घर खरीदने का सपना हर किसी का होता है। लेकिन,
मुश्किल सबसे बड़ी यही कि महानगरों में लगातार बढ़ती कीमत से लोगों का ये सपना दूर
होता जा रहा है। 2013 बीत गया। अब सवाल ये है कि क्या घर खरीदने का सपना नए साल
में आसानी से पूरा हो पाएगा। या फिर घर की कीमतें कुछ घटेंगी। तो इसका जवाब थोड़ी
उम्मीद की रोशनी दिखाने वाला है। साल के अंत में महानगरों के रियल एस्टेट मार्केट
से जो खबरें आ रही हैं वो कुछ ऐसे ही संकेत दे रही हैं। मुंबई और दिल्ली-एनसीआर
में फिलहाल रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती साफ नजर आ रही है। मुंबई के कई इलाकों
में तेजी से कीमतें गिरी हैं। कीमत बढ़ने की बात छोड़िए दक्षिण और मध्य मुंबई के
कई इलाकों में घर की कीमतें दस प्रतिशत तक गिरी हैं। परेल, लोअर परेल और
महालक्ष्मी जैसे इलाके में जहां घर खरीदने के लिए सोचना भी मुश्किल था वहां मांग
गिरने की वजह से बिल्डरों पर दबाव है कि वो किसी भी तरह घरों को बेच सकें।
प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि
सौदेबाजी करके सस्ते में घर खरीदने के लिए ये सबसे बेहतर समय है। इसकी वजह बड़ी
साफ है। 2010 के बाद रियल एस्टेट मार्केट जब सुधरना शुरू हुआ तो बिल्डर ने 2008 की
मंदी की रिकवरी के लिए तेजी से कीमतें बढ़ाईं। अर्थव्यवस्था सुधरने के अंदेशे में
लोगों ने रियल एस्टेट मार्केट में दांव लगाया। जिन लोगों के पास एक घर थे उन्होंने
दूसरे घर खरीदकर बुरे समय के लिए निवेश समझकर छोड़ दिया। और ऐसा नहीं है कि ये हाल
सिर्फ मुंबई के पॉश इलाकों में है जहां अब जमीनें कम बची हैं। सच बात तो ये है कि
नियमों में बदलाव का फायदा उठाकर इन इलाकों में भी बिल्डरों ने ढेर सारे फ्लैट
तैयार करने शुरू कर दिए। इसलिए दक्षिण और मध्य मुंबई में तो घर के खरीददार
बमुश्किल खोजे मिल रहे हैं। इसीलिए अगर कोई डाउनपेमेंट पर पचीस प्रतिशत तक की रकम
देने के तैयार है तो उसे बिल्डर अच्छी खासी छूट देने को तैयार हैं।
मुंबई में घरों के बाजार की स्थिति कितनी खराब है
इसका अंदाजा सिर्फ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि मुंबई में करीब डेढ़ लाख फ्लैट
ऐसे हैं जो बनकर तैयार हैं लेकिन, इनको खरीदने वाला कोई नहीं है। उस पर बिल्डरों
की लागत लगातार बढ़ रही है। ब्याज दरें कम होती नहीं दिख रही हैं क्योंकि, सरकार
या रिजर्व बैंक की तरफ से ब्याज दरें घटने के फिलहाल कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। बिल्डरों
के पास फंड की कमी से वो नए प्रोजेक्ट नहीं ला पा रहे हैं। 2013 में जनवरी से
सितंबर के दौरान मुंबई में कुल 47488 फ्लैट लॉन्च हुए जो पिछले साल से 28 प्रतिशत
कम है। 2010, 2011 के लिहाज से देखें तो सीधे-सीधे नए लॉन्च आधे हो गए हैं। फंड की
कमी का दबाव बिल्डरों पर इस कदर बढ़ गया है कि इसीलिए बिल्डर जल्दी से जल्दी अपने
पूरे हो रहे प्रोजेक्ट को बेचकर कम मुनाफे पर ही काम करना ज्यादा बेहतर समझ रहे
हैं। इसीलिए इस समय घर का बाजार खरीददारों का बाजार है। ये हाल सिर्फ मुंबई के
बाजार का नहीं है। यही हाल दिल्ली-एनसीआर के बाजार का भी है। दिल्ली-एनसीआर में
हालांकि, मुंबई जैसी गिरावट की वजह नहीं बन रही है। लेकिन, दिल्ली-एनसीआर में भी
खरीददारों के लिए ये सबसे बेहतर समय है। क्योंकि, जिस दिल्ली-एनसीआर के बाजार में
हर दिन तेजी से कीमतें बढ़ रही थीं। वहां भी पूरी तरह से कीमतों की तेजी रुक गई है
ये भले न कहें लेकिन, कीमतों का बढ़ना बहुत कम हो गया है। दिल्ली-एनसीआर में भी बने
हुए ढेर सारे घर खाली पड़े हुए हैं।
नेशनल हाउसिंग बैंक का आंकड़ा रियल एस्टेट
मार्केट में कमजोरी के संकेत और पुख्ता करता है। नेशनल हाउसिंग बैंक के ने देश के
15 शहरों के आंकड़े जारी किए हैं। इसमे से 11 शहरों में घर की कीमतें गिरी हैं।
नेशनल हाउसिंग बैंक के आंकड़े भी साफ कह रहे हैं कि मुंबई में आधा प्रतिशत और
दिल्ली में डेढ़ प्रतिशत तक कीमतें गिरी हैं। जबकि, चेन्नई में घर करीब ढाई
प्रतिशत और कोलकाता में चार प्रतिशत से ज्यादा घर सस्ता हुआ है। और ये तब है जब
इसमें महंगाई के आंकड़े शामिल नहीं हैं। अगर दस प्रतिशत की औसत महंगाई जोड़ दी जाए
तो घरों की कीमत का अंदाजा लगाया जा सकता है। पूरे देश में करीब सवा करोड़ फ्लैट
बनकर तैयार हैं लेकिन, उनको खरीददार नहीं मिल रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर में जहां नोएडा
एक्सटेंशन और दिल्ली से सटे राज्यों के बाहरी हिस्सों में कम कीमत फ्लैट आने से
तेजी से बिक्री बढ़ी थी। वहां भी अब की कीमतों पर खरीददार नहीं मिल रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में 13 प्रतिशत कम नए घर बुक हुए हैं। मुंबई में ये आंकड़ा करीब 12
प्रतिशत है। जबकि, पुणे में नए घरों की बिक्री में 15 प्रतिशत की गिरावट आई है।
इन आंकड़ों का मतलब कहीं से ये नहीं है कि घरों
के बाजार में मुफ्त में आपको घर मिल जाएगा। लेकिन, इतना जरूर है कि जो घर रहने के
लिए खरीदना चाहते हैं। उनके लिए ये बेहद अच्छा समय है। क्योंकि, बिल्डर फंड की कमी
की वजह से जल्दी से जल्दी अपने घर बेचना चाहता है। और अर्थव्यवस्था में फिलहाल
अगले छे महीने तक कोई बहुत बड़ा सुधार होने की वजह नहीं दिख रही है। शेयर बाजार भी
इसी वजह से कुछ उछाल लेता है लेकिन, इक्कीस हजार का सेंसेक्स ऐसी ऊंचाई बना हुआ है
जिस पर बाजार झूल रहा है। ब्याज दरें अभी काफी ऊपर हैं जिसका नुकसान घर के
खरीददारों को भी है कि उन्हें सस्ता कर्ज नहीं मिल रहा है। लेकिन, अगर जिस तरह के
संकेत मिल रहे हैं वो बने रहे और 2014 में एनडीए की सरकार बनती है तो एक बार फिर
से शेयर बाजार के साथ रियल एस्टेट बाजार में भी तेजी आएगी। फिर तेजी से भाग रहे
घरों की कीमत पकड़ना मुश्किल हो जाएगा। यहां तक कि अगर छे महीने बाद कर्ज सस्ता भी
मिलता है तो भी इस समय घरों की कीमत में सौदेबाजी से जो फायदा खरीददारों को मिल
सकता है वो ज्यादा ही होगा। इसलिए निवेशकों के लिए भले ही ये बाजार डरावना दिख रहा
हो लेकिन, खुद के रहने के लिए घर खरीदने वालों के लिए ये बेहतर समय है। अपनी जेब,
जगह के मुताबिक घर खोजिए। सौदेबाजी कीजिए और घर खरीद लीजिए। नए साल में अपने घर
में जाने के लि 2014 बेहतर साल साबित हो रहा है।

1 Comment

प्रवीण पाण्डेय · December 16, 2013 at 3:01 pm

आजकल लोग घर बना कर डाल देते हैं, कालान्तर में उसकी कीमत बैंक में पड़े धन से अधिक तेजी से बढ़ती है।

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