मीडिया मजबूरी में या ये कहें कि और करे भी तो, क्या। अब यही चलाना-दिखाना है कि मुंबई के जज्बे को सलाम। आखिरकार जिंदादिल मुंबई के लोगों ने आतंक को फिर से मात दे दी। कुछ 22 प्वाइंट की मामूली सेंसेक्स की बढ़त ने एक और हेडलाइन ये भी दे दी कि आतंक को शेयर बाजार का करारा जवाब। लेकिन, क्या सचमुच ऐसा हुआ है। क्या सच्चाई यही है कि मुंबई या फिर शेयर ने आतंक को करारा जवाब दिया है। देश में अगर कश्मीर के बाद कहीं के लोगों के सीने में सबसे ज्यादा आतंकी घाव पक रहा है तो, वो मुंबई शहर ही है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर की मजबूरी को लोगों खासकर हम मीडिया वालों ने जबरदस्ती बहादुरी बनाने की कोशिश बार-बार की है। और, इसे आतंक से लड़ने के लिए जरूरी सकारात्मक सोच साबित कर दिया है।

11/7/2006 के ट्रेन धमाके हों या फिर 26/11/2008 के ताज और मुंबई के दूसरे अहम ठिकानों पर हुए आतंकी हमले हों। मीडिया में लाख ये बात साबित करने की कोशिश की जाए कि हमलों के तुरंत बाद मुंबई के जिंदादिल लोग उठ खड़े होते हैं। मुंबई कभी थमती नहीं, ये जज्बा दिखाते हैं। लेकिन, इन दोनों धमाकों के समय इन घटनाओं को नजदीक से महसूस करने और मुंबई के लोगों की हालत देखकर लगा कि ये मीडिया बार-बार तय तरीके से मुंबई के लोगों को अपने घाव का इलाज करने के बजाए उसे दबाने, घाव में मवाद बनने को मजबूर कर देता है। ये थोपी गई जिंदादिली ही है कि लोगों का गुस्सा बाहर आने पर एक सामूहिक सहमति की रोक हावी हो जाती है। 11/7 के सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट के काफी दिन बाद मैं लोकल से लोवर परेल स्टेशन से ठाणे जा रहा था। अचानक बीच के एक स्टेशन पर अफवाह फैली, ट्रेन में बम है। और, मीडिया में कभी थमती न दिखने वाले मुंबईकर ऐसे थमे कि 3 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे और पूरी ट्रेन खाली हो गई। मैं खुद फुर्ती देखकर भी हैरान था कि इतनी तेजी से कैसे में लोकल के डिब्बे से स्टेशन पर आ गया।

26/11 के हादसे के समय और उसके बाद भी मुंबई के लोगों की सांसें थमी की थमी रह गईं थीं। लेकिन, डर, आतंक की बात करना तो, देश में निराशा फैलाना वाला माना जाता। और, जब झूठे साहसी बनना हो तो, भला कोई क्यों पीछे रहता। लोगों को गुस्सा तक दिखाने की इजाजत नहीं थी। पता नहीं कैसे समाचार चैनलों और अखबारों में बिना कहे ये सहमति बन जाती है कि इस समय लोगों का गुस्सा मत दिखाइए, पॉजिटिव स्टोरी दिखाइए। जिसने घायल लोगों को धमाके के बीच से निकालकर अस्पताल पहुंचाया हो, उसे हीरो बना दीजिए। एक-दो कॉमनमैन यानी आम आदमी को हीरो बना-दिखाकर मीडिया लोगों का गुस्सा दबा देती है। लोग हीरोइक स्टोरी में फंस जाते हैं और आतंकवादी फिर से ढेर सारे आम आदमियों को मौत के घाट उतारने की तैयारी करने में लग जाते हैं। हमें ऐसा बना दिया गया है कि अब कुछ दिन ही लगता है किसी आतंकी हमले को भूलने में। मीडिया में बरसी की खबरों से भले याद आ जाए।

गुस्सा बाहर न आने देने साजिश और लोगों की जिंदादिल बनाए रखने की साजिश ऐसी हावी होती है कि लोग मजबूरी में आंसू पीकर मुस्कुराने लगते हैं। फिर भावनात्मक कहानियां खोजी जाने लगती हैं। मोमबत्ती जलाए कुछ लोगों के शॉट्स दिखाकर ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की मजबूती मान ली जाती है। और, आतंकवाद के असली मुद्दे से लोगों का ध्यान ही भटक जाता है। कौन बताए-समझाए कि अरे, मजबूरी है भइया। इसलिए जिंदादिल नजर आते हैं। ऐसे जिंदादिल कि कांग्रेस के वही महासचिव राहुल गांधी जो, भट्टा-पारसौल में किसानों पर जमीन अधिग्रहण के मामले में मायावती सरकार के खिलाफ रात के अंधेरे में गांव में चुपचाप घुसकर लड़ाई का एलान कर देते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का एलान और उसके बाद कौन सी लड़ाई राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने लड़ी है। उस पर राहुल गांधी मुंबई हमलों पर बयान दे देते हैं कि एक-दो हमले रोके नहीं जा सकते। इराक-ईरान में तो, ऐसे हमे रोज होते रहते हैं। लेकिन, हम हिंदुस्तानियों पर तथाकथित जिंदादिली ऐसी हावी है कि हम राहुल गांधी के बयान पर भी गुस्सा नहीं होते। इस बात पर भी गुस्सा नहीं होते कि पूरी कांग्रेस पार्टी इस बयान को सही साबित करने में जुट जाती है।

इस बात पर भी हम हिंदुस्तानी अपनी जिंदादिली का त्याग नहीं कर पाते। मीडिया ये चिल्लाने लगता है कि मुंबई में धमाके के बाद हो रही बारिश से सारे सबूत धुल जाने के अंदेशा है। पता नहीं हम ये याद क्यों नहीं कर पाते कि आखिर अब तक सारे सबूत मिलने के बाद भी क्यों नहीं एक भी आतंकी को उसके किए की सजा हम दे पाए। कसाब, अफजल गुरू जैसे लोग हमारी जेल में होते हुए भी हमारे खास मेहमान से बढ़कर हैं। आंकड़े आते रहते हैं कि कसाब पर हर रोज करीब एक करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। स्पेशल कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट ये सब आतंकियों को सजा सुनाकर फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचा पातीं। जवाब साफ है क्योंकि, कांग्रेस के युवराज को लगता है कि ऐसे एक दो हमले तो रोके नहीं जा सकते। एक दिन मुकर्रर करके सरकार देश की सभी जेलों में बंद आतंकवादियों को एक साथ क्यों फांसी के फंदे पर लटकाती।

लेकिन, ऐसा भला कैसे हो सकता है। मुंबई हमले के करीब 48 घंटे बाद आतंरिक सुरक्षा सचिव बयान दे देते हैं कि सभी आतंकी संगठनों पर साजिश का शक है। अब समझ लीजिए, किसी पर और कैसे कार्रवाई हो सकती है। फिर बात तो, वही है ना कि, जब ऊपर से संदेश आतंकवाद को राजनीतिक फायदे के रूप में इस्तेमाल करने का हो तो, कार्रवाई कौन और कैसे करेगा। खैर, इस सरकार का जो, अंदाज है वो, साफ कह रहा है कि हिंदुस्तानियों आदत डाल लो। मुंबईकरों आदत डाल लो। हम तुम्हारे न थमने वाले जज्बे की तारीफ करते रहेंगे। तुम अपने कुछ लोगों को खोकर, फिर से सुबह काम के लिए चल पड़ना। क्योंकि, मुंबई-दिल्ली में क्या उदारीकरण के बाद देश के किसी भी हिस्से में कितने भी बड़े हादसे के गम जो, रुक जाएगा-थम जाएगा। बगल वाला वैश्वीकरण वाले इंडिया में एक पायदान ऊपर चला जाएगा। काश एक बार आतंकवाद के दिए जख्म से मुंबई थम जाए, देश थम जाए तो, शायद इसका कुछ इलाज निकल सके। क्योंकि, अब तो देश के सबसे ताकतवर शख्स के तौर पर स्थापित राहुल गांधी भी ये साफ कह रहे हैं ऐसे हमले रोकने की क्षमता उनमें और उनकी सरकार में नहीं है।


7 Comments

प्रवीण पाण्डेय · July 14, 2011 at 2:03 pm

थम थम,
बम बम।

डॉ. मनोज मिश्र · July 14, 2011 at 3:06 pm

@कोशिश बार-बार की है। और, इसे आतंक से लड़ने के लिए जरूरी सकारात्मक सोच साबित कर दिया है।
सही कह रहे हैं लेकिन इसका अंत कब होगा यह सरकार बता पाने की स्थिति में नही है.

रंजना · July 15, 2011 at 11:45 am

एक एक shabd से सहमत हूँ…

बहुत जरूरी है eksaath sabkuchh थमना…भले एक बार के ही लिए…

सुनीता शानू · July 24, 2011 at 2:32 am

आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ देखियेगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

सुनीता शानू · July 24, 2011 at 3:19 am

आपकी पोस्ट की चर्चा कृपया यहाँ पढे नई पुरानी हलचल मेरा प्रथम प्रयास

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) · July 24, 2011 at 5:39 am

पूर्णतः सहमत।

सादर

Mrs. Asha Joglekar · July 29, 2011 at 10:04 pm

मजबूरी है मुबई वासियों की कि धमाके के दूसरे दिन भी काम पर जायें । घर बैठ कर रोटी नही मिलने वाली । पर हमारी सरकार हर बार कडी कारवाई के आश्वासन ही देती रहेगी शायद -जबानी सेवा ।

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