1- सेक्स एजुकेशन से समाज में लोकतंत्र स्थापित होगा।
2- सेक्स एजुकेशन से एड्स जैसी यौन संबंधों से होने वाली बीमारियां कम होंगी।
3- सेक्स एजुकेशनछोटे बच्चों को मिलने से वो चाइल्ड अब्यूज से बच सकेंगे।

ऐसे ही कई और अच्छे लगने वाले तर्क हैं जो, सेक्स एजुकेशन की वकालत करने वाले आजकल थैली में लिए घूम रहे हैं कि कहीं कोई विरोधी मिले तो, उसके ऊपर उड़ेल दें। लेकिन, महाराष्ट्र की सरकार और विपक्ष के नेताओं के ऊपर इन तर्कों की कोई असर ही नहीं हुआ। और, वहां सेक्स एजुकेशन पर रोक लग गई। महाराष्ट्र के पीछे-पीछे कई और राज्य लग लिए और ‘एजुकेशन में सेक्स का डोज मिलाना’ इन राज्यों में बंद हो गया। इस पर रोक की शुरुआत मध्य प्रदेश सरकार ने की थी लेकिन, उस समय ये बड़ी बहस का मुद्दा नहीं बन पाया। बहसबाजों ने ये कहकर इसे एक झटके में खारिज कर दिया कि ये तो पुरातनपंथी सोच वाली बीजेपी सरकार की कारस्तानी है। लेकिन, जब देश के अकेले कॉस्मोपॉलिटन शहर मुंबई वाले राज्य महाराष्ट्र में इस पर रोक लगी तो, फिर कान खड़े होना स्वाभाविक था। सेक्स एजुकेशन के पक्ष में जो तर्क हैं वो मैंने शुरू में ही लिख दिया।

अब बात ये कि क्या ऊपर लिखी तीनों बातें सेक्स एजुकेशन से ठीक की जा सकती हैं। मुझे लगता है शायद थोड़ा बहुत। लेकिन, इसका बुरा असर (इस शब्द पर भी लोगों को ऐतराज हो सकता है) ज्यादा होता दिखता है।
सेक्स एजुकेशन से किस तरह लोकतंत्र स्थापित होगा ये बात तो किसी भी तरह से दिमाग की छन्नी के पार नहीं जाती। दूसरे तर्क में कुछ दम लगता है कि अगर बच्चों को सेक्स का पूरा ज्ञाम समय से मिल गया तो, वो यौन संबंध स्थापित करते समय अपनी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम पहले से रखेंगे जिससे उन्हें एड्स या कोई यौन रोग न हो। लेकिन, ये बात कुछ अजीब नहीं लगती है कि यौन संबंधों के बारे में बच्चों को बताने की उम्र हमारे इन समझदार लोगों को पहली क्लास से ही लगने लगती है।

दलील ये भी दी जा रही है कि टीवी-मीडिया के दूसरे माध्यमों से बच्चों को इतना कुछ देखने को मिल रहा है कि सेक्स एजुकेशन से बच्चों को दूर रखना गलत होगा। तर्क य़े भी है कि पोर्न फिल्में – बाजार में– खुलेआम इंटरनेट पर उपलब्ध हैं फिर बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने में हर्ज क्या है। इसी तर्क के बाद मेरा कड़ा एतराज शुरू होता है – क्या सेक्स एजुकेशन के नाम पर बच्चों को सेक्स परोसने- सेक्स करने की कला सिखाने की तैयारी हो रही है। क्या तैयारी इस बात की हो रही है कि पांच-छे साल के बच्चों को सेक्स एजुकेशन इस तरह दिया जाएगा कि दस-बारह साल का होते-होते उन्हें सेक्स कला की जरूरत पड़ जाए। और, वो यौन रोगों से सुरक्षित रहने के जरिए के बारे में बेहतर जान पाएं।

सेक्स एजुकेशन की वकालत करने वाले तर्क ये भी देते हैं कि समाज में जितना खुलापन होगा वो बेहतर है। क्या खुलापन सेक्स एजुकेशन से ही हो सकता है। लड़का-लड़की शारीरिक संरचना में अलग होते हैं इसलिए जरूरी है कि उन्हें एक दूसरे से व्यवहार के तरीके बताए जाएं। क्या अब तक बच्चों को इस बात का अहसास नहीं होता था। क्या वो परिवार के बीच बड़े होते-होते ये सब नहीं जान जाते थे। फिरउन्हें बचपन में ही बड़ा कर देने की क्या जरूरत है।

तथाकथित प्रगतिशील लोगों के पास एक और बड़ा तर्क ये आ गया है कि बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने से उन्हें अच्छे और बुरे स्पर्श की पहचान हो सकेगी जिससे चाइल्ड अब्यूज के मामले रोके जा सकेंगे। अब इन नामसझ लोगों को कौन समझाए कि जिस उम्र के बच्चों के साथ कोई बड़ा गंदा व्यवहार करता है उस समय वो ऐसे स्पर्श को समझकर भी क्या कर पाएगा। और, मुझे लगता है कि यहां तो, सीखने की जरूरत बड़ों को है।

कुल मिलाकर सेक्स एजुकेशन पर हो रहे हो हल्ले की असली वजह में अगर जाएं तो, वो है सेक्स एजुकेशन को सेक्स आर्ट बनाने की कोशिश। मुझे नहीं लगता कि किसी को इस बात पर एतराज होगा कि बच्चों को ये सिखाया जाए कि सलीके से कैसे कपड़े पहनें कि शरीर को कोई अंग भद्दा न दिखे । शरीर विज्ञान की पूरी जानकारी तो हर किसी के लिए जरूरी है। बस उम्र के साथ जरूरी सेक्स ज्ञान हो तो ठीक। और, बच्चों को अभी भी बॉयोलॉजी विषय के जरिए नौवीं-दसवीं क्लास में सब कुछ समझाने की कोशिश बहुत पहले से ही है।

इसलिए, पहली क्लास से ही बच्चों को सेक्स की कला सिखाने की कोशिश करने वालों से मेरी गुजारिश है कि बच्चों को बचपन का पूरा मजा लेने के बाद ही बड़ा होने दीजिए। उन्हें सेक्स का विज्ञान सही उम्र के साथ ही सीखने दीजिए। इसके कुछ कुछ बेहतर तरीके हों तो वो सुझाएं। लेकिन, कृपा करके प्रगतिशील होने के चक्कर में बच्चों का बचपन बरबाद न करें। जानकारी के लिए ये भी बता दूं कि बच्चों को सेक्स सिखाने के इस अभियान का विरोध सिर्फ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकारें ही नहीं कर रहीं। केरल की वामपंथी सरकार को भी सेक्स एजुकेशान का ये तरीका समझ नहीं आ रहा।


4 Comments

rajeev · April 15, 2007 at 3:57 pm

ye kuchh waisa hi hai jaise rat mei bhukh lagne per maa apne bachche ko chanda mama ki kahani sunane lagti hai.. jaise desh mei karoron logon ko jeene ke liye moolbhut cheejen nahi hain aur sarkar karoron arbon rupye kharch ker chand per jane ko betab dikh rahi hai….waise hi jish desh ke lakhon schoolon mei chatt nasib nahi hai…jahan ek master panch panch class ek saath chala rahe hain…bachchho ko school tak pahuchana hi ek badi samasya hai…charwaha vidhyalay, rupye aur dopahar ke bhojan ki badaulat hum unhe school tak to le aate hai phir bhi aadhe chatra puri padhai nahi ker pate hain…aur insab paristhitiyon mei sarkar ka pura mahkama sex siksha mei juti pari hai…ye ek sharm se jyada kuch nahi hai.

chandrakant · April 15, 2007 at 4:41 pm

चलिए आपने कुछ अपने मन के सेक्स एजुकेशन वाले तर्कों को ढूंढ़ लिया है। और उसी का जवाब दे रहे हैं। आपने कम से कम ये तो माना है कि सेक्स एजुकेशन चाहने वालों के तर्क अच्छे तो लगते हैं। लेकिन इनके सही होने पर आपको एतराज है। जहां तक सरकारों की बात है तो उनका हाल तो वही है – जो रोगी को भावै वही वैद्य बतावे। सरकार हो या समाज आगे बढ़ कर की जाने वाली हर चीज की खिलाफत ही करती हैं। इसलिए उनको छोड़ दीजिए

आपने पहले तर्क ‘सेक्स एजुकेशन से लोकतंत्र स्थापित होत है’ को छोड़ दिया है तो मैं भी छोड़ देना ही चाहूंगा क्योंकि अगर ऐसा तर्क कोई देता है तो वो बेमतलब है।

जहां तक दूसरा तर्क है वो आपको कुछ सही लगता है लेकिन अजीब लगता है, वो भी इसलिए क्योंकि कुछ लोग, महज कुछ लोग पहली क्लास से इसे देना चाहते हैं। यानी अगर उन कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो आपको सेक्स एजुकेशन सही लगता है लेकिन किस क्लास से वो आप नहीं बता रहे हैं। आपके मुताबिक नौवीं दसवीं क्लास के बायलॉजी में सेक्स के बारे में बताया जाता है। इस पर मैं कहूंगा कि नौंवी दसवीं से पहले ही छात्रों को सेक्स के बारे में अच्छी खासी जिज्ञासा पैदा हो चुकी होती है, और इस बारे में जानने के लिए वो मैगजीन टीवी, साथी या इंटरनेट जो कुछ भी मिलता है उसे खंगालते रहते हैं। जहां उन्हे अधकचरा ज्ञान ही मिलता है। आखिर उम्र के जिस दहलीज पर उनकी सेक्स संबंधी जिज्ञासा जगती है उस समय सिलसिलेवार ढंग से उन्हे सेक्स एजुकेशन क्यों ना दिया जाए। आखिर सहीं ढंग से नहीं पढ़ाया जाएगा तो वो ऐसे ही इधर उधर से, जो कुछ सही गलत मिलेगा लेते रहेंगे।
मुझे इस बात से भी एतराज है कि आपने सेक्स एजुकेशन को सेक्स आर्ट की तरफ मोड़ दिया है। अगर आपको लगता है कि सेक्स एजुकेशन सेक्स आर्ट बन गई है तो सिलेबस पर आपको आपत्ति हो सकती है। लेकिन इसे दिया ही ना जाए और नौवीं दसवीं की बायलॉजी की किताब या इधर उधर की बातों की हवाले छोड़ दिया जाए ये बात कुछ हजम नहीं हो रही है।
आपके मुताबिक परिवार के बीच बड़े होते-होते बच्चे सेक्स के बारे में जान जाते थे। बिल्कुल सही है जान जाते थे… लेकिन तब जब परिवार संयुक्त होते थे घर में बड़ी बहन, बड़ा भाई या भाभी कोई ना कोई होता था जिससे वो बेझिझक बात कर सकते थे। लेकिन अब के जमाने के छोटे परिवार में ये पहले जैसा आसान नहीं रहा। और फिर अगर स्कूल में ढंग से बताया भी जाता है तो परिवार में मिलने वाली शिक्षा के मुकाबले कहां गलत हो जाता है।

अब अच्छा बुरा स्पर्श की जहां तक बात है आप कहते हैं छोटी उम्र में वो जानकर भी क्या कर पाएगा। क्यों नहीं कर पाएगा मां बाप या किसी और को बता तो सकता है।

आप कहते हैं बच्चों को सेक्स एजुकेशन देकर उनका बचपन ना बरबाद करें। ऐसे में कैसे बचपन बरबाद होगा मेरी समझ से परे है। अगर किशोरावस्था में कोई अधकचरी जानकारी के बजाय ठीकठाक जानकारी पा जाएगा तो उसका बचपन कैसे बरबाद होगा? और रही सरकारों की बात तो उनके अपने निहित स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति है फिर चाहे वो बीजेपी की हों वामपंथी।

Sanjeeva Tiwari · April 18, 2007 at 10:04 am

Apke chiththe ke kuch akshar hindi men nahin dikh rahen hain (Side bae Lokrang ke niche, Unikode hi hai ya mere PC men Taklibh Hai.

ratan · July 3, 2007 at 1:03 am

harshvardhan ji baat ye hai ki kuchh bato ka favour karna hamare desh main pagalpan mana jata hai aur sex education bhi wahi hai agar aap isaka virodh karenge matlab aap purane vicharo ke hai kyonki ye trend west se aaya hai aur hum aaj bhi mansik gulam hai aajkal sex ki bate bachho ko kam umar pata hone lag gayi to kya aajkal ke bachhe pahale se jyada thik ho gaye rape kam ho gaye ya fir girls sex se bachane lagi nahi par ye kahe kaun, agar hum manate hai ki sex education logo main nahi hai to kya India ki population kam hone lag gayi? 10-11 ki girls ko teachrs jab educate karenge practically tab pata chalega is education ka nuksan, western countries main education hai fir wahan 13-14 years ki girls maan kyon ban jati hai? lekin ye hamari aadat hai ki jo gore kare wo sahi hai agar ab unako Yoga ke fayde pata lag gaye to hame bhi samajh main aane lag jaye.

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