे, बड़ी विचित्र स्थिति होती है। दुष्कर्मी पुरुषों के पौरुष की पीड़ा उनको सत्कर्मी मानकर शादी के बंधन में बंधने वाली महिलाओं या प्राकृतिक संयोग से रिश्ते में आई महिलाओं को भी उतनी ही झेलनी होती है।


2 Comments

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · December 18, 2012 at 11:42 am

फाँसी ही, और क्या?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) · December 20, 2012 at 7:30 am

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (21-12-2012) के चर्चा मंच-११०० (कल हो न हो..) पर भी होगी!
सूचनार्थ…!

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