ये पूरा
सत्र साफ होता दिख रहा है। देश में भले ही कुछ ही इलाकों में बारिश से बाढ़ के
हालात बने हों। लेकिन, अगर संसद की बात करें तो, पूरा का पूरा सत्र बाढ़ में बहता दिख रहा है। बड़े सुधारों को कानून
का रूप देने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती है। हालात ये हैं कि बमुश्किल बातचीत
हो जाए यही बहुत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत
से आई सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। पार्टी के भीतर भी वो सर्वोच्च
नेता हैं। संगठन में नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह कमान संभाले हैं। ऐसे में
किसी भी तरह के दबाव की बात मानना संभव नहीं है। फिर क्या है कि ये नरेंद्र मोदी
की सरकार लग नहीं रही है। अभी तक ऐसा मानने वाले मन ही मन ये बात कर रहे थे। लेकिन, अब ये खुली चर्चा का
विषय है कि क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है, जिसे जनता ने पूर्ण बहुमत देकर मई 2014 में सत्ता
में बिठाया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसे जनता ने ये सोचकर सत्ता
दी थी कि ये प्रधानमंत्री पहले के एक दशक के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह
व्यवहार नहीं करेगा। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने की आहट से
भारतीय शेयर बाजार बल्लियों उछल गया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है
जिसके आने की आहट भर से दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियों ने भारत को लेकर अपना रूख
सकारात्मक कर लिया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जो, दुनिया के सबसे
शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपना दोस्त करता था। जिससे
भारतीयों को गजब का गर्व बोध हुआ था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके
राज में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सपत्नीक आते हैं और अहमदाबाद के रिवरफ्रंट
पर बैठकर भारत की बढ़ती ताकत स्वीकारते हैं। साथ चलने की बात करते हैं। क्या ये
वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने भर से ये माना जा रहा था कि पाकिस्तान की
नापाक हरकतों पर साबित लगाम लगेगी। इन सब सवालों का जवाब खोजेंगे तो, जवाब सीधे तौर पर
आएगा कि नहीं ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है। हालांकि, प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ही हैं। और वही वाले नरेंद्र मोदी हैं। लेकिन, फिर भी ये नरेंद्र
मोदी की सरकार नहीं है।

अपने मन
की बात बोलने के लिए जाने जाने वाले उद्योगपति राहुल बजाज ने जब कहा कि ये नरेंद्र
मोदी की सरकार नहीं है तो, ये सवाल और बड़ा हो गया। क्योंकि,
राहुल बजाज उन उद्योगपतियों में से रहे हैं जो, यूपीए के शासन में
रहते ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की वकालत करते थे। सिर्फ
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की वकालत ही नहीं करते थे। राहुल बजाज साफ साफ
कहते थे कि यूपीए के शासन के भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए मोदी का आना जरूरी
है। वही राहुल बजाज अभी भी ये मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी तौर
पर बेहद ईमानदार हैं। लेकिन, इस राज में भी बिना पैसे दिए काम नहीं हो रहा है। हां, ये बात खुलकर बोलने
में सब डर रहे हैं। जब नरेंद्र मोदी सरकार की एक साल के कामकाज की समीक्षा हो रही
थी तो, मोदी ने
छाती ठोंककर एक बात कही थी कि और कुछ भी हुआ हो। लेकिन, एक बात पर तो कोई
बहस नहीं है कि इस सरकार में कोई घोटाला नहीं हुआ। इस सरकार का कोई मंत्री दागदार
नहीं है। ये आज भी सच्चाई है। लेकिन, इस सच्चाई पर नरेंद्र मोदी की सरकार से बिना वास्ते वाली बातें ऐसे
चिपकी कि लग रहा है जैसे मोदी राज में सिर्फ और सिर्फ घोटाले हो रहे हैं। मध्य
प्रदेश के व्यापम से लेकर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे तक का मसला ऐसा ही है।
इसमें कहीं भी नरेंद्र मोदी का न तो व्यक्ति के तौर पर या प्रधानमंत्री के तौर पर
कोई योगदान है लेकिन, शक के दायरे में सीधे नरेंद्र मोदी आ जाते हैं। क्योंकि, उन्होंने कार्रवाई
नहीं की। विरोधी छोड़िए, नरेंद्र मोदी के घोर समर्थक भी कार्रवाई करने में आड़े आने वाले
राजनीतिक समीकरणों को जरा सा भी मानने को तैयार नहीं हैं। और जब नरेंद्र मोदी
कार्रवाई नहीं करते हैं तो, ये सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है। जबकि, सच्चाई आज भी यही है
कि खुद प्रधानमंत्री से लेकर उनके महत्वपूर्ण मंत्रियों में से किसी पर भी कोई
गंभीर आरोप बेईमानी के नहीं हैं। फिर वो वित्त मंत्री अरुण जेटली हों, विदेश मंत्री सुषमा
स्वराज हों, रक्षा
मंत्री मनोहर पर्रिकर हों, रेल मंत्री सुरेश प्रभु हों। भूतल परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग के
मंत्री नितिन गडकरी को भले ही आरोपों के चलते अध्यक्ष का कार्यकाल फिर न मिल हो।
लेकिन, अभी तक
कोई भी आरोप उनके ऊपर साबित नहीं हो पाया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज
सिंह को लेकर भले ही नाना प्रकार की चर्चाएं मीडिया में आईं। और उसके बाद खुद गृह
मंत्री को बयान देना पड़ा। लेकिन, गृह मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह पर भी कोई आरोप नहीं साबित हुआ है।
तो, फिर
आखिर क्यों प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी संसद में बैकफुट पर दिखने लगते
हैं। क्यों कल तक अपने जीजा रॉबर्ट वाड्रा के ऊपर लगे आरोपों से दबे राहुल गांधी
अचानक चिल्ला उठते हैं कि सुषमा स्वराज और उनके परिवार को ललित मोदी को बचाने के
लिए कितने रुपये मिले। इसलिए लगता है कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है।

फैसले
लेने में कमजोरी का मामला सिर्फ पार्टी के बड़े नेताओं पर कार्रवाई भर का नहीं है।
दरअसल नरेंद्र मोदी क प्रधानमंत्री बनाने वाली जनता लोकतांत्रिक तरीके से भले ही
उन्हें चुनकर लाई हो। वो, जनता नरेंद्र मोदी से कई मामलों में तानाशाही रवैये की उम्मीद करती है।
क्योंकि, उस जनता
को लगता है कि लोकतंत्र और खासकर गठजोड़ के लोकतंत्र की मजबूरियों ने फैसले लेने
में इस देश का बड़ा नुकसान कर दिया है। इसीलिए नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत से
सत्ता देने वाली जनता मोदी से ऐसे तानाशाही फैसलों की उम्मीद रखती है जिससे देश का
भला हो। वो डेफिसिट पूरा हो जो, गठजोड़ के लोकतंत्र की मजबूरियों की वजह से बहुत ज्यादा हो गया है।
इसीलिए जब पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी की खबरें आती हैं। पाकिस्तान की तरफ से
तैयार करके भेजे गए आतंकवादी सामने आते हैं। तो, वही जनता सवाल पूछने लगती है कि क्या ये नरेंद्र
मोदी की सरकार है। ऊफा में बातचीत के दरवाजे खोलने से हिंदुस्तान की जनता को
बिल्कुल एतराज नहीं है। बल्कि, बहुतायत जनता इसी पक्ष में है कि बातचीत हो। पाकिस्तान के साथ बेहतर
संबंध बनें। लेकिन, वही
बहुतायत जनता ये भी चाहती है कि दाऊद, शकील और दूसरे ऐसे भारत विरोधी गुंडों, आतंकवादियों को पाकिस्तानी जमीन या दूसरी जगह पर
मारा जाए। या उनको भारत लाकर उन पर कार्रवाई की जाए। यहां वही जनता मोदी को इजरायल
और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों की तरह व्यवहार करते देखना चाहती है। और जब ये
नहीं होता है। तो, फिर वही
सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है।

मामला
सिर्फ इतना नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार के पुराने आरोपों पर
उचित कार्रवाई कर पा रहे हैं या नहीं। मामला इतना भर भी नहीं है कि पाकिस्तान पर
मोदी ने हमला क्यों नहीं कर दिया। इस मामले में भी ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं
दिखती कि देश आर्थिक तरक्की का सपना जस का तस अंटका हुआ है। नरेंद्र मोदी को
प्रधानमंत्री बनाने वाली जनता गुजरात के उस मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बना रही
थी जिसके राज में तरक्की बिना प्रयास हो रही थी। दस प्रतिशत की तरक्की का आंकड़ा
उद्योगों में तो था ही। कृषि क्षेत्र की तरक्की की दर भी दस प्रतिशत के आसपास की
थी। इसीलिए जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो,
उनको वोट देने वालों से लेकर दुनिया भर के लोगों
को भारत में फिर से दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार का आधार तैयार होता दिखने लगा।
एफडीआई, एफआईआई
के आंकड़ों ने तैयार होती बुनियाक को पक्का करना शुरू कर दिया। वित्त मंत्री अरुण
जेटली ने जब कहा कि 2016 में जीएसटी लागू हो जाएगी तो, ये भरोसा और मजबूत
हुआ। रेल मंत्री ने बजट में एक भी नई योजना का एलान न करके जब कहाकि पहले रेलवे की
सुरक्षा, पुरानी
योजनाओं का क्रियान्वयन तेजी से होगा। तो, भी भरोसा मजबूत हुआ। लेकिन, वित्त मंत्रालय से पहले साल के तेजी में लिए गए फैसलों के अलावा नए
फैसले होते नहीं दिख रहे। सबसे बड़े आर्थिक सुधार भूमि अधिग्रहण बिल तो लगभग
पुनर्मूषको भव वाली स्थिति में आ गया है। जीएसटी तक ये सरकार लागू नहीं करा पा रही
है। आर्थिक सुधारों पर इतनी सांसत में तो एक दशक की मनमोहन सरकार भी नहीं दिखी।

अगर
कांग्रेस की सरकार सुधारों पर इतनी सांसत में नहीं दिखी तो, इसकी सबसे बड़ी वजह
यही थि कि वो दूसरे दलों को साधने में कामयाब रही। भले ही उस पर केंद्रीय जांच
एजेंसियों के दुरुपयोग से लेकर दूसरे कई तरह के आरोप लगते रहे। राजनीति में भला ये
बात कहां कुछ मायने रखती है कि राजनीतिक संतुलन कैसे साधा गया। पूर्ण बहुमत की
सरकार और राज्यों के लिहाज से ज्यादातर क्षेत्रीय दलों के समीकरण कांग्रेस से उलट
होने के बावजूद बीजेपी की सरकार क्षेत्रीय दलों को साधने में पूरी तरह से नाकाम
रही है। संसद का फ्लोर मैनेजमेंट पूरी तरह से फेल रहा है। क्षेत्रीय विपक्षी दलों
की तो छोड़िए खुद अपने एनडीए के साथी भी सरकार का साथ नहीं देते दिख रहे। इस सत्र
के खत्म होते होते मुलायम सिंह यादव का साथ थोड़ी उम्मीद जगाता है। लेकिन, जिस तरह से ये पूरा
सत्र साफ होता दिख रहा है। उसमें ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या ये नरेंद्र मोदी
की सरकार है। और इस सवाल का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्द से जल्द खोजना
होगा। क्योंकि, ये बड़ी
उम्मीदों की सरकार है। ये उम्मीद टूटी तो, राजनीतिक घालमेल की स्थिति इस देश के लिए नियति बन जाएगी।  

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