सात साढ़े सात परसेंट की ग्रोथ का भरोसा हमारे प्रधानमंत्री-वित्त मंत्री को फिर होने लगा है। सब ठीक हो रहा है। शहरी अर्थव्यवस्था, शहरी उपभोक्ता पर फिर भरोसा जग रहा है। कंज्यूमर (जिसकी जेब में पैसे हैं और जो सबकुछ खरीद सकता है) फिर महत्व पाने लगा है। लेकिन, सारी तरक्की शहरों के जरिए होते देखने वाली सरकारों ने क्या सचमुच के शहर बनाए भी हैं।
 देश के महानगरों की बात आज मैं छोड़ रहा हूं। अगले लेख में देश का सबसे बड़ा शहर, दिल्ली कितना शहर हो पाया है इसकी बात करूंगा लेकिन, अभी बात देश के दूसरे शहरों की जो, किसी जिले के मुख्यालय होते हैं। कुछ समय पहले जौनपुर गया। वैसे तो, हमेशा ही जौनपुर में गाड़ी चलाना मौत के कुएं में कार चलाने जैसा होता है। जैसे मौत के कुएं में जरा सा चूके तो, जान गई वैसे ही जौनपुर में गाड़ी चलाते जरा सा सावधानी हटी कि बड़ा दुर्घटना घटी। सड़कें तो शहर जैसी हैं नहीं लेकिन, नरसिम्हाराव-मनमोहन की जोड़ी के करीब दो दशक पहले लाए गए उदारीकरण ने सबकी जेब में गाड़ी खरीदने लायक पैसे डाल दिए हैं।
इस बार जौनपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने शहर के तंगहाल ट्रैफिक को सुधारने का नया रास्ता निकाला है- बीच सड़क में पार्किंग। यानी पार्किंग सड़क के बीच डिवाइडर जैसा काम करे। और, दोनों तरफ ट्रैफिक बिना रुके चलता रहे। अब प्रशासनिक अधिकारियों के पास इतना बूता तो है नहीं कि तंग जौनपुर कस्बे की सड़कों को शहर की चौड़ी सड़कों में तब्दील करा सकें तो, बेचारे अपने बस भर का कर रहे हैं। अब इसमें हाल ये कि हमारी गाड़ी बस दोनों तरफ बमुश्किल ही रगड़ाते बच रही थी।
और लगभग जौनपुर जैसा ही हाल देश के सारे शहरों का है। अभी कुछ दिन पहले बालाजी मेंहदीपुर से लौटते समय मथुरा जाना हुआ। लगा बस नाम बदल गया है। वरना तो, गाड़ी चलाने में वैसे ही कौशल की जरूरत है जैसे जौनपुर में। अब देखिए ये साहब हमारी कार के आगे कितने शान से पाइप लादे चले जा रहे हैं। गलती इनकी नहीं है, कहां से ला जाएं।
मथुरा में हाईवे से घुसते ही मिलने वाला ट्रैफिक कृष्ण जन्मभूमि तक पहुंचते-पहुंचते दमघोंटू ट्रैफिक में बदल जाता है। और, कृष्ण जन्मभूमि की डीग गेट पुलिस चौकी के सामने से होली गेट की ओर जाने वाला रास्ता तो, बस सही में भगवान कृष्ण ही मालिक है। कृष्ण की नगरी है तो, यहां लड़ने-भिड़ने पर लोग राधे-राधे करके मुस्कुरा देते हैं। वरना तो, ये शहर और ये ट्रैफिक कब किसकी जान ले लें क्या पता। आजादी के 63 सालों में हमने कौन सा शहर बनाया ये तो, दिख ही रहा है। हां, गांव उजड़ जाएं इसका भरपूर बंदोबस्त हमारी सरकारी नीतियां करती जा रही हैं। देश का दिल दिल्ली सबको भाता है। इसकी चर्चा कल करूंगा कितना दिलवाला है ये दिल्ली शहर।

6 Comments

अंशुमाली रस्तोगी · January 14, 2010 at 7:29 am

गांव खत्म हुए। अब शहरों के बीच से शहर भी खत्म हो रहे हैं। भीड़ बढ़ रही है। बेतरतीब तरीके से बढ़ रही है। जो हाल जौनपुर या मथुरा का है, सभी का यही हाल है। बरेली भी भीड़ से अछूता नहीं है। इंसानों से ज्यादा वाहन बढ़ रहे हैं।

डॉ. मनोज मिश्र · January 14, 2010 at 8:20 am

सही कह रहे हैं,हम तो रोज ही झेल रहे हैं भाई.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi · January 14, 2010 at 2:12 pm

हमने शहर नहीं केवल उन के रास्तों को भरने के लिए वाहन बिकवाए हैं।

नीरज तिवारी · January 16, 2010 at 5:55 am

Aise mein shahar ke beech gaaon talashne ki yaad aati hai…

शरद कोकास · February 2, 2010 at 4:20 pm

छोटे शहर का यह दुख है कि वह बड़ा क्यो नही हुआ और बड-ए शहर का यह कि वह छोटा क्यो नही हुआ ।

zeal · March 16, 2010 at 2:23 pm

Sarkaar vyast hai apni kursi bachaane mein , ya fir kursi hathiyaane mein…kisko fikar hai Desh ki aur uski progress ki ?

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