रवि रतलामी जी से पहली बार मुलाकात कुछ दिन पहले हुई। वर्चुअली यानी नेट के जरिए तो, बहुत पहले से भेंट है लेकिन, आमने-सामने की पहली मुलाकात मुंबई में संभव हुई। वो, भी तब जब मैंने मुंबई साढ़े चार साल के बाद छोड़कर दिल्ली का रुख कर लिया। मुलाकात में मैंने उनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की पत्रिका बरगद की एक प्रति दी। जिसमें वेब जर्नलिज्म पर मेरा भी एक लेख है। रविजी ने कहा- इसे अपने ब्लॉग पर क्यों नहीं डालते हैं। अभी चिट्ठा चर्चा पर गया तो, उनकी चिट्ठा चर्चा देखा तो, फिर याद आ गया। ये फरवरी में लिखा गया लेख है।

भविष्य का मीडिया है वेब जर्नलिज्म

 भारत में इंटरनेट पत्रकारिता अभी अपने शैशवकाल में है। लेकिन, अगले 10 सालों में ये माध्यम मजबूत और विश्वसनीय माध्यम बनकर उभरने वाला है। इस माध्यम की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें टीवी मीडिया की तेजी और अखबार की ज्ञान बढ़ाने वाली पत्रकारिता दोनों का अच्छा गठजोड़ है। इंटरनेट की बढ़ती महत्ता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शायद ही आज कोई ऐसा बड़ा अखबार या टीवी चैनल होगा- जिसकी अपनी वेबसाइट नहीं है। यहां तक कि राज्य और जिला स्तर का मीडिया भी तुरंत चाहता है कि इंटरनेट पर उसकी उपस्थिति हो। लेकिन, इंटरनेट पत्रकारिता- टीवी और अखबार दोनों से ही कई मायने में अलग है।

अखबार जहां सिर्फ पत्रकारिता यानी खबर लिखना और उसे छपने के लिए दे देना भर होता है। वहीं टीवी एक टीम वर्क होता है जहां किसी खबर के आने से लेकर उसके दर्शकों तक पहुंचने की एक लंबी प्रक्रिया होता है और उसे किसी की भी एक छोटी सी गलती बड़ी से बड़ी खबर का बंटाधार हो जाता है। लेकिन, नेट की पत्रकारिता इन दोनों ही माध्यमों से बिल्कुल अलग है। अभी चूंकि ये अपने शुरुआती दौर में है इसलिए ज्यादातर न्यूज वेबसाइट किसी अखबार या फिर टीवी चैनल की ही खबरों को इंटरनेट पर बेहतर तरीके से सजाकर पेश कर रहे हैं। लेकिन, जैसे-जैसे देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ेगी और बड़े-छोटे शहरों से निकलकर इंटरनेट गांव-कस्बों तक पहुंचेगा तो, न्यूज वेबसाइट को इसके लिए अलग से लोगों को रखने की जरूरत होगी। एक अनुमान के मुताबिक, 2008 के आखिर तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 5 करोड़ तक पहुंच गई है। अगर इसमें मोबाइल के जरिए नेट का इस्तेमाल करने वाले भी जोड़ दिए जाएं तो, ये संख्या 5 करोड़ से ज्यादा होनी चाहिए।

इंटरनेट पहले तो, पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के जाननने वालों की ही बपौती था। लेकिन, अब इसमें दूसरी भाषाओं के लिए भी संभावनाएं बढ़ रही हैं। इसको इसी से समझा जा सकता है कि 1998 के बाद से अंग्रेजी वेबसाइट की तुलना में गैर अंग्रेजी वेबसाइट ज्यादा शुरू हो रही हैं। यूनिकोड के आने के बाद इंटरनेट पर हिंदी का विकास भी तेजी से हुआ है। अब तो ज्यादातर कंपनियां लैपटॉप और डेस्कटॉप को हिंदी भाषा के साथ आसानी से काम करने वाला बना रही हैं। क्योंकि, उन्हें पता है कि दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाली हिंदी भाषा के बिना आने वाले में जमाने में उनका बाजार नहीं बन सकता।

दुनिया भर में 50 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। इसमें हिंदी जानने-समझने वालों को भी शामिल किया जाए तो, ये संख्या 80 करोड़ से ज्यादा हो जाती है। भारत से बाहर अमेरिका में हिंदी बोलने वाले एक लाख से ज्यादा हैं तो, मॉरीशस जैसे देश में करीब सात लाख लोग हिंदी ही बोलते हैं। दक्षिण अफ्रीका में हिंदी बोलने वाले करीब 9 लाख लोग हैं। सिंगापुर, यमन, युगांडा, न्यूजीलैंड, जर्मनी में भी हिंदी जानने-समझने वाले कम नहीं हैं। जाहिर है ये सारे लोग हिंदी खबरें देने वाले अखबार या टीवी आसानी से इन तक पहुंच नहीं बना सकते। लेकिन, इंटरनेट से तो, दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने से अपने काम की खबर चुन सकता है। और, यही इंटरनेट पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।

हिंदी मीडिया में इंटरनेट इसलिए भी और उपयोगी हो जाता है क्योंकि, हिंदी न्यूज चैनलों की अंधी TRP (Television Rating Points) की रेस में जिस तरह से बिना सोचे समझे खबरें परोसीं जा रही हैं उसमें खबरों की विश्वसनीयता और उसका प्रभाव कम हो रहा है। ऐसे में तुरंत खबर और पूरी समझ के साथ विश्लेषण देने की क्षमता रखने वाली इंटरने पत्रकारिता बेहद प्रभावी हो सकती है।

वेब पत्रकारिता की एक और खूबी ये कि इसमें गंभीर लेख और गंभीर पाठक दोनों का गजब का मेल होता है। भारत में वेब जर्नलिज्म को अभी करीब दशक भर ही हुए हैं। लेकिन, देश में न्यूज वेबसाइट की खबरों पर लोगों का भरोसा बढ़ रहा है। यहां तक कि खुद टीवी चैनल और अखबार भी इसीलिए अपना इंटरनेट एडिशन शुरू करते हैं जिससे एक अलग वर्ग में उनकी पहचान बने। नेट पर अंग्रेजी जानने वालों की पकड़ पहले से ही है। इसलिए शुरुआत में अंग्रेजी की ही न्यूज वेबसाइट शुरू हुईं। तरुण तेजपाल के tehelka.com ने इंटरनेट मीडियम को सुर्खियों में लाया लेकिन, उसके बहुत पहले 1995 में चेन्नई से निकलने वाले The Hindu ने अपना इंटरनेट एडिशन शुरू कर दिया।

अब देश के 50 से ज्यादा अखबार हैं जिनके इंटरनेट एडिशन हैं। क्योंकि, अखबार में जहां खबरों को संभालकर रखने की कवायद करनी होती है। वहीं टीवी में हर मिनट बदलने वाली खबर असर नहीं कर पाती। ऐसे में इंटरनेट पर लिखी गई खबर हमारी-आपकी – कहीं भी, कभी भी- वाली स्वतंत्रता और अपनी मर्जी की खबर पढ़ने की इच्छा पूरी करती है। अब तो ज्यादातर टीवी चैनल अपने वीडियो भी वेबसाइट पर डाल देते हैं और, इस बात का जमकर प्रमोशन भी करते हैं कि अमुक वीडियो आप कभी भी हमारी वेबसाइट पर देख सकते हैं। नेटवर्क 18 का हाल ही में शुरू हुआ पोर्टल in.com और cnn ibn की वेबसाइट ibnlive.com इसका बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं। ये इटरनेट की ताकत है कि bbc.com 32 भाषा में पढ़ने को मिल सकता है।

लेकिन, इंटरनेट की ये पत्रकारिता वरदान है खासकर बिजनेस पत्रकारिता के लिए। ग्लोबलाइजेशन के बाद बिजनेस की खबरों को जानने समझने की इच्छा सबमें बढ़ी है। क्योंकि, जेब में पैसा बढ़ाने की जुगत हर कोई खोज रहा है। अब अगर ये समझ उसे कभी भी, कहीं भी- अपनी सहूलियत से मिले तो, उसकी पहुंच और असर बढ़ जाता है। और, आज जब देश के हर कोने से लोगों की बिजनेस-बाजार में रुचि बढ़ी है तो, हिंदी में बिजनेस की खबरों का बाजार भी बड़ा हुआ है।

देश के पहले बिजनेस चैनल cnbc tv18 ने इसीलिए 13 जनवरी 2005 में हिंदी में बिजनेस का चैनल cnbc आवाज़ शुरू किया जो, 2008 आते-आते अपने ही अंग्रेजी चैनल cnbc tv18 से भी बड़ा हो गया। और, देश का नंबर एक बिजनेस चैनल बन गया। अब चार साल पूरे होने पर आवाज़ ने हिंदी में बिजनेस की सारी खबरें देने के लिए www.awaazkarobar.com शुरू किया। इस वेबसाइट की सबसे बड़ी खासियत ये है कि आवाज़ चैनल पर दिखने वाली हर खबर यहां विस्तार से दिखती है और, शायद ये अकेली वेबसाइट होगी जिस पर टीवी की तरह मार्केट और बिजनेस एनालिस्ट की राय वीडियो और टेक्स्ट दोनों ही तरीकों में मिल जाती है। ये एक अनोखा प्रयोग है। यही वजह है कि www.awaazkarobar.com अपनी शुरुआत के महीने भर में ही हिंदी की नंबर एक बिजनेस वेबसाइट बन गई है।

इंटरनेट मीडिया के बढ़ने की एक और बड़ी वजह है इसकी इंटरैक्टिविटी। इस माध्यम का जितना बेहतर इस्तेमाल लोगों का मीडियम बनने में किया जा सकता है उतना, किसी और मीडिया का नहीं। ज्यादातर वेबसाइट खुद को ज्यादा से ज्यादा इंटरैक्टिव बनाने की कोशिश कर रही हैं। इसमें किसी खास वक्त पर किसी खास मेहमान से किसी खास विषय पर होने वाली ऑनलाइन चैट हो, हर रोज के ज्वलंत, समसामयिक मुद्दे पर चैट हो या इंटरनेट की हर खबर पर पाठकों की राय। ये ऐसी चीज है जिससे पढ़ने वाले को ये अहसास होता है कि हमारी कही गई बात की अहमियत है तो, वो उस खास वेबसाइट से ज्यादा जुड़ाव महसूस करता है।

इंटरनेट से परिचय किसी का भी सबसे पहले e-mail के जरिए होता है। और, इस ताकत को बखूबी पहचाना है rediff.com और yahoo.com जैसी वेबसाइट ने। दोनों ही जगहों पर असली मायने में इंटरनेट की पत्रकारिता और खबरों का अंदाज देखने को मिलता है। होमपेज पर ही login करने से पहले ही खबरों का भंडार इस रोचक अंदाज में परोसा होता है कि एक बार आप उसमें घुसे तो, खबरों के जाल से बाहर निकलने में फिर काफी समय लग जाता है। यही वजह है कि rediff.com भारत की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली न्यूज वेबसाइट में शामिल है। खासकर NRI (non resident indian) को तो ये बेहद पसंद है। यहां हर खबर को पड़ने की मारामारी भी नहीं होती है। बड़ी खबरों के अलावा इनके रिपोर्टर देश के अलग-अलग हिस्सों से रोचक खबरों को अलग अंदाज में पेश करते हैं। yahoo.com पर अंग्रेजी में खबरें मिलती हैं तो, हिंदी खबरों के लिए yahoo ने जागरण अखबार की वेबसाइट jagran.com से समझौता किया है।

लेकिन, अच्छी वेब पत्रकारिता के लिए जरूरी है कि इंटरनेट और कंप्यूटर के बारे में भी अच्छी जानकारी हो। क्योंकि, खबर लिखने के अंदाज के साथ ये भी जरूरी है कि वो, अलग-अलग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने वालों को बेहतर तरीके से दिखे भी। अगर वेबसाइट में वीडियो का इस्तेमाल है तो, ये भी जरूरी है कि उसकी साइज इतनी बड़ी न हो कि वो, कम स्पीड वाले नेट पर चल ही न पाए क्योंकि, अभी भारत में बहुत कम स्पीड वाली सर्विस ही उपलब्ध है। 3जी आने के बाद इस स्थिति में बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इसके अलावा वेब जर्नलिस्ट के लिए ये बहुत जरूरी है कि वो, ये सुनिश्चित करेकि उसकी खबर सर्च इंजन में कैसे ऊपर के पन्नों पर आए। इसके लिए जरूरी है कि ऐसे की वर्ड डाले जाएं जिसका इस्तेमाल किसी जानकारी के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग करते हों।

इंटरनेट की पत्रकारिता का एक और खास पहलू है ब्लॉगिंग। अभी वैसे ब्लॉगरों को जर्नलिस्ट माना जाए या न माना जाए- इस पर बड़ी बहस चल रही है। लेकिन, जब मीडिया घरानों पर पक्षपात किसी खास औद्योगिक घराने, पक्ष, पार्टी के साथ खड़े होने से भरोसा डगमगाता हो तो, स्वतंत्र ब्लॉगर भरोसा जगाते हैं। अच्छी बात ये है कि आप बाध्य नहीं होते। आप चार ब्लॉगरों के विचार जान-पढ़कर उनसे निष्कर्ष निकाल सकते हैं। और, अब तो किसी भी बड़े-छोटे (अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय-स्थानीय) मुद्दे पर ब्लॉगरों की राय काफी अहम रोल निभाती है। इस समय देश में 10 हजार से ज्यादा हिंदी ब्लॉगर हैं।

यही सब वजहें हैं कि वेब जर्नलिज्म आने वाले दिनों में सबसे मजबूत माध्यम बनकर उभरेगा। सस्ते होते लैपटॉप, डेस्कटॉप, सस्ता इंटरनेट और तेज स्पीड इंटरनेट कनेक्शन, ये सब मजबूत वेब जर्नलिज्म के मददगार बनेंगे। लेकिन, अभी इसे बहुत लंबा रास्ता तय करना है। क्योंकि, Internet and Mobile Association of India और IMRB के एक सर्वे के मुताबिक, भारत में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं की कुल 1249 वेबसाइट ही हैं। सफर लंबा लेकिन, भविष्य उज्ज्वल है।


4 Comments

संजय तिवारी ’संजू’ · September 13, 2009 at 3:32 pm

आपको हिन्दी में लिखता देख गर्वित हूँ.

भाषा की सेवा एवं उसके प्रसार के लिये आपके योगदान हेतु आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey · September 13, 2009 at 3:38 pm

आवाज की साइट अच्छी है।

समयचक्र · September 13, 2009 at 3:49 pm

apke vicharo se sahamat hun. abhaar.

बी एस पाबला · September 13, 2009 at 4:04 pm

निश्चित तौर पर आने वाला समय वेब पत्रकारिता का है

बी एस पाबला

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