मैं पहली बार किसी फिल्म पर लिख रहा हूं। ऐसा नहीं है कि इसके पहले ऐसी अपील वाली कोई फिल्म नहीं देखी हो। फिल्म बहुत अच्छी है। लेकिन, पेज-3 के बाद ‘मेट्रो’ की कहानी ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर ‘मेट्रो’ का रास्ता किधर जाएगा। इसीलिए मैं ये लिख रहा हूं और ये फिल्म की समीक्षा बिल्कुल नहीं है।

कहानी बंबई नगरिया की है। ज्यादातर उन्हीं लोगों की कहानी है जो, छोटे शहरों से ‘मेट्रो’ में कमाई करने के लिए आते हैं। कमाई इतनी हो सके कि उनके अपने छोटे शहर में रूतबा कायम हो सके और ‘मेट्रो’ में किसी तरह दो बेडरूम का फ्लैट लिया जा सके। इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत ये है कि छोटे शहरों से आकर महानगरों में बसने वाले (या कुछ समय के लिए रहने वाले ) लोगों में से चालीस प्रतिशत को ये अपनी कहानी लगती है या फिर साठ प्रतिशत मेरे जैसे लोगों को इस कहानी के पात्र अपने आसपास नजर आते हैं। फिल्म है इसलिए मजबूरी है कि एक साथ ही सारे पात्रों को जोड़कर दिखाना पड़ता है।

फिल्म की कहानी पेज-3 की कहानी को ही आगे बढ़ाती है। एक हैंडसम-स्मार्ट रेडियो जॉकी के गे होने को कहानी का हिस्सा बनाने से कुछ पुरानी बात को ही दुहराने जैसा लगता है लेकिन, शायद ये हमारे समाज में इतनी जगह बना चुके हैं कि हम इन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते । लेकिन, फिल्म में कोंकणासेन का वो डायलॉग इस गे समाज को ध्यान में रखना होगा कि आपकी जिंदगी और आपकी मर्जी है कि आप कैसे जियें लेकिन, किसी की जिंदगी खराब करने का अधिकार नहीं मिल सकता ।
फिल्म में शिल्पा शेट्टी यानी शिखा की भूमिका और कहानी के अंत में पति की सारी काली करतूतों के बाद शिखा के पति को ही अपनाने की कहानी चुभती है। लेकिन, फिल्म में दिखा बदलाव साफ संदेश देता है कि शिखा अपने पति को नहीं अपनाती वो अपनी बच्ची के उस पिता को अपनाती है जो, इसकी बच्ची को बहुत प्यार करता है।

फिल्म में शरमन जोशी यानी राहुल का किरदार शायद आज की भागती-दौ़ड़ती ‘मेट्रो’ की जिंदगी का सबसे व्यवहारिक चरित्र है। जो, अपनी सफलता के लिए कुछ भी करने को तैयार है। लेकिन, खुद उस गंदगी से उतना ही दूर है। लेकिन, जब दूसरों की गंदगी खुद उसी के हिस्से में आ जाती है तो, फिर जिस तरह से वो सबकुछ छोड़ देने को तैयार हो जाता है। वो ‘मेट्रो’ में रह रहे लोगों के उस छोटे शहर के आदमी के बचे हुए जमीर की वजह से है जो, मेट्रोज में जिंदगी की जद्दोजहद में चुक जाने के बाद भी कभी-कभी जाग उठता है।

कंगना रनाउत यानी निशा इस फिल्म का अकेला ऐसा चरित्र है जो मुझे किसी भी जगह पर सही नहीं लगा। निशा एक ऐसी लड़की है जो, मेट्रोज के ज्यादातर ऑफिसेज में मिल जाएगी। हो, सकता है कि इतना फिल्मी चरित्र न हो। ऐसा ही कुछ मिलता-जुलता चरित्र है शाइनी आहूजा का। जो, ये जानते हुए भी शिल्पा शेट्टी को प्रोवोक करने की कोशिश करता है कि वो शादीशुदा है। फिल्म में इसे शिल्पा की बदतर हुई जिंदगी से सही साबित करने की कोशिश की गई है।

फिल्म की जान है इरफान का चरित्र। जो, कहता है कि चांस तो लेना ही पड़ेगा। कोंकणा को ये समझाने वाला डायलॉग कि सड़क पर गाड़ी निकालोगे ही नहीं तो, रेड-ग्रीन सिग्नल कहां है इसका पता कैसे चलेगा। इरफान यानी मोंटी की ये बात भी संदेश देती है शादियों में होती देर के बाद क्या-क्या मुश्किलें आ सकती हैं। 35 साल का ऐसा आदमी जिसने किसी लड़की को छुआ न हो, उसका व्यवहार तो ऐसा ही होगा न जैसे परदे में रहने वाली चीज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की इच्छा। ये कहीं से भी किसी व्यक्ति के चरित्र को आंकने का पैमाना नहीं हो सकता कि वो कैसे विपरीत लिंग के लोगों को देखता है।

फिल्म में के के का चरित्र खांटी पुरुष का चरित्र है जो, ये तो चाहता है कि वो बार-बार दूसरी लड़की-महिला के बिस्तर में खुशी तलाशकर लौटे और उसकी बीवी हर बार उसके साथ नई शुरुआत के लिए राजी हो जाए। लेकिन, जब बीवी उसी की वजह से किसी जगह भावनात्मक आश्रय तलाशने लगे तो, उसके पुरुष मन को ये डंक लग जाए कि मेरी बीवी किसी दूसरे के बिस्तर पर सोई, भले ही वो उस पति की तरह अपना जमीन बेचकर न आ रही हो। ऐसा नहीं है कि मैं बीवी के किसी दूसरे के साथ जाने को सही ठहराने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन, अगर कोई पति इस तरह का व्यवहार करे तो, बीवी से अच्छे व्यवहार की उम्मीद तो नही करे।

अब मेरी परेशानी की बात कि आखिर ये ‘मेट्रो’ का रास्ता जाता किधर है। फिल्म संवेदनशील थी, फिल्म में अच्छे-बुरे पहलू दिखाकर लोगों को संवेदना जगाने और उसे सही दिशा में ले जाने की कोशिश है। लेकिन, मैं जिस हॉल में फिल्म देख रहा था। वहां, बड़ा दर्शक वर्ग फिल्म के हर ऐसे दृश्य में जहां संवेदना जगाने की कोशिश थी, वहां वो छिछली टिप्पणियां कर रहे थे। यानी साफ है कि समाज को अपने बीच में ऐसी घटनाएं आसानी से पचने लगी हैं। यहां तक कि टूटते परिवारों की बात भी उन्हें संवेदनशील नहीं बनाती। मेट्रो में रह रहा ये नौजवान एक शादीशुदा आदमी के अलग-अलग लड़कियों से संबंध पर न सिर्फ हंस रहे थे बल्कि, इच्छा जाहिर कर रहे हैं कि काश मुझे भी ऐसा मौका मिलता।

फिल्म में के के मेनन यानी शिल्पा के पति जैसे चरित्र वाले लोग समाज में बढ़ रहे हैं तो, कंगना रनाउत यानी निशा जैसी चरित्र वाली लड़कियां भी बढ़ी हैं। शायद इसीलिए जब इनके ऊपर बीतती है तो, ये खुद रोते हैं अपनी संवेदना के साथ खिलवाड़ होने पर समाज को दोष भी देते हैं- आत्महत्या करने की कोशिश करते हैं। लेकिन, बगल में ऐसी घटना पर वो हंसते हैं कि ये तो, हर रोज की बात है।

बस मुझे यही डर लगता है कि सारे बड़े-छोटे शहर अगर ‘मेट्रो’ की राह पर ही चल निकले तो, येरास्ता किधर जा रहा है। क्योंकि, ‘मेट्रो’ तो फिल्म थी, उसे दर्शक जुटाने थे फिल्म चलानी थी। इसलिए फिल्म खत्म होते-होते सब अच्छा हो गया। लेकिन, ‘मेट्रो’ में रह रहे लोगों की जिंदगी कोई तीन घंटे की फिल्म तो है नहीं। जिंदगी एक बार ‘मेट्रो’ के तैयार किए रास्ते पर चल निकली तो, हाल बेहतर मुश्किल से ही हो पाता है। इसलिए चिंता यही है कि आखिर किधर जाएगा ‘मेट्रो’ का ये रास्ता। फिर भी उम्मीद के लिए फिल्म में मोंटी यानी इरफान का वही डायलॉग याद करता हूं कि चांस तो लेना ही पड़ेगा।


7 Comments

Manish · May 14, 2007 at 4:20 am

बढ़िया समीक्षा की है आपने भाई !

संजय बेंगाणी · May 14, 2007 at 6:53 am

अब फिल्म देखनी पड़ेगी.

परमजीत बाली · May 14, 2007 at 7:34 am

हमे भी फिल्म देखनी पड़गी।बढ़िया समीक्षा की है ।

कमल शर्मा · May 14, 2007 at 9:42 am

शानदार समीक्षा, पता नहीं था कि बिजनैस जैसे रसविहिन विषय में डुबे रहने के बाद फिल्‍म पर इतना बढि़या लिखेंगे। लिखते रहिए…. मजा आया।

गिरिजेश · May 14, 2007 at 4:46 pm

ये समीक्षा नहीं तो क्या है पंडीजी!
एक्टिंग कैसी है, कैमरा-वर्क कैसा है, डायरेक्शन कैसा है- ये सब बतानेवाली समीक्षा पुरानी हो गई। असली समीक्षा तो वही है जहां हम फिल्म से अपने लिए take-away की बात करें। और इस फिल्म के लिए तो ये बात इसलिए भी सही है क्योंकि ये मेट्रो में लाइफ की बात करती है।
आपका ये खर्रा आम दर्शक के लिए ज्यादा दिलचस्प है क्योंकि इसमें नज़रिया एक आम दर्शक का ही है, किसी तथाकथित फिल्मी विशेषज्ञ का नहीं।
अनुराग बासु को आपका धन्यवादग्रस्त होना चाहिए क्योंकि ये सब पढ़ने के बाद कई मित्रों की तरह मैने भी ये फिल्म देखने का मन बना लिया है।
अंत में- मैं बड़ा होकर आप जैसा समीक्षक बनना चाहता हूं:)

rajeev · May 14, 2007 at 5:35 pm

metro mei kya sachmuch logon ko apne kaam ke alawe sachmuch ye sab karne ka samay mil jata hai? aur khakar wo log jo ki bahar se metro mei aate hain..aur unhen chulha jalane aur room rent ki chinta hoti hai..han main manta hun yahan awsaron ki kami nahi hai…khair pahle main film dekh leta hun.

Bikas Mishra · May 18, 2007 at 5:34 pm

आपका लिखा पसंद तो आता ही था, आपने किसी फिल्म पे लिखा, ये बात भी पसंद आई। फिल्म मुझे भी काफी अच्छी लगी, और इसके किरदार भी आसपास मंडराते नजर आए। मेट्रो काफी हद तक नैतिकता के बदलते पैमाने का आइना जैसी लगती है, लेकिन हमारे जमाने की असलियत दिखाने की बजाय अनुराग बासु भीड़ को नाराज नहीं करने के इरादे से शिखा को वापस उसके पति तक भेज देते हैं। शायद ये भी बड़ी सच्चाई है, रिश्तों की घुटन से कसमसाते लोग भी अक्सर बाहर निकलने की बजाय वहीं दम तोड़ना ज्यादा पसंद करते हैं।
आपकी अगली फिल्म समीझा की प्रतीक्षा होगी।

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