दक्षिण भारत में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार बन गई है। सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी कही जाने वाली भाजपा का मुख्यमंत्री अब दक्षिण के एक सबसे समृद्ध राज्य की सत्ता संभाल रहा है। दक्षिण के किसी राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री बनना भारतीय राजनीतिक की एक ऐसी घटना के तौर पर दर्ज की जाएगी जो, देश में कांग्रेस का दर्जा भाजपा को मिलने की ओर इशारा करती है। वो, भी ऐसे समय में जब देश में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार सत्ता में है।

वैसे सच्चाई यही है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने से ही भाजपा ने ये संकेत तो दे ही दिया था कि भाजपा देश में असल तौर पर कांग्रेस का विकल्प बनकर आ रही है। एक ऐसी पार्टी जिसको देश के शहरी भारत का सबसे ज्यादा भरोसा हासिल है। आज कर्नाटक में भाजपा का मुख्यमंत्री उस जनता दल के सहयोग से बना है। जो, अपने नाम में सेक्युलर लगाता है और इस पार्टी के मुखिया पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा की इस पार्टी के भाजपा सरकार को समर्थन देने से कुछ दिन पहले तक देवगौड़ा भाजपा को सांप्रदायिक बताकर उसका मुख्यमंत्री बनाने को राजी नहीं थे।

भाजपा और जनता दल एस के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर हुई नौटंकी के बाद ही बी एस येदियुरप्पा का नाम देश के दूसरे हिस्से के लोगों को पता लगा। इससे पहले येदियुरप्पा को कर्नाटक से बाहर कम ही लोग जानते हैं। कर्नाटक में भाजपा का चेहरा अनंत कुमार ही माने जाते रहे हैं। 1996 में पहली बार लोकसभा में पहुंचने वाले अनंत कुमार अभी कर्नाटक की कनारा लोकसभा सीट से तीसरी बार सांसद चुने गए हैं। विद्यार्थी परिषद के जरिए बीजेपी में पहुंचे अनंत कुमार ने छात्र राजनीति के समय से ही अच्छा संगठन तैयार कर लिया था। इसी दौरान येदियुरप्पा भी कर्नाटक की राजनीति में भगवा झंडे के साथ उतरे।

अनंत कुमार जहां कर्नाटक भाजपा का राष्ट्रीय चेहरा बने वहीं येदियुरप्पा ने राज्य में ही भगवा झंडे को परवान चढ़ाने का बीड़ा उठाया। 1982 में येदियुरप्पा ने बंधुआ मजदूरी के खिलाफ 300 किलोमीटर लंबा मार्च निकाला। युवा नेता येदियुरप्पा की राजनीति में वो पहली बड़ी शुरुआत थी। इस मार्च ने येदियुरप्पा को उनके अपने गृहजिले शिमोगा के शिकारीपुरा का हीरो बना दिया। अगले ही साल 1983 में हुए विधानसभा चुनाव में येदियुरप्पा विधानसभा के लिए चुन लिए गए और कर्नाटक के कद्दावर नेता रामकृष्ण हेगड़े की गठबंधन की सरकार में शामिल हुए। ये कर्नाटक में पहली गैर कांग्रेस सरकार थी।

कांग्रेस को तब मुश्किल से ही अंदाजा रहा होगा कि ये छोटा सा राजनीतिक घटनाक्रम आगे की राजनीति बदल देगा। खैर, जनता पार्टी और भाजपा की ये गठबंधन सरकार सिर्फ 18 महीने में ही गिर गई। लेकिन, येदियुरप्पा का सफर परवान चढ़ता गया। 1985 में 2 विधायकों वाली भाजपा 2004 में 79 विधायकों के साथ कर्नाटक की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। 21 महीने बाद जनता दल एस के साथ हुए गठबंधन समझौते के मुताबिक, आखिर भाजपा ने कर्नाटक में सरकार बना ही ली। वैसे तो, राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भाजपा को बहुत पहले ही चुनाव आयोग से मिला हुआ है। लेकिन, सही मायने में भाजपा को अब राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर कांग्रेस का विकल्प बनने का असली मौका मिला है।

देवगौड़ा के गिरगिट जैसे चरित्र को देखते हुए येदियुरप्पा और भाजपा को कितना समय अपनी पहचान छोड़ने के लिए मिल पाएगा ये तो, अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। लेकिन, भाजपा के लिए कर्नाटक के जरिए तमिलनाडु में घुसने का एक अच्छा मौका साबित हो सकता है। राम सेतु मामले में करुणानिधि के खिलाफ मोर्चाबंदी में भाजपा के साथ जयललिता शामिल हुईं थीं। और, सिर्फ क्षेत्रीय पार्टियों के दबदबे वाले तमिलनाडु में फीकी पड़ चुकी कांग्रेस की जगह लेने के लिए भाजपा के लिए ये एक अच्छा मौका साबित हो सकता है। कर्नाटक में खिला कमल मुरझाए न इसके लिए भाजपा को कर्नाटक को उत्तर प्रदेश भाजपा बनने से बचाना होगा।


2 Comments

Gyandutt Pandey · November 13, 2007 at 2:30 am

भाजपा के लिये अच्छा मौका है। पर पिछले कुछ समय से वह मौकों का कचूमर निकालती दीखती रही है।

देवेन्‍द्र प्रताप सिंह · November 13, 2007 at 4:49 am

भाजपा बधाई की पात्र है कि वह एक राज्‍य में अपना झण्‍डा लहराने जा रही है। किन्‍तु यह चिन्‍तन का विषय है कि जहॉं दक्षिण में भाजपा का ग्राफ बढ़ रहा है वही उत्‍तर में गिरता जा रहा है। लोक सभा की दृष्टि से उसे उत्‍तर में अपने ग्राफ को मजबूत करने की आवाश्‍यकता है।

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