ये तो तय ही रहता है कि हर अगली पीढ़ी पहले से बहुत ज्यादा स्मार्ट होती है। इसका अंदाजा भी समय-समय पर होता रहता है। मुझे अभी मौका लगा दिल्ली के द्वारका के एक इंस्टिट्यूट के छात्रों से बातचीत का। ट्रिनिटी इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज के इन हाउस सेमिनार आलेख्य 09 में गया था। जितने शानदार वहां के मास कम्युनिकेशन के बच्चों ने पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन बनाए थे उससे भी तीखे सवाल उन लोगों ने हमारे लिए तैयार कर रखे थे।

ज्यादातर सवाल ऐसे थे जिनके जवाब अगर खोज लिए जाएं तो, मीडिया की भूमिका क्या हो इसे सलीके से तय करने की गाइडलाइंस बन सकती है। खबरों के मामले में खुद पर नियंत्रण से लेकर सच का सामना और भूत-प्रेत, अंधविश्वास तक क्यों न्यूज चैनल पर दिखना चाहिए- इसका जवाब बच्चे मुझसे मांग रहे थे। सलीके से बनाए गए 5 प्रजेंटेशन में भले ही एक ही चीज कई प्रजेंटेशन में आ गई थी लेकिन, फोकस साफ था। पहले प्रजेंटेशन में मीडिया के अच्छे पहलुओं को दिखाते हुए, अंत में support media, suppport nation जैसा स्लोगन था तो, उसी के तुरंत बाद के प्रजेंटेशन में मीडिया पर दिखाई जा रही ऊल जलूल खबरों का तीखा पोस्टमार्टम था। कुल मिलाकर हमारे बाद मीडिया में आने वाले बच्चे ऐसा नहीं है कि उन सवालों से नावाकिफ हैं जिससे अभी का मीडिया जूझ रहा है- ये अच्छी बात है।

लेकिन, एक मुश्किल ये थी कि 200 से ज्यादा के मास मीडिया के छात्रों में से बमुश्किल ही 5 प्रतिशत ऐसे रहे होंगे जो, न्यूज मीडिया में आना चाह रहे थे। फिर चाहे अखबार हो या टीवी। PR, इवेंट मैनेजमेंट, क्रिएटिव, विज्ञापन- कुछ इस तरह के मीडिया में ज्यादातर बच्चे जाना चाह रहे थे। ये दुखद है और ज्यादा दुखद इसलिए है कि आने वाले बच्चों को लग रहा है कि दरअसल उन्हें न्यूज मीडिया में न्यूज करने का मौका ही नहीं मिलेगा इसलिए, वहां काम करो जहां जो, करने जा रहे हो वो, करने को मिले।

ऐसे ही मुंबई के सेमिनार में सारे बच्चों में से शायद ही कोई बिजनेस जर्नलिज्म करना चाहता था। जबकि, मुंबई के लोगों को तो, थोड़ी बहुत बिजनेस की समझ पलने-बढ़ने के साथ शहर ही दे देता है। ये भी अब साफ हो चुका है कि जनरल न्यूज चैनलों, अखबारों का भी काम अब बिना बिजनेस जर्नलिज्म के नहीं चलना। नए बच्चे कुछ सवाल चीखकर पूछते हैं जिसका जवाब देना मुश्किल होता है। कुछ वो, बिना कहे ही पूछ लेते हैं।


2 Comments

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · September 16, 2009 at 11:39 am

यह बहुत अच्छी बात है कि बच्चों ने आपको प्रभावित किया। मुश्किल यह है कि बुराई का रंग तब चढ़ता है जब असली वातावरण के बीच ये संघर्ष के लिए झोंक दिए जाते हैं। परिस्थितियाँ परिवर्तन लाती हैं हमारी सोच और व्यवहार में। इनकी सोच अच्छी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि व्यवहार भी तदनुरूप रहेगा।

Dipti · September 16, 2009 at 2:10 pm

ये तो अच्छी बात है कि बच्चे इस क्षेत्र में आने से पहले ही समझ गए हैं और सचेत हो गए है। नहीं तो हम जैसे तो बिना असलियत जाने ही इसे भली जगह समझकर आ गए थे।

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