राम धीरज के गांव के हर घर से लोग इलाहाबाद में थे। और, राम धीरज भी चाहता था कि इलाहाबाद में तरक्की करने वाले लोगों के आसपास ही सही वो खड़ा हो सके। राम धीरज के गांव के ही मैनेजर साहब भी थे। बैंक में मैंनेजर। दारागंज में ही अच्छा घर था। गांव के सबसे व्यवस्थित लोगों में थे। राम धीरज की पट्टीदारी के बड़े भाई लगते थे। गांव में भले ही मैनेजर साहब और राम धीरज के घर में खाबदान (यानी दावत-निमंत्रण का संबंध) बीच-बीच में टूटता रहा हो। लेकिन, राम धीरज मैनेजर भैया के यहां से कभी टूट नहीं पाया। वजह भी साफ थी वही  दो मंजिला भैया का मकान पोर्टिको में खड़ी कार दिखाकर तो, वो अपनी हीरो पुक के जरिए फरफराती इज्जत को थोड़ा ठोस आधार भी दे पाता था।
लेकिन, गजब का था राम धीरज। अपनी परेशानी, चिंता दूर करने से ज्यादा उसका समय दूसरों को परेशान, चिंतित करने में बीतता था। अब राम धीरज के गांव-देहात से हर घर से बच्चे पढ़ने इलाहाबाद ही पहुंचते थे। और, राम धीरज के समय में इलाहाबाद पढ़ने आए बच्चों के लिए वो, बड़ी मुसीबत बनता था। गांव में मां-बाप बच्चे के फेल होने पर भी उसकी तारीफ करते रहते। लेकिन, राम धीरज से ये कैसे बर्दाश्त होता। राम धीरज अपना पैसा लगाकर गांव के हर इलाहाबाद में पढ़ने वाले बच्चे की मार्कशीट की डुप्लीकेट कॉपी निकलवा लेता था। और, जिसने भी बेवजह की हवा-पानी बनाई। उसके दरवाजे के सामने मार्कशीट की डुप्लीकेट चिपक जाती थी।
इलाहाबाद में रहने वाले मैनेजर साहब को छोड़कर किसी घर का कोई बच्चा इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंच भी नहीं पाया था। सब संबद्ध कॉलेजों तक ही पहुंचते। और, उसमें भी ज्यादातर कॉलेजों से बिना पूरी डिग्री लिए ही निकलते। उन सबकी डुप्लीकेट मार्कशीट राम धीरज के पास जरूर होती। यही वजह थी कि उससे पूरा गांव चिढ़ता था। लेकिन, उसके ऊपर इस सबका कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैनेजर साहब के अलावा वो, सबका मजाक बना देता था। चुनावी राजनीति से बड़ा बनने की महत्वाकांक्षा कुछ इस कदर उस पर हावी थी कि वो, खुद को राजनीतिक गतिविधियों से दूर नहीं रख पाता था। राम धीरज एक राजनीतिक पार्टी का वॉर्ड अध्यक्ष बन गया था। और, जब इलाहाबाद से एक राष्ट्रीय नेता चुनाव लड़ने आए तो, राम धीरज की महत्वाकांक्षा हुई कि उसे भी प्रचार के लिए गाड़ी चाहिए।
जब किसी जतन से गाड़ी प्रचार के लिए नहीं मिली तो, उसने प्रचार गाड़ी ही अपने नाम पर इश्यू करा ली। और, फिर पूरा प्रचार दारागंज में ही होता रहा। कुछ समय दारागंज में संकरी गली में उसके किचन वाले कमरे के सामने प्रचार गाड़ी खड़ी रहती तो, कभी मैनेजर साहब के घर के सामने। और, ये सब करके राम धीरज की हवा-पानी कुछ तो, बन ही गई थी। तभी तो, दारागंज की दो सड़कों- उसके घर के सामने की गली और मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क- की बिजली-सफाई की व्यवस्था चकाचक रहने लगी। उसके किराए के कमरे और मैनेजर साहब के दोमंजिला मकान के सामने के खंभों पर नगर निगम से इश्यू कराए गए बड़े हैलोजन भी लग गए। यहां तक कि पूरे दारागंज में सफाई के हालात चाहे जितने खराब हों उसके कमरे के सामने की गली और मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क चमकती रहती थी।
राम धीरज की महत्वाकांक्षा बड़ा बनने की थी। और, बड़ा बनने के लिए यूपी-बिहार में नेतागीरी से बेहतर कोई रास्ता नहीं होता। इसीलिए जब विश्वविद्यालय में उसे प्रकाशन मंत्री शॉर्ट फॉर्म में प्र मं बनने में सफलता हाथ नहीं लगी। तो, राम धीरज ने सोचा कि जब मोहल्ले में एक अपने कमरे के सामने की गली और एक मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क की सफाई और बिजली का इंतजाम मैं करा लेता हूं तो, और कुछ न सही सभासद का चुनाव तो जीता ही जा सकता है। और, चुनाव न भी जीते तो, कम से कम मोहल्ले का एक प्रतिष्ठित नेता तो बन ही जाऊंगा। और, यही प्रतिष्ठित होना ही उसके लिए सबसे बड़ा लक्ष्य था क्योंकि, लाख तिकड़म के बावजूद उसे कोई प्रतिष्ठा नहीं देता था। और, इसी प्रतिष्ठा को पाने के लिए उसने सभासदी का चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली। लेकिन, मुश्किल ये कि जिस राष्ट्रीय पार्टी से वो जुड़ा था। उस पार्टी की सभासद पहले से वहां थी। जातिगत समीकरण के लिहाज से उसका टिकट कटना संभव नहीं था। इसलिए टिकट मिल ही नहीं सकता था और न मिला। लेकिन, राम धीरज को तो, चुनाव लड़ना था। प्रतिष्ठा जो, हासिल करनी थी। इसलिए राम धीरज ने निर्दल चुनाव लड़ा। चुनाव तो, लड़ा। लेकिन, चुनाव हारा क्योंकि, जीत जाता तो, राम धीरज के जीवन में एक ऐसी बात हो जाती जो, उसे असमय इस दुनिया से जाने से रोकती।
राम धीरज चुनाव तो, हारा ही। इस दौरान नियमित खर्चे बढ़े और उन नियमित तौर पर बढ़े अनियमित खर्चों को नियमित करना तो, राम धीरज को आता ही नहीं था। खर्चे बढ़ते गए और वो, इधर-उधर की दिखा-बताकर लोगों से कर्ज लेता रहा। इसमें उसका मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क की सफाई और हैलोजन लगवाने का निवेश बड़ा काम आता रहा। हर किसी को मैनेजर साहब दोमंजिला मकान दिखाकर वो, बैंक गारंटी टाइप की देता रहा। लेकिन, खोखली बैंक गारंटी कब तक काम आती। आखिरकार, कर्ज देने वालों को जब बैंक गारंटी के बजाए अपनी रकम की चिंता बढ़ी तो, उन्होंने राम धीरज पर दबाव बढ़ाना शुरू किया।
अचानक राम धीरज गांव में ज्यादा रहने लगा। गांव वाले सोचने लगे कि क्या हुआ राम धीरज तो, गांव में रात रुकता ही नहीं। अचानक क्यों हफ्ते भर से यहीं पर पड़ा है। राम धीरज गांव में रुकता नहीं था। तो, उसकी वजह भी थी। वही कम सुंदर अपनी पत्नी से दूर रहने की मंशा। वैसे, वो अपनी सुंदर भाभी के पास घंटों बेवजह बात बनाते-बतियाते बैठा रहता। खैर, राम धीरज के गांव में इतने दिन रुकने का भंडाफोड़ एक दिन हो ही गया। जिन लोगों ने मैनेजर साहब की अनकही बैंक गारंटी के आधार पर राम धीरज को कर्ज दिया था। वो, मैनेजर साहब के दरवाजे पहुंच गए। दारागंज में रहते मैनेजर साहब को भी समय हो गया था। और, लोगों में प्रतिष्ठा भी थी। वही प्रतिष्ठा जिसका दशांश पाने के लिए राम धीरज आजीवन तरसता रहा। इस प्रतिष्ठा की वजह से राम धीरज को कर्ज देने वालों को मैनेजर साहब के दरवाजे से जाना पड़ा।
राम धीरज ने धीरे से कमरा भी छोड़ दिया था। लेकिन, वही पत्थर की गली वाला कमरा, जिस पत्थर पर राम धीरज का नाम लिखा था। वो, कमरा उसने छोड़ दिया। न छोड़ता तो, शायद उसी वक्त दुनिया छोड़नी पड़ती। लेकिन, कमरा तो छोड़ा। लोग कैसे छोड़ पाता। कमरे के मकान मालिक की यामाहा पर बैठकर तो, वो अपने गांव तक हो आया था। बस फिर क्या था राम धीरज को कर्ज देने वाले उसी मकानमालिक के सहारे गांव तक पहुंच गए। गांव में धड़धड़ाते दो बुलेट पर 4 लोग पहुंच गए। राम धीरज छिप गया। या यूं कह लें कि गांव में 4 लोगों का इतना तो, दावा बनता नहीं था कि वो, सर्च वारंट लेके राम धीरज को गांव में खोज पाते। वो, लौट आए लेकिन, ये कहके अगर राम धीरज इलाहाबाद में दिख गया तो, खैर नहीं।
खैर, जब खैर नहीं थी तो, राम धीरज भला क्यों इलाहाबाद में दिखता। बेचारे को अपनी एकमात्र उपलब्धि वो, पत्थर वाली गली छोड़कर जाना पड़ा। उस पत्थर पर जिस पर उसका ना खुदा था। बिना कुछ हुए। और, गली ही नहीं, मोहल्ला क्या इलाहाबाद शहर ही छोड़ना पड़ गया। वो, चुपचाप नोएडा भाग गया। नोएडा, यूपी का वो, शहर जो, यूपी का अकेला शहर बना। और, यूपी के भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी कहानियां भी यहीं से निकलती हैं। खैर, रीम धीरज की तिकड़मों से वाकिफ लोगों को लगा कि अब नोएडा में जाकर तो, वो कुछ ऐसा कर ही लेगा कि उसके जीवन में थोड़ी प्रतिष्ठा तो, जुड़ ही जाए। लेकिन, बेचारा राम धीरज। न प्रतिष्ठा जुड़नी थी न जुड़ी। अब नोएडा में न तो, सभासदी का चुनाव था। न विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री का शॉर्ट फॉर्म बनने का मौका। यहां तो, उसके लिए संकट आ गया था आजीविका चलाने का। उस पर गांव में उसकी पत्नी को भी कोई रखने को तैयार नहीं था। पत्नी को भी लेकर आना था।
तो, राजनीति के जरिए प्रतिष्ठा पाने की राम धीरज की कोशिश नोएडा आकर पूरी तरह धूमिल हो गई। और, राम धीरज को नोएडा के हजारों मजदूरों की तरह एक कपड़ा कंपनी में मजदूरी करनी पड़ी। लेकिन, राम धीरज को आदत थी। इसलिए यहां भी उसने स्टोर का काम पकड़ा और धीरे-धीरे स्टोर इंचार्ज हो गया। यानी, उसके लिहाज से फिर थोड़ा प्रतिष्ठा का काम उसे मिल गया था। लेकिन, अपने नाम लिखे पत्थर वाली गली से दूरी राम धीरज को इस कदर सालती रही कि उसे धीरे-धीरे बीमारियों ने जकड़ना शुरू कर दिया।
बीमारी कोई ऐसी नहीं थी जो, इस जमाने में दूर न होती। लेकिन, उसे जो सबसे गंभीर बीमारी लगी थी। वो, थी अपने नाम लिखे पत्थर वाली गली से दूरी। आखिर वही एक पत्थर तो, उसकी जिंदगी की उपलब्धि था। खैर, टीबी की बीमारी ने धीरे-धीरे राम धीरज की शक्ल कुछ ऐसी बना दी कि कम सुंदर दिखने वाली उसकी पत्नी अब उसके मुकाबले में आ गई। लेकिन, वो भी गजब की मिट्टी का बना था। जिस बड़े भाई ने उसकी पत्नी को गांव में रहने नहीं दिया। जो, उसे नियमित तौर पर कोसता था। उसे पैसे नहीं देता था और न ही जब तक उसके पिता रहे, उन्हें देने देता था। जैसे ही राम धीरज थोड़ा कमाने लगा उसी, बड़े भाई के बेटे को नोएडा ले आया।
भाई का बेटा भी जैसे-तैसे ही था पढ़ने में। जैसे-तैसे ही रहा। मैनेजर साहब, अरे वही दारागंज वाले, उनका बेटा भी नोएडा आ गया था। नोएडा में एक बड़ी कोठी किराए पर लेकर रहता था। राम धीरज उससे भी विश्वविद्यालय के दिनों से ही इस कदर प्रभावित था कि उसे अपनी हीरो पुक अकसर देकर चला जाता था। तो, जब राम धीरज को पता लगा कि मैनेजर साहब का बेटा नोएडा आ गया है तो, एक दिन वो, मिलने आया। लेकिन, प्रतिष्ठा का उसे खूब ख्याल था। इसलिए पता नहीं किसको पटाकर उसकी फोर्ड आइकॉन से ही आया। आखिर मैनेजर साहब के बेटे से जो, मिलना था। उधारी की फोर्ड आइकॉन का दबाव था इसलिए जल्दी में भागना पड़ा। लेकिन, ये सफल कोशिश की कि किसी तरह मैनेजर साहब का बेटा बाहर आकर देख ले कि राम धीरज फोर्ड आइकॉन से आया है।
उधारी की फोर्ड आइकॉन और ऐसी ही उधारी की प्रतिष्ठा पर राम धीरज पूरे जीवन चलता रहा। मन में इच्छा थी कि किसी तरह कुछ असल प्रतिष्ठा भी हाथ लग जाए। लेकिन, असल प्रतिष्ठा उसके लिए मृग मरीचिका ही बनी रही। धीरे-धीरे राम धीरज की तबियत ज्यादा खराब होने लगी। इतनी कि उसे कपड़ा कंपनी की नौकरी छोड़नी पड़ी। फिर उसके पास पैसे ही नहीं थे कि वो, अपनी टीबी की बीमारी का इलाज करा पाता। राम धीरज के अपने कोई बच्चे भी नहीं हुए कि वो, बीमारी से लड़ने का उत्साह बना पाता। आखिरकार, उसका चक्र पूरा होता गया और एक दिन नोएडा से वापस उसे प्रतापगढ़ के अपने उसी गांव लौटना पड़ा। जहां से उसने प्रतिष्ठा की चाह में सफर शुरू किया था।
जिस गांव को उसने छोड़ा ही इसीलिए था कि उसे प्रतिष्ठा चाहिए थी। गांव में रह रहे लोगों और गांव से निकलकर बाहर बसे लोगों से ज्यादा। सारी जिंदगी वो, गांव में रह रहे लोगों का और मौका मिलने पर तो, गांव के बाहर बसे लोगों का भी मजाक उड़ाता रहा। यहां तक कि उनको भी उसने नहीं बख्शा जिन्होंने जीवन में उससे कई गुना ज्यादा प्रतिष्ठा बनाई उनका भी मजाक बनाने से वो, नहीं चूकता था। मैनेजर साहब इसमें अपवाद थे। अब जब राम धीरज को भले ही टीबी की बीमारी की वजह से फिर से उस गांव में लौटना पड़ा। और, उसने देखा कि इन दो एक डेढ़ दशकों में तो, गांव के बच्चे भी काफी आगे निकल गए हैं तो, उसकी टीबी की बीमारी लाइलाज होती गई।
टीबी की बीमारी क्या लाइलाज होती गई। दरअसल, तो वही अपने नाम लिखे पत्थर से दूरी उसे बीमार करती गई। उस पर कुछ न कर पाने की कसक। प्रधानमंत्री के शॉर्ट फॉर्म की तो, छोड़िए कुछ नहीं कर पाया। और, उसी अपने प्रतापगढ़ के गांव में लौटना पड़ा। राम धीरज अब धीरज खो रहा था। टीबी की बीमारी ने उसकी शक्ल अपनी कम सुंदर पत्नी से कई गुना बदसूरत कर दी थी। राम धीरज न तो अच्छा बेटा बन सका। न अच्छा भाई। और, सबसे महत्वपूर्ण कि न ही अच्छा पति। फिर पिता कैसे बन पाता। वैसे, जरूरी नहीं कि अच्छा पति न बन पाने वाले लोग पिता ही न बन पाएं। बनते हैं बहुत से अच्छा पति न बन पाए लोग भी खूब पिता बने हैं। लेकिन, शायद उसके जीवन में कुछ भी ऐसा दर्ज नहीं होना था। इसीलिए जब अच्छा क्या, कामचलाऊ पति बनने की कोशिश भी की तो, शायद दूसरी परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया होगा। और, राम धीरज ऐसे ही निकल लिया, इस दुनिया से।

समाप्त


5 Comments

प्रवीण पाण्डेय · September 14, 2011 at 9:15 am

न जाने कितने राम धीरज ऐसे ही जीवन से विदा ले लेते हैं, अर्धतृप्त प्यास में।

जाट देवता (संदीप पवाँर) · September 14, 2011 at 12:20 pm

हो गया आखिरकार अतं।

डॉ. मनोज मिश्र · September 14, 2011 at 4:07 pm

मैं तो इस चरित्र में लीन हो गया था.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन · September 15, 2011 at 12:18 am

सो सैड!

आशा जोगळेकर · September 27, 2011 at 3:12 pm

ऱामधीरज के सुधरने की आशा में पूरा पढ गई, पर रामधीरज को न सुधरना था न वो सुधरा, पर कहानी पूरे समय बांधे रही ।

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