आर्थिक
मोर्चे पर सरकार कितना कुछ करती है। ये छोटे-बड़े आंकड़ों से समझ आता रहता है।
लेकिन, इसकी असली समझ बनती है फरवरी महीने के आखिर में जब भारत सरकार देश का बजट
पेश करती है। तब सही मायने में पता लगता है कि देश की असली स्थिति क्या है। सरकार
कितना कमा रही है। कितना घाटे में है। बजट ही ये भी बताता है कि सरकार की अगले साल
भर के लिए बड़ी योजनाओं को लेकर क्या सोच है। फिर से फरवरी महीना आ गया है। इस बार
29 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली बजट पेश करेंगे। ये इस सरकार का दूसरा पूर्ण
बजट होगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले से ही बार-बार देश की आर्थिक स्थिति का
हवाला देकर लोगों को इस बात के लिए काफी हद तक तैयार कर चुके हैं कि ज्यादा कुछ
लोगों को अच्छा लगने वाला बजट में आएगा, इसकी उम्मीद न ही करें। वित्त राज्यमंत्री
जयंत सिन्हा भी लगातार मीडिया से बात करने में ये बताते रहते हैं कि किस तरह से
मोदी सरकार देश के खजाने को दुरुस्त करने में लगी है। ये बात बड़े-छोटे वित्त
मंत्री अकसर इस सवाल के जवाब में बताते हैं कि आखिर कच्चे तेल की कीमतों में आई
इतनी बड़ी कमी का फायदा क्यों लोगों को पूरी तरह से नहीं मिल पा रहा है। इसका मतलब
ये हुआ कि आने वाला बजट पूरी तरह से सरकार के वित्तीय घाटे को दुरुस्त करने की
सरकार की उपलब्धियों के आंकड़े के इर्द गिर्द घूमेगा। अर्थशास्त्रियों की तरफ से
वित्त मंत्री को ऐसे बजट के लिए ढेर सारी वाहवाही मिल सकती है। लेकिन, यहीं वित्त
मंत्री और देश के प्रधानमंत्री को ये समझना होगा कि सरकारें अर्थशास्त्री नहीं
बनाते हैं और सरकारें बनाना जिनके हाथ में होता है, वो जनता 2019 तक रामराज्य आने का
इंतजार नहीं कर सकती। इसीलिए जरूरी है कि वित्तमंत्री मई 2014 में मिले बहुमत के
आधार पर बजट पेश करें।
अच्छी
बात ये है कि बजट से ठीक पहले आए तरक्की के आंकड़े ये पक्का करते हैं कि सरकार सही
रास्ते पर है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि वित्तीय वर्ष दो हजार सोलह में जीडीपी
सात दशमलव छह प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ेगी। पिछले वित्तीय वर्ष में ये रफ्तार सात
दशमलव दो रही है। इससे एक तो ये कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए
खास नहीं कर रही है। इस तरह की आलोचना करने वालों को जवाब मिल गया है। दूसरा ये कि
आने वाला समय भारत का ही है, ये भी तय हो गया है। क्योंकि, इस रफ्तार के साथ भारत
दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन गया है। चीन हमसे पीछे छूट गया
है। लेकिन, हमारा बाजार अभी भी चीन के सामानों से भरा पड़ा है। बजट चीन की उस
हिस्सेदारी को ध्वस्त करके वो हिस्सेदारी भारत के पक्ष में करने के रास्ते साफ-साफ
बताए। क्योंकि, भारत की आबादी की जितनी जरूरतें हैं उसमें साढ़े सात प्रतिशत की
तरक्की की रफ्तार से खुश नहीं हुआ जा सकता। इसके आठ से नौ प्रतिशत के बीच लंबे समय
तक रहने की जरूरत है। दस प्रतिशत की बात इसलिए नहीं करूंगा कि वो मनमोहिनी सपने
जैसा नजर आने लगता है। सरकार के खजाने में करों की वसूली भी अच्छी रही है। साल के
पहले आठ महीने में अप्रत्यक्ष कर वसूली चौंतीस प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। सरकारी
खजाने में चार लाख अड़तीस हजार दो सौ इक्यानबे करोड़ रुपये आए हैं। जो सीधे-सीधे
पिछले वित्तीय वर्ष के पहले आठ महीने से एक लाख करोड़ रुपये ज्यादा है। इसका सीधा
सा मतलब हुआ कि फिलहाल उद्योगों की तरक्की की रफ्तार सुधरी है। ग्रॉस टैक्स
रेवेन्यू की बात करें, तो ये करीब इक्कीस प्रतिशत बढ़ा है। प्रत्यक्ष कर यानी
सीधे-सीधे इनकम टैक्स की बात करें, तो सरकार का करीब आठ लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य
हासिल होने में थोड़ी मुश्किल दिख रही है। लेकिन, सरकार ने ये लक्ष्य आठ से साढ़े
आठ प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के आधार पर लगाया था। अब यहीं अर्थशास्त्रियों के
बजट और जनता के बजट के बीच में साफ लकीरें खिंच जाती हैं। आर्थिक आंकड़ों को देखते
हुए आयकर में ज्यादा छूट की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। लेकिन, जनता के नजरिये से आयकर
की छूट सीमा ढाई लाख से पांच लाख रुपये किया जाना जरूरी है। यहां एक बात और समझने
की है कि अभी भी नई नौकरियों के मौके बनने के बजाय ज्यादा नौकरियां चली गई हैं। ये
भी एक बड़ी वजह है कि सरकार आयकर वसूली के तय लक्ष्य से थोड़ा पिछड़ती दिख रही है।
इसलिए सरकार को अगले वित्तीय वर्ष में इस वर्ष की भरपाई करने के लिए आयकर छूट सीमा
बढ़ानी चाहिए जिससे लोगों को कर चोरी न करनी पड़े। दूसरा इतने नए रोजगार के मौके
तैयार करने होंगे, जिससे आसानी से आयकर का बढ़ा लक्ष्य हासिल किया जा सके। जनता के
नजरिये से एक और जरूरी छूट सीमा जो बढ़नी चाहिए, वो है घर कर्ज के ब्याज पर छूट की
सीमा। हालांकि, सरकार ने ब्याज पर छूट डेढ़ लाख से बढ़ाककर दो लाख रुपये कर दी है।
लेकिन, ज्यादातर निजी कंपनियों के रोजगार सृजन वाले शहरों में औसत घर की कीमत
चालीस-पचास लाख रुपये के आसपास है। और इस लिहाज से कम से कम इस छूट सीमा का पचास
हजार रुपये और बढ़ाना जरूरी है। बच्चों की स्कूल फीस पर मिलने वाली छूट भी इसी
अनुपात में बढ़ना जरूरी है। वित्त मंत्री के आर्थिक नजरिये से ये सारे सुझाव खजाने
में आने वाली रकम कम करेंगे। लेकिन, ये सोच सही नहीं है। क्योंकि, जनता को इस
सरकार पर भरोसा है। उसी भरोसे की वजह से वित्तीय वर्ष दो हजार सोलह में अनुमानित
सात दशमलव छह प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार में निजी खर्चों के बढ़ने की रफ्तार भी
सात दशमलव छह प्रतिशत ही अनुमानित है। वो भी तब जब तरक्की की रफ्तार सात दशमलव दो
प्रतिशत से बढ़कर सात दशमलव छे प्रतिशत होती दिख रही है। लेकिन, जजनता की जेब जितना
आया उससे ज्यादा खर्च कर रही है। पिछले वित्तीय वर्ष में निजी खर्च छह दशमलव दो
प्रतिशत बढ़ा था। यानी दशमलव चार प्रतिशत जीडीपी बढ़ी, तो निजी खर्च करीब डेढ़
प्रतिशत बढ़ गया। यूपीए दो के आखिरी दिनों में जनता इस कदर घबरा गई थी कि वो खर्च
करने से बचने लगी थी। जाहिर है निजी खर्च उसी जनता की कमाई रकम में से हो रहा है।
जिस पर सरकार तय कर वसूल चुकी है। और दूसरे रास्तों से भी वो सरकार का खजाना भरने
में मदद कर रहा है।

दरअसल
असली दिक्कत सरकारी खर्च बढ़ाने की है। वित्तीय वर्ष दो हजार पंद्रह में बारह
दशमलव आठ प्रतिशत सरकारी खर्च बढ़ा था। जो इस वित्तीय वर्ष में घटकर तीन दशमलव तीन
प्रतिशत ही बढ़ा है। अगर सरकारी खर्च भी इस रफ्तार से बढ़ा होता, तो बड़ी आसानी से
साढ़े आठ प्रतिशत के आसपास का तरक्की का लक्ष्य हासिल किया जा सकता था। सात दशमलव
छह प्रतिशत की जीडीपी के बढ़ने में कंस्ट्रक्शन का हिस्सा घटा है। पिछले वित्तीय
वर्ष में चार दशमलव चार प्रतिशत की रफ्तार से तरक्की करने वाले कंस्ट्रक्शन उद्योग
की इस साल तरक्की की रफ्तार तीन दशनलव सात प्रतिशत ही रहने का अनुमान है। हालांकि,
इससे ज्यादा चिंतित होने की जरूरत इसलिए नहीं है कि ये कमी रियल एस्टेट क्षेत्र
में कमजोरी दिख रहा है। और ये कमजोरी रियल एस्टेट में काला धन पर लगी रोक का साफ
नतीजा है। इसलिए काला धन से कंस्ट्रक्शन सेक्टर की रफ्तार बढ़ाने के बजाए सरकार
कोशिश ये करनी चाहिए कि रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पर अंकुश लगे। प्रोजेक्ट डिलीवरी तय
समय पर हो सके। अच्छी बात है कि मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार बेहतर हुई है। मैन्युफैक्चरिंग
के बढ़ने की रफ्तार साढ़े पांच प्रतिशत से बढ़कर साढ़े नौ प्रतिशत होने की उम्मीद
है। मतलब मेक इन इंडिया काम कर रहा है। मेक इन इंडिया के लिए रास्ता बनाने का काम
भी अच्छे तरीके से चल रहा है। सड़क निर्माण मंत्री नितिन गडकरी ने छियानबे हजजार
किलोमीटर के राष्ट्रीय राजमार्ग को बढ़ाकर डेढ़ लाख किलोमीटर करने का लक्ष्य लिया
था। अब उसे बढ़ाकर एक लाख पचहत्तर हजार किलोमीटर कर दिया। बिजली के मोर्चे पर भी
पीयूष गोयल बेहतर काम कर रहे हैं। बिजली-सड़क की स्थिति इस सरकार में बेहतर हो रही
है। रोजगार में मामले में हालात अभी भी बहुत अच्छे नहीं हैं। इस बजट में उस मोर्चे
को दुरुस्त करने के साफ संकेत भी दिखने चाहिए। स्किल इंडिया बेहद महत्वाकांक्षी और
वक्त की जरूरत वाली योजना है। लेकिन, इस कौशल मिशन से कितने लोगों को रोजगार मिल
पाया है। ये अभी शोध का विषय है। कुल मिलाकर देखें तो अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी
है कि बजट में अर्थशास्त्रियों की सकारात्मक टिप्पणी मिलनी ही चाहिए। लेकिन, उनकी
सकारात्मक टिप्पणी के चक्कर में देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में भरोसा जमा रही
जनता का भरोसा नहीं टूटना चाहिए। बजट लोकप्रिय बनाने के चक्कर में लोकलुभावन
योजनाओं का एलान करने की जरूरत नहीं है। हां, जनता के पूर्ण बहुमत से चुनी सरकार
के पांच में से करीब ढाई साल पूरे होने को हैं। ये अहसास जनता को जरूर हो। क्योंकि,
जनता को ये अहसास होना बंद हो गया तो अच्छी नीतियां लागू करने का मौका भी मिलने से
रहा।

Related Posts

राजनीति

बुद्धिजीवी कौन है?

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के बुद्धिजीवियों को भाजपा विरोधी बताने के बाद ये सवाल चर्चा में आ गया है कि क्या बुद्धिजीवी एक खास विचार के ही हैं। मेरी नजर में बुद्धिजीवी की बड़ी सीधी Read more…

राजनीति

स्वतंत्र पत्रकारों के लिए जगह कहां बची है?

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बुद्धिजीवियों पर ये आरोप लगाकर नई बहस छेड़ दी है कि बुद्धिजीवी बीजेपी के खिलाफ हैं। मेरा मानना है कि दरअसल लम्बे समय से पत्रकार और बुद्धिजीवी होने के खांचे Read more…

अखबार में

हत्या में सम्मान की राजनीति की उस्ताद कांग्रेस

गौरी लंकेश को कर्नाटक सरकार ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ अन्तिम विदाई दी। गौरी लंकेश को राजकीय सम्मान दिया गया और सलामी दी गई। इस तरह की विदाई आमतौर पर शहीद को दी जाती Read more…