अकसर ये कहा जाता है कि भारत देखना है तो भारतीय रेल के दूसरे दर्जे में सफर करो। और मुझे ये लगता है कि दुनिया, अपने अगल-बगल का समाज देखना समझना है तो जितना उसके साथ, उसके पास रह सकते हो रहो। अभी संयोग से गाड़ी सर्विसिंग के लिए गई है। तो दो दिनों से ऑटो से ऑफिस आना हो रहा है। अपनी आदत है तो बात होने लगी। ये पप्पू हैं। बिहार के हैं। पप्पू से बात शुरू हुई तो पप्पू ने बताया कि अभी तक तो हम एक बिल्डर के यहां गाड़ी चलाते थे। ऑटो तो इधर चलानी शुरू की है। अच्छी तनख्वाह मिल जाती थी। सोलह हजार रुपया महीना तनख्वाह थी। ओवरटाइम भी मिल जाता था। बिल्डर था तो उसने रहने के लिए घर भी दे रखा था। लेकिन, एक जमीन ले ली नोएडा के एक गांव में। जमीन के चक्कर में यहां आना पड़ा। अब नोएडा से मालवीय नगर तो आना जाना संभव नहीं था। एक छोटा भाई भी यहां साथ में आ गया है। वो भी ऑटो चलाता है। कुछ दिन बच्चे भी साथ में थे। लेकिन, नोएडा के गांव में रहकर बच्चे बर्बाद हो रहे थे। बदमाशी सीख रहे थे। इसलिए बच्चों को हॉस्टल में डाल दिया। इसके बाद जो लाइन पप्पू ने बोली उससे मेरे कान सुन्न हो गए। उसने बताया- महीने का बारह हजार बच्चों को पढ़ाने में जाता है। अब आखिर सबकुछ इसीलिए न कर रहे हैं कि बच्चे पढ़ लिखकर बेहतर हो जाएं। अब सोचिए देश तरक्की करेगा। देश के लोगों की कमाई बढ़ेगी। लेकिन, सबसे ज्यादा कमाएगा स्कूल चलाने वाला। निजी स्कूल चलाने वाला। क्योंकि, सरकारी स्कूल बेहतर होंगे नहीं। और निजी स्कूलों पर सरकार का कोई नियंत्रण होगा नहीं। बताइए कौन सा देश बनेगा इससे। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी इस तरफ भी ध्यान दीजिए। सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ें और सब पढ़ सकें, इतनी फीस हो। तो फिर ये अच्छे स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए आरक्षण की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। बड़ा बदलाव हो जाएगा। काम कठिन है। लेकिन, मोदी जी आप तो कठिन काम ही करते हैं। हालत तो बच्चों की फीस से मेरी भी खराब है। लेकिन, पप्पू के बच्चों की अच्छी पढ़ाई का सस्ते में इंतजाम कर दीजिए। बस। मान लेंगे देश बेहतर हो गया है।

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