पत्थरों में जिंदगी का अनुभव कितने लोगों ने किया होगा। लेकिन, ज्ञान सिंह के लिए ये बेहद सहज कार्य है। इतना सहज कि वो उनकी जिंदगी का अंग बन गया है। और, अब तो पत्थर ही ज्ञान सिंह की पहचान बन गए हैं। पत्थरों का मोह ही उन्हें इलाहाबाद से उदयपुर खींच ले गया। इलाहाबाद से बनारस के रास्ते पर इलाहाबाद से बाहर निकलते ही अंदावा के पास ज्ञान सिंह का गांव हैं। बनारस हिंदू युनिवर्सिटी से ही ज्ञान सिंह ने मास्टर्स इन फाइन आर्ट्स (स्कल्पचर) की डिग्री ली।

मार्बल स्कल्पचर के लिए 1996 में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले ज्ञान सिंह आजकल मुंबई में हैं। महात्मा गांधी मार्ग पर जहांगीर आर्ट गैलरी में उनकी कला का बेजोड़ नमूना देखा जा सकता है। ये प्रदर्शनी 18 फरवरी को शुरू हुई है और 24 फरवरी तक सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक चलेगी। उनकी कला के कुछ बेजोड़ नमूने मैं यहां दिखा रहा हूं। यही प्रदर्शनी दिल्ली में तानसेन मार्ग पर स्कल्पचर कोर्ट में 12 से 21 मार्च तक देखी जा सकती है।

‘Rhythm’ Pink Marble

‘Bird myth’ with fountain और ‘Emerging Form’ with fountain

‘Akchhayvateshwar’ Black Marble और ‘Head’ Black Marble

‘Melting’ Pink Marble

‘Ganesha’ Pink Marble


7 Comments

Aflatoon · February 19, 2008 at 4:33 pm

ज्ञान सिंह को प्रदर्शनी के अवसर पर हार्दिक बधाई

अविनाश वाचस्पति · February 20, 2008 at 12:54 am

मैने सोचा कि रेल वाले ज्ञान जी हैं
पर ज्ञान सिंह भी कम नहीं हैं
पत्थरों में जान डालने का इनका
अन्दाज़ हमें बेहद पसन्द आया
वे मन में मचाते हैं हल चल
ये पत्थरों पर चलाते हैं हल
इनमें भी किसान का ही है बल.

Gyandutt Pandey · February 20, 2008 at 1:22 am

यह तो अद्भुत शिल्प है। किसी महाकवि कि कविता की तरह।

Priyankar · February 20, 2008 at 6:35 am

ज्ञानजी को प्रदर्शनी के लिए बधाई!

उनके गणेश तो एकदम नए ढंग के लगे .

Anonymous · February 20, 2008 at 7:40 am

Gyan Singh per kuch bhi padhna mitti ke sungandh ka aaspass bikhar jaana hai. 20 baras ke hamarey ristey jab jis hawaley se aagey ke mod per miltey hai, hamey bahut kuch naya mil jaata hai. gyan hamesha se mujhey urja detey rahey hai. tum unsey miley aur likha, mujhey bahut-bahut accha laga.
pratap somvanshi

mamta · February 21, 2008 at 3:50 pm

वाकई बहुत ही खूबसूरत है।

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