तालकटोरा स्टेडियम में राहुल गांधी

आज सुबह से देश में बड़ी बेचैनी थी। बेचैनी इस बात की नहीं थी कि  राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनेंगे या नहीं। बेचैनी इस बात को लेकर थी कि क्या-क्या नौटंकी होगी तालकटोरा स्टेडियम में। जिस तरह से कल से देश को ये दिखाने की कोशिश हो रही थी कि लोकतंत्र मतलब कांग्रेस है उसे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ तालकटोरा स्टेडियम से देश की जनता को लाइव देखने की बेचैनी थी। सुबह जब सोनिया गांधी के बोलते समय कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने राहुल-राहुल के नारे लगाने शुरू किए तो लगा कि क्रिकेट के स्टेडियम है, तालकटोरा स्टेडियम नहीं। राहुल गांधी को उठकर आना पड़ा और कहना पड़ा कि दोपहर 3.30 बजे वो अपने दिल की बात बोलेंगे। उस समय कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी को देखकर, सुनकर लगा कि वो कांग्रेस अध्यक्ष नहीं, मां की तरह व्यवहार कर रही हैं जिसके लिए बेटा कभी बड़ा नहीं होता। या यूं कहें कि बेटे को वो तब तक घर से बाहर नहीं निकलने देती जब तक तय न हो जाए कि बाहर सब ठीक है। सोनिया गांधी चाहती हैं कि किसी तरह से कांग्रेस या यूपीए की तीसरी बार सरकार बनने की नौबत आ जाए और वो सीधे युवराज को राजा बना दें। खैर राहुल के साढ़े तीन बजे के भरोसे मैं भी दिल  लगाकर बैठ गया। साढ़े तीन क्या चार बज गया। बड़ी देर से प्रयास में हूं कि राहुल जी के दिल की बात सुनूं अभी तो दिमाग वाली वो चिल्लाकर बता रहे हैं। इंतजार कर रहा हूं। 

फिर राहुल गांधी के दिल से आवाज आई 15 सीटों पर जनता से पूछकर उम्मीदवार, जनता से पूछकर घोषणापत्र। तुरंत समझ में आ गया कि अरविंद केजरीवाल क्यों कांग्रेस से आगे निकल गया। सोचिए अरविंद केजरीवाल के पास न गुलाम कार्यकर्ताओं की फौज थी ना तो राहुल गांधी की तरह कांग्रेस ने देश बनाया, 21वी सदी में पहुंचाया दुहाई देने वाले तर्क थे। अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस सरकार से लड़ाई लड़ी अब नरेंद्र मोदी से भी लड़ने का हौसला बना लिया लेकिन, अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी से लड़ने के लिए अपना तरीका अपनाया। सही गलत जो भी हो। राहुल गांधी केजरीवाल की नकल कर रहे हैं। यही है दिल की बात। अब सोचिए जब केजरीवाल की ही नकल कर रहे हैं तो केजरीवाल के पीछे ही चलेंगे ना। जब अरविंद केजरीवाल आम आदमी तक पहुंच जाएगा उसी रास्ते से ये भी बाद में पहुंचेंगे। 

तालकटोरा में  अद्भुत दृष्य था। राहुल गांधी दिल की बात बता रहे थे। राहुल गांधी पोडियम से दिल की बात बता रहे हैं। तालकटोरा स्टेडियम में नीचे कांग्रेसी कार्यकर्ता रुदन कर रहे थे। और पुराने कांग्रेसी नेता मंच पर बैठकर इस नौटंकी रुदन पर मंच पर मुस्कुरा रहे हैं। राहुल गांधी दिल से कह रहे थे लोकतंत्र एक व्यक्ति से नहीं चलता। मेरे सामने महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी सबकी तस्वीर एक झटके से घूम गई। राहल गांधी के दिल की बात सुनकर मेरे दिल ने सवाल किया कि क्या ये सारे कांग्रेसी नेता लोकतंत्र विरोधी थे। लोकतंत्र के हत्यारे थे। ये सारे नेता एक व्यक्ति थे जिनके पीछे देश खड़ा था।

मैं इससे उबर पाता कि फिर चीखती से मेरे काम में आ गई राहुल गांधी के दिल की बात। 12 सिलिंडर निकले राहुल गांधी के दिल से। मेरे मन में सवाल आया कि काश इस समय मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शक्ल देख पाता। मनमोहन जी बोलते कम है। खुले में रो भी नहीं सकते। उनके अर्थशास्त्री सिद्धांत 10 साल में कब्र में चले गए। 2004 का सुधारवादी प्रधानमंत्री आज तालकटोरा में 2014 की शुरुआत में अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों की बलि एक युवराज की ताजपोशी की वजह से चढ़ते हुए देख रहा था। राहुल गांधी का दिल दरिया हुआ जा रहा था और सामने भावनाओं का समंदर बह रहा था। मुझे तो लगा कि वो रोने भी वाले हैं लेकिन, शायद जो 500 करोड़ वाली एजेंसी थी उसने रुलाने के लिए रकम नहीं ली थी। लेकिन, इस सबके बीच मंच पर किलकारी मारती सोनिया गांधी को देखकर लगा मां … मां ही होती है। राहुल जब दिल से पूरे उत्साह से भाषण दे रहे थे तो 12 सिलिंडर वाली लाइन पर लगा कि सोनिया अब उछलकर ताली बजा देंगी।

राहुल गांधी दिल से लगातार बोल रहे थे। दिल से वो बोले कि लोकतंत्र, संसदीय परंपरा के लिए वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं बने। जो भी कांग्रेसी सांसद चुनकर आएंगे वो उन्हें चुनेंगे। इससे एक बार तो मेरे दिल को ऐसा लगा कि दूसरे दलों के लोग प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें उनके सांसद नहीं कोई और चुनता है। हां, ये बात अलग है कि कांग्रेस में सांसद बनेंगे ही तभी जब राहुल गांधी दिल से चाहेंगे और दिल हो या न हो कांग्रेसी सांसद बन गए तो उन्हें राहुल गांधी को ही चुनना पड़ेगा। संविधान ने भी सांस रोककर राहुल के दिल की ये सारी बातें सुनी। कांग्रेसी सांसद बनेंगे तो टिकट राहुल गांधी तय करेंगे, सांसद बन जाएंगे तो उन्हें राहुल गांधी को ही प्रधानमंत्री चुनना है लेकिन, राहुल गांधी पहले दावेदार नहीं बनेंगे। संविधान का सम्मान बचा रहे इसके लिए चुने कांग्रेसी सांसदों को बाध्यता होगी कि उनके नेता राहुल गांधी ही हों। बाबा साहब भी क्या सोच रहे होंगे।  

4 Comments

प्रवीण पाण्डेय · January 18, 2014 at 2:27 am

दिल से हो राजनीति हो, दिमाग से नहीं।

smt. Ajit Gupta · January 18, 2014 at 3:41 am

बाते चाहे घिसी पिटी हों लेकिन कल जज्‍बा था। लग रहा था कि 500 करोड असर दिखा रहे हैं।

काजल कुमार Kajal Kumar · January 18, 2014 at 3:56 pm

राहुल फाहुल का तो ख़ैर कुछ नहीं होना इस चुनाव में पर मुझे कल शाम 1 घंटा इनके कारण ट्रैफ़ि‍क जाम से जूझने में लगा.

dr.mahendrag · January 19, 2014 at 2:25 pm

पुराना घिसा पीटा रिकॉर्ड बजा दिया गया.एक बार फिर नयी शीशियों में वही घटया तेल मालिश हेतु बेचने की कोशिश की गयी.दबा मारा रेल बसों में ढो कर लाया गया कार्यकर्ता बीच बीच में बैठाये गए चापलूसों के साथ वाहवाह कर ने लगा. किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं मीडिया पहले से निर्देशित था ही भाषण दिखाना जरुरी था तो बाद में दो चार ठलुओं को ला बैठा जबरन बाल की खाल भी निकालनी थी मनमोहनजी का दस साल का सारा काता बिना कपास हो रहा था वे तो बेचारे ऐसे बैठे कि उठना मुश्किल हो गया.अगर यह सब निर्णय पहले लेने थे तो राहुल को कौन रोक सकता था.पर मनमोहनजी को निचा दिखा खुद को सुपर दिखा पी ऍम पद पर पदासीन करने की सोनिआ व दरबारियों की चाल क्या रंग लेरगी तेल कितना बिकेगा पटाखे कितने कैसे चलेंगे इस हेतु इंतजार करना होगा.

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