महापुरुष होते हैं। बनाए जाते हैं। अद्भुत व्यक्तित्व के बाबा साहब
डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर दोनों थे। ये अलग बात है कि उनके हाथ में कानून की किताब
संविधान विशेषज्ञ टाइप का और दलित हितों के रक्षक का ठप्पा, यही वाला उनके साथ सबसे मजबूती से जुड़ा रहा।
लेकिन, डॉक्टर अम्बेडकर को समझना है तो, उन्हें समग्रता, संपूर्णता में समझना होगा। और यही उन्हें सबसे अच्छी श्रद्धांजलि
होगी। अगर आज भी उनकी 22 प्रतिज्ञाओं को लेकर कोई हिंदू धर्म से
उन्हें विरोध में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है तो वो दरअसल बाबा साहब को समझ ही
नहीं सका। कोई अगर आज भी उन्हें सिर्फ एक जाति के हितों का रक्षक बनाना-बताना चाह
रहा है तो, उसकी नीयत में खोट है। बाबा साहब
अद्भुत इस कदर थे कि आज हर कोई अपने तरीके से उनके जीवन के अलग-अलग समय के
कर्तव्यों, वक्तव्यों में से अपने लिहाज से फिट
बैठने वाली निकालकर उसी खांचे में बाबा साहब को फिट कर देना चाहता है। लेकिन, बाबा साहब आज होते तो आज के संदर्भ में उनकी
सोच एकदम ही अलग होती। ये बात मैं इतने भरोसे से इसलिए कह रहा हूं कि उनके बचपन से
लेकर जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर उन्होंने ढेर सारे सिद्धांत प्रतिपादित किए। उनमें
समयानुकूल बदलाव भी किए। हां, एक
बात जो स्थिर रही वो, ये कि शोषित वर्ग को समाज की मुख्यधारा
में कैसे लाया जाए। इसके अलावा सब मिथ्या है। अच्छा रहना, खाना ये उनका मंत्र था। और इसके लिए आर्थिक
तरक्की जरूरी। इसलिए बाबा साहब आज होते तो पता नहीं पूंजीवादी का ठप्पा उन पर लगता
या कुछ और। इसलिए अर्थशास्त्र के विद्वान डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर को याद कीजिए तो, पहले खुद के दिमाग के खांचे को तोड़िए। फिर
बोलिए कि ये बाबा साहब इस संदर्भ में कहते थे।

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