वेद
प्रताप तो खैर इनका नाम इनके माता-पिता ने ही रखा होगा। मुझे लगता है कि इनके नाम
के आगे लगा वैदिक इन्होंने स्वयं लगाया होगा। किस उम्र में ये इतने “वैदिक”
हुए होंगे, पता नहीं। वेद प्रताप वैदिक का नाम बहुत है। मुझे तो अभी पत्रकारिता
करते ही कुल डेढ़ दशक के आसपास हुए हैं लेकिन, वैदिक जी तो कब से कर रहे हैं,
हमारे जैसे लोग तो नहीं ही बता सकते। इतना जरूर है कि वैदिक जी भी बड़े पत्रकार
हैं, ऐसी धारणा पक्की होती रही। दिल्ली आने पर किसी मौके पर इनसे मुलाकात हो गई।
उसी में शायद फोन नंबर और ईमेल लिया, दिया गया। और, ये ईमेल का आदान प्रदान वेद
प्रताप वैदिक के बारे में और ज्यादा जानने के लिए गजब का साधन साबित हुआ। हर दूसरे
चौथे वैदिक जी देश के किसी भी अखबार में या किसी दूसरी जगह पर भी जो “गंध” फैलाते
थे वो हवा मुझ तक भी उस ईमेल के जरिए पहुंच आती थी। एकाध-दो लेख तो मैंने पढ़े
लेकिन, फिर समझ में आया कि ये पढ़ने लायक बिल्कुल नहीं है। क्योंकि, वैदिक जी के
किसी लेख में कोई बहुत विश्लेषण या ऐसा कुछ तथ्य भी नहीं होता जिससे कम से कम मेरे
जैसा अल्पबुद्धि वाला पत्रकार थोड़ा बहुत अपनी बुद्धि में वृद्धि की संभावना तलाश
पाता। इसलिए मैंने उसे स्पैम किया और धीरे-धीरे उस विश्वव्यापी वैदिक गंध से मुझे
मुक्ति मिल गई। वैदिक जी की अपार क्षमता का मैं अंदाजा भी नहीं लगा पाता अगर उनके बारे में फेसबुक की कृपा से उनकी अपार प्रतिभा के बारे में पता न लगा होता। वैदिक जी जो सबसे बड़ी ताकत है कि जो लोग आजकल के कुछ पत्रकारों के लिए कहते हैं कि वो तो दलाल है, अंग्रेजी में लायजनिंग करता है, वैदिक जी उससे कहीं बहुत आगे रहे हैं। वैदिक जी ने एक साथ सभी दलों के सत्तासीन लोगों के साथ अपने निजी संबंधों को बेहद ताकतवर बनाने का गजब का नुस्खा खोज रखा है।

वैदिक जी मेरी नजर में इस देश की उस प्रजाति के लोग हैं जो, इस देश में रहते हुए
विदेशों से निजी स्तर पर अपने संबंध स्थापित करते हैं और उस आधार पर देश में
प्रतिष्ठा पाते हैं। और धीरे-धीरे उन संबंधों के स्थापित करने का सरकारी आधार भी
तैयार कर लेते हैं। वैसे इस कला में ज्यादातर माहिर पत्रकार अंग्रेजी के ही रहे
हैं। एनडीटीवी की बरखा दत्त जैसे लोग उसमें सबसे आगे पाए जाएंगे। लेकिन, हिंदी के
वैदिक जी ने जब ये किया तो गड़बड़ा गए, जो अब जाहिर हो चुका है। विकीपीडिया पर
लिखी जानकारी के मुताबिक, वैदिक जी 1944 की पैदाइश हैं जो करीब 70 साल जाकर बैठता
है। यानी वैदिक जी भी उसी जमात के हैं जिसके बारे में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी अकसर जिक्र करते हैं कि आजादी की लड़ाई में कुछ को मौका मिला और कुछ को देश
बदलने का मौका अब मिल रहा है। मुझे जो दिख रहा है कि वैदिक जी उम्र आजादी की लड़ाई
में तो शामिल होने की थी नहीं। और अब वो जो कर रहे हैं वो देश की आजादी के साथ
समझौता है। एक पत्रकार के तौर पर प्रतिष्ठा लेकर वो कितने पत्रकारीय कर्म कर रहे
हैं ये भी बड़े शोध का विषय हो सकता है। तयशुदा आतंकवादी हाफिज सईद से मुलाकात
करके अगर वो आते और उस साक्षात्कार को किसी टीवी चैनल या फिर किसी अखबार में अच्छे
से दिखाते, छपवाते तो शायद पत्रकार वेद प्रताप वैदिक के इस कार्य पर किसी को एतराज
न होता। लेकिन, सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर के साथ वो पाकिस्तान जाते हैं।
किसी जरिये से हाफिज सईद से मुलाकात का जुगाड़ बिठाते हैं और फिर पूरे देश में खुद
को सर्वाधिक प्रचार-प्रसार वाला पत्रकार साबित कर जाते हैं। ऐसा प्रचार-प्रसार की
देश की संसद में दो दिन से वही चर्चायमान हैं। और ऐसा चर्चायमान हुए कि एकदम शांत
स्वभाव के और कभी-कभी या सिर्फ चुनावी लिहाज से बोलने वाले कांग्रेस के उपाध्यक्ष
राहुल गांधी भी बोल पड़े। संसद परिसर में वो बोले कि पता लगाया जाना चाहिए कि
भारतीय दूतावास ने हाफिज से वैदिक की मुलाकात तय तो नहीं कराई। किसके इशारे पर
वैदिक हाफिज से मिले। फिर ये भी बोले कि वेद प्रताप वैदिक तो आरएसएस के आदमी हैं। हालांकि,
संघ की तरफ से तुरंत प्रतिक्रिया भी आ गई कि वैदिक कभी संघ से जुड़े नहीं रहे।
लेकिन, जब राहुल गांधी बोल चुके हों और इस विवाद में संघ का नाम जुड़ा हो तो
कांग्रेस और दूसरी कुछ विपक्षी पार्टियां वैदिक की गिरफ्तारी की मांग करने से पीछे
कैसे रहते। राहुल गांधी के ये कहने के बाद न्यूज चैनलों के लिए ये सहूलियत हो गई
कि वो वेद प्रताप वैदिक के लिए अब रामदेव के सहयोगी के अलावा “आरएसएस के आदमी” का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। 

सोचिए जो
आदमी खुद को पत्रकार बता रहा हो उसे देश का कोई भी टीवी न्यूज चैनल पत्रकार नहीं
लिख पा रहा। कुछ तो गंभीर वैदिक संकट होगा वैदिक जी के लिए पत्रकार लिखने पर। अब
मुझे लगता है कि विपक्षी पार्टियों की मांग भले नाजायज हो। लेकिन, वैदिक जी से
पूछा तो जाना ही चाहिए कि ये सब उन्होंने क्यों किया, और किसके कहने पर हाफिज सईद
का मनपरिवर्तन करने चले गए। यानी वैदिक जी की जो मंशा रही होगी, वो सब हो रहा है।
अच्छा है कि सरकार ने बहुत कड़े शब्दों में राहुल गांधी के बताए “आरएसएस के आदमी वैदिक” से पूरी तरह से किनारा कर लिया। वैदिक की
मंशा कितनी विचित्र रही होगी इसका अंदाजा लगाइए कि वैदिक-हाफिज साक्षात्कार कही
नहीं है। सिवाय कुर्सी पर बैठे हाफिज-वैदिक की एक तस्वीर के। लेकिन,
भारत-पाकिस्तान के चैनल वैदिकमय हैं। धन्य हो वैदिक जी। इस देश में एक बड़ी जमात
है जिसकी उम्र हो गई और जो किसी-किसी वजह से ढेर सारी जगहों पर रहा, पाया गया या
फिर ठेला गया। वो इसी रहने, पाए जाने और ठेले जाने को अपनी योग्यता बना ले गया है।
उसी संप्रदाय के अग्रदूत वैदिक जी हैं। अब वैदिक जी ये सब करें किसी को क्या एतराज
हो सकता है। लेकिन, उनकी इस बेहूदगी भरी प्रवृत्ति की वजह से जिस तरह से हाफिज सईद
ने पूरे देश का मजाक बनाने की कोशिश की उसके लिए तो वो दोषी हैं। और इस मामले पर
कड़ाई से उनसे पूछताछ होनी चाहिए। क्योंकि, देश जो दूसरी ढेर सारी बातों के लिए
तैयार हो रहा था, हो गया था। जिस समय देश में बात ब्रिक्स पर होनी चाहिए। जिस समय
बात इस पर होनी चाहिए थी कि महंगाई दर चार महीने के सबसे निचले स्तर पर है। जिस
समय बात इस पर होनी चाहिए थी कि सरकार विकास की प्राथमिकता कितनी तय कर पा रही है।
जिस समय बात होनी चाहिए थी कि बजट का क्या-क्या असर कहां-कहां हो रहा है। चर्चा तो
इस पर भी नहीं हो पाई कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति जी
जिनपिंग से मिले हैं। वेद प्रताप वैदिक के इस आत्मप्रतापी कृत्य की वजह से ये सब
बात पीछे रह गई। हां, टीवी चैनल जरूर लाइव हैं। वैदिक जी का ये आत्मप्रताप देश पर
भारी पड़ रहा है। इसलिए जरूरी है कि आत्मप्रतापी कृत्य को आत्मप्रलाप तक ही सीमित
रहने दिया जाए। ये इतने भूखे हैं कि किसी भी ईमेल आईडी के मिलने भर ये उसमें घुसकर
अपनी विशिष्ट वैचारिक गंध फैलात रहते हैं। इनको वही रहने दिया जाए। इससे ज्यादा
लायक ये नहीं हैं। और नरेंद्र मोदी के लिए ये सलाह कि ऐसे आत्मप्रतापी,
आत्मप्रलापी लोगों को किसी भी कीमत पर सरकार के आसपास न फटकने दें। वरना सारा
एजेंडा ही बदल जाएगा। और अच्छी बात ये कि नरेंद्र मोदी इस सलाह के पहले से ही ये
काम बड़े सलीके से कर चुके हैं।