चुनाव सिर्फ डेढ़ साल दूर रह गया है। बजट सत्र भी है। ऐसे में सरकार खुद डीजल कीमतें बढ़ाने का फैसला कैसे लेती। इसीलिए तेल कंपनियों के हवाले ये कर दिया गया। आज आधी रात से दाम बढ़ने की बात है। लेकिन, मुझे लगता है कि अगर हुई भी तो, आज सिर्फ रस्मी बढ़त होगी। खेल आगे होगा। औऱ, अच्छा ही है कम से कम बार-बार अपनी सारी असफलताओं का ठीकरा सरकार वित्तीय घाटे (सब्सिडी) के मत्थे तो नहीं मढ़ सकेगी।

फिर सब्सिडी का खेल खत्म हो जाएगा तो, सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के भी खेल पर रोक लगेगी। फॉर्च्यून 500 की लिस्ट में बनी रहेंगी क्या। जब रिलायंस इंडस्ट्रीज के रहते दूसरी किसी भी सरकारी कंपनी के किसी भी तरह से उससे आगे जाने में पसीने निकलने लगते हैं। अब सोचिए अगर तेल कंपनियों के सामने भी रिलायंस इंडस्ट्रीज आकर खड़ी हो गई तो, क्या होगा? और, मुझे तो, याद है सबको याद होगा। रिलायंस के बंद हो गए पेट्रोल पंप जब खुले थे तो, कैसे आसपास के इलाके के लोगों की आंखें चमकने लगीं थी कि अरे पेट्रोल पंप ऐसे भी होते हैं। पेट्रोल पंप तो, सरकारी तेल कंपनियों के जमाने में सिर्फ तेल भराने के लिए होते थे। हां, कुछेक जगहों पर सरकारी कंपनियों ने भी मॉडल पंप खोले जहां डीजल-पेट्रोल के साथ कुछ और इंतजाम भी किए। लेकिन, कितने पानी, हवा और गाड़ी पोंछना।

लेकिन, जब रिलायंस आया तो, हर रिलायंस पेट्रोल पंप के साथ होटल-मोटल की भी योजना थी। कई बार रिलायंस के तरफ से सरकार को यही निवेदन गया कि हमें बराबरी की लड़ाई का मौका दो। यानी अगर सब्सिडी सरकारी तेल कंपनियों को दे रहे हो तो, हमें भी दो। क्योंकि, हम भी तो, लोगों को ही डीजल-पेट्रोल बेचेंगे। लेकिन, फॉर्च्यून 500 का तमगा छिनने के डर से सरकार ये इजाजत भला कैसे देती। लेकिन, अब जब पेट्रोल-डीजल दोनों के दाम सरकार नहीं, तेल कंपनियां ही तय करेंगी तो, वो भला घाटा क्यों सहेंगी। अब सरकार अंडररिकवरी के जरिए उनकी बैलेंस शीट तो चमकाने से रही। फिर तो, अंग्रेजी में लेवल प्लेइंग फील्ड तैयार हो जाएगी।

अब इस लेवल प्लेइंग फील्ड पर कौन बेहतर खिलाड़ी साबित होगा ये बताने-समझाने की जरूरत है क्या ? याद है ना भारत हॉकी का विश्व चैंपियन था। ध्यानचंद जादूगर थे। फील्ड बदली। चैंपियन बदल गए। देखिए तेल के खेल में क्या होता है।

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