राम धीरज, वो भी ऐसे ही लोगों में था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं मिला। दाखिला मिला, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध सीएमपी डिग्री कॉलेज में (चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय)। कमरा लिया दारागंज में। घर से कम ही पैसा मिलता था। इसीलिए वो, दारागंज की उस गली में छोटे-छोटे कमरे वाले मकान के भी किचेन में रहता था। लेकिन, बहुत महत्वाकांक्षा थी। बहुत कुछ बनना-करना चाहता था। इसीलिए जिस घर में किराए पर रहता था उसी के मालिक के बेटे को भी इतना कुछ बता-समझा दिया कि उसकी यामाहा 100 उसकी सवारी बन गई। बाद में यही यामाहा 100 की सवारी उसकी मुसीबत भी बनी। जिसकी वजह से उसे अपने नाम खुदी हुई पत्थर वाली गली छोड़कर जाना पड़ा।
महत्वाकांक्षा कुछ इस कदर थी कि उसने सोचा कि उसकी किस्मत में भी लोकतंत्र में कोई न कोई चुनाव तो जीतना लिखा ही होगा। इसकी शुरुआत हुई सीएमपी डिग्री कॉलेज में नामांकन करने से। खैर, चुनाव जीते न जीते। उसे तो नेता बन जाने की धुन थी। और, ये बात तो सही ही है कि सारे नेता चुनाव जीतते ही थोड़े हैं। बस इसी धुन में खैर। सीएमपी से बीए की डिग्री लेने के दौरान वो, इतना तेज हो चुका था कि किसी तरह से लंद-फंद जुगाड़ से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला करा ही लिया। अब दाखिला कोई पढ़ाई पूरी करने के लिए तो, कराया नहीं था। दाखिला कराया था कि किसी तरह नेता बनने का मौका मिल जाए। और, नेता बनने के लिए चुनाव लड़ना तो जरूरी ही था।
लेकिन, चुनाव लड़ने के लिए उसे ऐसा पद चाहिए था जो, जीता जाए न जाए। देश के सर्वोच्च पद से मेल जरूर खाता हो। देश के सर्वोच्च पद हैं प्रेसिडेंट या फिर प्राइम मिनिस्टर। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रेसिडेंट का तो, चुनाव होता था। लेकिन, प्राइम मिनिस्टर या प्रधानमंत्री का कोई पद तो था ही नहीं। उसने इसका भी तोड़ निकाल लिया। ऐसे लोगों में दिमाग भी गजब की दिशा में 100 मीटर की रेस दौड़ता रहता है। इसी 100 मीटर की रेस में से उसे विचार सूझा कि प्राइम मिनिस्टर या प्रधानमंत्री का शॉर्ट फॉर्म प्र मं या पीएम होता है। बस प्रकाशन मंत्री का चुनाव लड़ने का उत्तम विचार अमल में लाया गया। अंग्रेजी में भी जोड़ा ठीक बैठ रहा था- पब्लिकेशन मिनिस्टर यानी शॉर्ट फॉर्म में पीएम। बस फिर क्या था- चुनाव तक राम धीरज पूरे शहर की दीवारों पर पीएम बन गया।
जेब में पैसे भी नहीं और उसके ऊपर कोई चुनाव के लिए पैसे लगाने वाला भी नहीं। लेकिन, दिमाग तेज था। इसीलिए इसका भी तोड़ निकल आया। 100 रुपए का गेरुआ रंग, ब्रश। घोल बनाया और हीरो पुक (पता नहीं पुक या पुच) पर निकल पड़े राम धीरज शहर को ये बताने कि वो, पीएम बनने की तैयारी में हैं। खैर, असल में शहर को नहीं धीरज को तो, गांव के लोगों में अपनी इज्जत बढ़ानी थी। इसलिए प्रतापगढ़ से इलाहाबाद को आने वाले रास्ते के हर पड़ाव पर खोज-खोजकर राम धीरज गेरुए रंग से खुद को पीएम बनाते रहे। ये सिलसिला रात को चलता था। सुबह तो, नेताजी हीरो पुक पर सफेद कुर्ता और पैंट पहने गमछा लटकाए घूमते थे। उसके गांव से हर किसी का घर इलाहाबाद में भी था। वजह भी साफ थी- इलाहाबाद तो, पढ़ाई से लेकर हर जरूरत के लिए बड़ा केंद्र था। और, कई गांव के लोग इलाहाबाद में नौकरी भी करते थे। उन सबके इलाहाबाद में आने का रास्ता फाफामऊ, तेलियरगंज होकर ही आता था। बस फाफमऊ, तेलियरगंज की दीवारों, होर्डिंग पर बड़े जतन से राम धीरज खुद पीएम बन गए। उसकी लाल रंग की हीरो पुक पर भी सफेद रंग से लिखा जा चुका था- राम धीरज, प्र मं। कोई नजदीकी पूछता- चुनाव लड़ रहे हो। कम से कम पद का ना तो पूरा प्रकाशन मंत्री लिखो। लेकिन, न चुनाव प्रकाशन मंत्री का जीतने की संभावना भी नहीं थी और राम धीरज की महत्वाकांक्षा भी नहीं। इसलिए वो, हमेशा प्रधानमंत्री का शॉर्ट फॉर्म ही रहा।
दरअसल वो ज्यादातर का शॉर्ट फॉर्म ही रहा। हीरो पुक भी राम धीरज की खुद की खरीदी नहीं थी। शादी गांव-देहात में जैसे होती है। वैसे ही समय से पहले हो गई थी। यानी, पढ़ाई चलते-चलते ही। बीवी, राम धीरज के मुताबिक, सुंदर नहीं थी। वैसे, राम धीरज भी कोई मायानगरी का हीरो टाइप नहीं दिखता था। लेकिन, गांव से इलाहाबाद आने की सफलता और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध सीएमपी डिग्री कॉलेज में बीएम में दाखिला मिलने की सफलता। राम धीरज को इस सबसे और इलाहाबाद आने पर सुंदर लड़कियों को देखते रहने भर से अपनी बीवी की सुंदरता घटती और अपनी हीरोगीरी बढ़ती दिखने लगी। और, इसमें उसकी बीवी बिना दोषी होते हुए भी सजा भुगतती रही। भारतीय परिवारों की तरह बीवी रहती उसके घर में ही थी। लेकिन, वो इलाहाबाद के दारागंज मोहल्ले में रहने लगा। जबकि, बीवी उसके मां-बाप और भाई-भाभी की सेवा में लगी रही। राम धीरज को एक और कष्ट था कि उसकी भाभी सुंदर है। इसीलिए जब वो इलाहाबाद से प्रतापगढ़ अपने गांव जाता भी था तो, अपनी बीवी से बेरुखी और भाभी से ही संवाद करता था।
लेकिन, इलाहाबाद पहुंचे राम धीरज को साइकिल से हीरो पुक – वही जिस पर बाद में राम धीरज त्रिपाठी, प्र मं लिखाकर घूमता था- तक पहुंचाया भी उसी बीवी ने। राम धीरज ने अपने ससुर को बीवी से प्रेम करने के भरोसे के आधार पर उससे मोटरसाइकिल की मांग कर दी। खैर, बेचारा मोटरसाइकिल तो, नहीं दहेज के तौर पर शादी के कई साल बाद हीरो पुक देने से नहीं बच पाया। क्योंकि, उम्मीद थी कि कम से कम इसी हीरो पुक के बहाने तो राम धीरज अपनी पत्नी के करीब आएगा। हीरो पुक आ तो, गई लेकिन, राम धीरज को न पत्नी के पास आना था न वो, आया। वो. हीरो पुक सीएमपी से इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचे राम धीरज के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की उड़ान में मददगार हो गई।
जारी है …

4 Comments

डॉ. मनोज मिश्र · September 13, 2011 at 12:53 pm

बढ़िया है ,जारी रखें.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · September 13, 2011 at 3:05 pm

आगे क्या हुआ…?

प्रवीण पाण्डेय · September 13, 2011 at 4:26 pm

यह वाला पीएम तो ठीक है।

आशा जोगळेकर · September 13, 2011 at 5:47 pm

रामधीरज प्र.म. की कहानी तो रोचक होती जा रही है ।

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