प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आजाद भारत के साठ साल पूरे होने पर लाल किले से देश में शिक्षा क्रांति की बात कही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शिक्षा पर खर्च करने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में 80,000 करोड़ रुपए मांगे हैं। निश्चित तौर पर अगर अगले बीस सालों में भारत को अपने मानव संसाधन यानी काबिल लोगों का इस्तेमाल दुनिया में अपनी साख बढ़ाने के लिए करना है तो, शिक्षा क्रांति बहुत जरूरी है। क्योंकि, भारत के लिए यही सबसे आसान जरिया है दुनिया पर राज करने का। लेकिन, क्या प्रधानमंत्री को इस बात का अंदाजा है कि भारत में शिक्षा क्रांति के रास्ते की असली रुकावटें क्या हैं।
हर किसी को शिक्षा जो, सबसे जरूरी है। अब भारत में इसके दो एक दूसरे एक एकदम विपरीत चेहरे जो, मैंने खुद भी देख लिए। गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए बच्चे और पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते। तो, मुबंई जैसे शहर में स्कूलों में दाखिले के फॉर्म लेने के लिए सुबह चार बजे से ही लाइन लगती है। मुंबई वाला अनुभव मुझे पिछले साल ही हुआ जब मैं दोपहर में ऑफिस पहुंचा तो, रात से ही लाइन में अभिभावकों की लाइन के विजुअल के साथ खुला पैकेज मुझे चलाने को मिला।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। सरकारी रिपोर्ट एलीमेंट्री एजुकेशन इन इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि देश के 32,000 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं पढ़ते। ये बताने की जरूरत नहीं है कि ये गांव के इलाके के सरकारी स्कूल हैं। और, उसमें भी करीब आधे 15,791 स्कूल गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल हैं। ऐसे सबसे ज्यादा 7,945 स्कूल कर्नाटक में हैं जहां एक भी बच्चे नहीं हैं। देश के करीब सात परसेंट यानी 69,353 स्कूल ऐसे हैं जिसमें 25 से कम छात्र पढ़ते हैं और 1,70,888 स्कूल ऐसे हैं जिसमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 25 से 50 के बीच है। बीमारू राज्यों के अगुवा बिहार और उत्तर प्रदेश दूसरे मामले में भले ही पिछड़े हों। एक स्कूल में सबसे ज्यादा छात्रों के मामले में उनके आसपास सिर्फ दिल्ली और केरल ही हैं। और, शिक्षा क्रांति की यही असली चुनौती है कि जरूरत जहां पर वहां सबको कैसे पढ़ने-बढ़ने का मौका मिले।

परेशानी सिर्फ बच्चों के स्कूल न आने तक ही नहीं है। देश के 23,000 स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं। तो, 1,30,000 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। बच्चों के स्कूल न आने और स्कूलों के लिए शिक्षक न मिलने की वजह भी साफ ही है कि देश में 1,02,227 बिना एक भी कमरे के चलने वाले स्कूल हैं। लेकिन, सिर्फ ऐसा ही नहीं है कि स्कूल में सुविधा न होने, शिक्षक न होने और बच्चों के लिए पढ़ने न आने की ही परेशानी है। भारतीय शिक्षा तंत्र में घुसा भ्रष्टाचार भी मनमोहन सिंह के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

UNESCO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय शिक्षा तंत्र में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है और इस भ्रष्टाचार को बढ़ाने में सबसे ज्यादा योगदान स्कूल के शिक्षकों का है। UNESCO की करप्शन इन एजुकेशन की इस स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय स्कूलों के शिक्षक स्कूल से गायब रहने में सबसे आगे हैं। एक युगांडा ही ऐसा देश है जहां के शिक्षक इस मामले में भारतीय शिक्षकों को मात दे पाते हैं। दुनिया में 100 में से औसतन बीस शिक्षक ही स्कूल से गायब रहते हैं जबकि, भारत के 100 में 25 शिक्षक स्कूल आना पसंद नहीं करते। इसमें भी बीमारू राज्य बिहार और यूपी के शिक्षक सबसे आगे हैं। बिहार में हर पांच में से दो शिक्षक गायब रहते हैं तो, उत्तर प्रदेश में तीन में एक शिक्षक स्कूल के रास्ते से भटक जाता है।

यही शिक्षकों का स्कूल न आना शिक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार बढ़ाता है। शिक्षा पर खर्च होने वाली रकम का साढ़े बाइस परसेंट इन शिक्षकों के गायब रहने से बरबाद हो जाता है। इतना ही नहीं ये शिक्षक महोदय स्कूल में तो नहीं पढ़ाते लेकिन, घर पर ट्यूशन करने वाले छात्र के लिए इनके पास समय ही समय होता है। ट्यूशन से शुरू हुआ भ्रष्टाचार नकल पर जाकर खत्म होता है। UNESCO की इसी रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अच्छे इंस्टिट्यूट्स में कंप्यूटर साइंस, मेडिकल और इंजीनियरिंग विषयों में गलत तरीके से दाखिले के लिए 3000 रुपए से लेकर 8 लाख रुपए तक दिए जाते हैं। ये बानगी भर है देश की शिक्षा क्रांति के रास्ते में आने वाली मुश्किलों की। तो, मनमोहन जी अब बताइए कैसे करिएगा शिक्षा क्रांति।

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