आपको
भले न पता हो। लेकिन, देश में आपातकाल लग गया है। आप नहीं समझ पा रहे हैं कि आपातकाल लग गया है, तो ये आपकी गैरसमझदारी हैं। क्योंकि, आप वामपंथी नहीं हैं। देश में बेहद मुश्किल में पड़े-बचे समझदार वामपंथी नहीं है। अगर आप नहीं मानते हैं, तो आप
देश के नागरिक भले हों। देश के चिंता करने वाले भले हों। भले ही आप भारत को दुनिया
का सबसे अच्छे देशों में शामिल कराने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हों। लेकिन, ये
सब करके भी आप पिछड़े, पुरातनपंथी, संघ समर्थक, ब्राह्मणवादी या थोड़ा और साफ
करें, तो मनुवादी भी ठहराए जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात ये कि अगर आप को नहीं लग
रहा है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने देश में
आपातकाल लागू कर दिया है। तो आप बुद्धिजीवी तो कभी हो ही नहीं सकते। फिर प्रगतिशील
कैसे हो सकते हैं भला। अपना देश, अपना राष्ट्र इस तरह के विचार रखने वाले भला
प्रगतिशील कैसे हो सकते हैं। प्रगतिशील होने की परिभाषा तो इस देश में देश के बाहर
निकल जाने से ही शुरू होती है। गजब का वामपंथ है इस देश में, कि उसकी बुनियाद ही
देश के खिलाफ से शुरू होती है। ये इस कदर कि वो कश्मीर में देश के खिलाफ खड़े
लोगों को दिल्ली में बुलाकर बुद्धिजीवी जमात का हिस्सा बना देता है। और ये घोषित
कर देता है कि वामपंथ ही है जो अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतिबिंब है। ऐसी
अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतिबिंब कि इसी वामपंथ के एक राजनीतिक दल कम्युनिस्ट
पार्टी ऑफ इंडिया ने देश में इंदिरा गांधी की तानाशाही तक को सही ठहरा दिया था। ये
वही वामपंथ है जिसने सत्ता मिलते ही अभिव्यक्ति की आजादी तो छोड़िए दक्षिणपंथ को
सामान्य व्यवहार करने की इजाजत भी नहीं दी। बंगाल और केरल का उदाहरण देख, समझ लिया
जाए तो ऐसी दर्दनाक कहानियां मिल जाएंगी कि रूह कांप जाए। बंगाल और केरल में हत्या
को वामपंथ ने संस्थागत बना दिया। इतना संस्थागत कि वामपंथ से जुड़े पत्रकारों ने
सरोकारों की आड़ में उसको बाहर तक नहीं आने दिया।

वामपंथी
भयानक तरीके से फंसते दिख रहे हैं। तो वो ये कहते घूम रहे हैं कि कुछ छात्रों के
कृत्य के आधार पर पूरे जेएनयू को आतंकवादी कहा जा रहा है। जबकि, किसी ने ऐसा नहीं
कहा है। हां, निश्चित तौर पर वामपंथ के खूनी और देश विरोधी मिजाज में रचा-बसा
छात्रों का बड़ा वर्ग खराब हो चुका है या खराब हो रहा है। सबकुछ सामने दिख जाने के
बाद भी बहस यही हो रही है कि क्या इस तरह से विरोध करने पर देशद्रोह का मामला दर्ज
किया जाएगा। बेवकूफ टाइप के वामपंथी पत्रकार ये तक दलील देने लगे हैं कि जेएनयू को
सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि, ये अकेला वामपंथी गढ़ बचा है। अब जरा
इसी से अंदाजा लगाइए कि भगवा को सांप्रदायिक रंग साबित करने का हरसंभव प्रयास करने
वाले वामपंथी कह रहे हैं कि जेएनयू उनका आखिरी गढ़ है। यानी देश का वो
विश्वविद्यालय, जिसे सबसे ज्यादा सरकारी सहायता मिलती है। वहां छात्र पढ़ाई करने
के बजाय सिर्फ वामपंथ पढ़ें। वामपंथ पढ़ें मतलब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर
देशद्रोहियों के पक्ष में सभाएं करें। आतंकवादियों की स्मृति सभा करें। वामपंथियों
की ख्वाहिश ये है कि उनका ये गढ़ जेएनयू इसलिए बचा रहे जिससे देश के अलग-अलग
हिस्से में वो सरकारों के खिलाफ हथियारबंद आंदोलन खड़े कर सकें। वहां की स्थानीय
आबादी को नक्सली बना सकें। हथियार देकर सरकार के खिलाफ खड़ा कर सकें। और यहां
दिल्ली के कई एकड़ में फैले विश्वविद्यालय में पढ़ने आने वाले छात्रों के मन में
इतना विष भर दें कि देश के अंदर अशांति हो जाए। अभिव्यक्ति की आजादी का इन
वामपंथियों का पैमाना ये है कि भारत के खिलाफ उठने वाली हर आवाज अभिव्यक्ति की
आजादी है। लेकिन, वामपंथी-तानाशाह शासन वाले चीन की तानाशाही में पिस रहे तिब्बत
की अभिव्यक्ति की आजादी का कोई मतलब नहीं है। ये भारतीय वामपंथ है, जो भारत छोड़
हर किसी के साथ सरोकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरोकार, प्रगतिशील होने के नाम
पर खड़ा हो सकता है। भारत की बर्बादी के साथ भी ये वामपंथ खड़ा है। बस खबरदार जो, देश या
राष्ट्र या भारत बोला। और इस वक्त हर बात में राष्ट्र-देश बोलने वाली सरकार है।
इसलिए जब तक ये राष्ट्रवादी सरकार है। तब तक इस देश में आपातकाल ही रहेगा। इसकी
शुरुआत वामपंथी छात्रनेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी से हो गई है। ये हम सरोकारी,
प्रगतिशील, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक वामपंथी तय करते हैं। बाकी किसी का
तय किया सिर्फ सांप्रदायिकता है और हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाने की साजिश
होगी। ये भी हम लगे हाथ बता रहे हैं। 

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