हमारे यहां बेटी-दामाद का पैर छुआ जाता है। और, उसके मुझे दुष्परिणाम ज्यादा दिख रहे थे। मुझे लगा था कि मैं बेहद परंपरागत ब्राह्मण परिवार से हूं इसलिए ये परंपरा हमारे ही यहां होगी। लेकिन, जब मैंने ये जानना चाहा कि, कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है तो, इसका काउंटर मेरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पोस्ट में शुमार था। और, इस पर अब तक 13 टिप्पणियां भी आईं हैं। अब समीरजी और ज्ञानजी की तरह मेरा वृहद नेटवर्क तो है नहीं इसलिए इतनी टिप्पणियां भी मुझे ये बताती हैं कि इस पोस्ट से कितने लोगों का सरोकार है।

टिप्पणियों से मुझे अंदाजा लगा कि ये कुरीति (अगर ये रीति में है तो, जिसके पास इसके पक्ष में तर्क हों वो बताएं) देश के ज्यादातर हिस्से में फैली हुई है। कोई भी टिप्पणी तो, कम से कम इसके पक्ष में नहीं ही है। अब मुझे ये लगता है कि बेटी-दामाद का आजीवन पैर छूना या सिर्फ शादी के समय ही पैर छूना भयानक विसंगति है और इसके साथ जुड़े-जुड़े उससे भी खतरनाक विकृतियां पैदा हो रही हैं।

अब मुझे तो ये लगता है कि बेटी-दामाद का पैर छूकर पहले ही बेटी को कमतर साबित कर दिया जाता है। अब ये कौन सा पैमाना हो सकता है कि जिस लड़की को मां-बाप ने जन्म दिया हो पाला-पोसा हो उसी लड़की को मां-बाप के पांव छूने का हक न हो। और, हद तो ये कि खुद मां-बाप बेटी का पैर छूते हैं। मेरे यहां तो शादी की रस्म के समय ही नहीं आगे भी परंपरा को निभाया जाता है। शादी के समय तो, उस उत्साह में पांव-पूजने की रस्म मुझे बहुत बुरी नहीं लगी और मेरा थोड़ा ये भी मानना है कि एकदम से कोई क्रांति नहीं होती। समाज, समय परिस्थिति के लिहाज से धीरे-धीरे बदलाव बेहतर होते हैं। और, मैंने अपने सास-ससुर को शादी के बाद बेहद कड़े प्रतिरोध के साथ पैर छूना बंद करवा दिया। क्योंकि, ये बेहद अजीब स्थिति होती है कि मां-बाप के जैसे लोग आपके पैर छू रहे हों।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। ये विसंगति हमारे यहां कितनी आगे तक बढ़ती है- इसका उदाहरण देखिए। मेरे माताजी-पिताजी मेरी ननिहाल के पूज्य हुए। इस वजह से मेरे नाना-नानी का पूरा गांव ही पिताजी-माताजी के साथ मेरे भी पैर छूता है। क्यों, वजह वही शादी के समय लड़की लक्ष्मी तो, लड़की से शादी करने वाला लड़का लक्ष्मीनारायण हो जाता है। और, फिर लक्ष्मीनारायण के लड़के-लड़कियां भी पूज्य हो गए। यानी सिर्फ पति ही नहीं लड़की के परिवार के लोग लड़की के लड़के-लड़कियों के भी पैर छूते हैं। मेरे मामा-मामी मेरा पैर छूते हैं और, मामी को पैर छूने से रोको तो, वो नाराज हो जाती हैं आप हमारे ब्राह्मण हैं, हमें पाप लगेगा।

लड़के अपने से छोटी बहनों का पैर छूते हैं। फिर वो चाहे कुंवारी कन्याएं हों या फिर शादी के बाद पति के साथ घर आएं। पिछले रक्षाबंधन पर मामा की लड़की ने मेरे राखी बांधी तो, उम्र में छोटी होने की वजह से मैंने उसके पैर नहीं छुए। उसके हाथ में तोहफे के तौर पर कुछ रुपए दिए। मेरे पिताजी को राखी बांधने आईं मेरी बुआजी नाराज होकर बोलीं- रमेंद्र बिना गोड़ धरे (पैर छुए) दक्षिणा न देए क चाही। मैंने पैर नहीं छुआ लेकिन, थोड़ी देर के लिए माहौल अटपटा जरूर हो गया।

अब इस चीज को मैं थोड़ा आसानी से समझ पाया हूं कि मेरे यहां क्यों ये कहा जाता है कि लड़की थोड़ा नीचे के ब्राह्मण परिवार से भी होगी तो, ठीक है। लेकिन, लड़की की शादी उच्चकुल के ही ब्राह्मण परिवार में करेंगे। उसके पीछे वजह यही होती है कि लड़की की शादी जिस परिवार में करेंगे। वहां सभी का पैर छूना होता है। अब जैसे हम लोगों प्रतापगढ़ के सोहगौरा त्रिपाठी हैं। तो, अब हमारे परिवार की लड़कियों की शादियां तीन घर के शुक्ला परिवार के अलावा और कहीं नहीं हो सकती। इसका नुकसान ये कि लड़का और उसका परिवार भले ही आर्थिक-सामाजिक हैसियत में कमतर हो लेकिन, अगर वो ब्राह्मण कुल के ऊंचे पायदान पर है तो, उससे शादी करने में कोई हर्ज नहीं।

इसकी वजह से ब्राह्मणों में भी जो, तीन घर के लड़के हुए और अगर थोड़े लायक हो गए तो, उनके लिए थोड़ी बेहतर स्थिति वाले कुलीन परिवारों की लाइन लग जाती है। और, फिर उसी कतार के लिहाज से लड़के को दिया जाने वाला दहेज भी बढ़ जाता है। मेरी पहली पोस्ट पर जो टिप्पणियां आईं वो, ज्यादातर लोग मेरी तरह ये महसूस करते हैं कि ये गलत परंपरा है लेकिन, मेरी ही तरह ज्यादातर लोग सामाजिक रीतियों के खिलाफ एकदम से नहीं जाना चाहते। लेकिन, मैंने तो तय कर लिया है कि अपने से छोटे किसी का भी पैर नहीं छुऊँगा और नही किसी बड़े से पैर छुआऊंगा।

मुझे ये लगता है कि, अगर हम लोग ये तय करें तो, इस बुराई को खत्म किया जा सकता है। और, लड़कियों को देवी मानकर उन्हें सामान्य मनुष्य से भी गई गुजरी हालत में जाने से बचा सकते हैं। जैसे लड़का, वैसे ही लड़की। मैंने अपने आसपास के अनुभव से इसकी विसंगतियां बताईं है अगर आप लोगों को इसकी दूसरी बुराइयां (अच्छाइयां तो हो नहीं सकती फिर भी हो तो, मुझे भी बताएं) भी दिखती हैं तो, उसे आगे जरूर बढ़ाइए।


13 Comments

Udan Tashtari · August 12, 2008 at 12:01 am

निश्चित ही विचारणीय आलेख है.

Rajesh Roshan · August 12, 2008 at 12:16 am

हमारे यहाँ पिता तो नही लेकिन मामा जी अपने भांजे भांजियों के पैर जरुर छूते है…..

रचना · August 12, 2008 at 12:44 am

हर्षवर्धन ji
baeti ko jo adhikaar nahin haen
1 baeti paaer nahin chuu saktee
2 baeti kriya karm nahin kar saktee
3 daamad { beti ka pati } apne sasur kae shav ko haath hanin lagaa saktaa
4 baeti kae gahar aaj bhi bahut sae parivaar paani nahin peetey
its good that you ahve started writing on such issues because when we write people take it as anti man or anti society . you can read all the comments that come on our blogs may be people can understand better and try to get over these useless customs
the most useless custom is kanayaadan because it is donation and if the girl is being donated then the boy is aacepting the doantion which makes him also degrading
PLEASE KEEP WRITING

swapandarshi · August 12, 2008 at 3:44 am

Mei to kisi ke bhee pair chhoone ke khilaaf hoon. pair chhoonaa, aadar bhaav se jyaadaa, ek insaan ko doosare insaan ke samkax neechaa karanaa hai, aur kuchh had tak gulaamee kaa bhee dhotak hai.

Jin logo ke aap pair chhote hai, unase jirah bhee nahee karate. Unke galat-sahee faisale par sawaal karane kaa bhee haq nahee hotaa. aur isiliye mujhe ye apane aatm samman ke khilaaf jyaadaa lagataa hai, ek aazaad insaan ke haisiyat se.

Aadar hamesha ek bahut bheetar kee cheez hai, aur vo sirf usee ke liye hotee hai jo achchaa insaan ho, gunvaan ho, use paane ke liye paatrtaa har kisee me nahee hoti, to fir dikhaawaa kyo? aur jis ke liye dil me samman hai, kya use dikhaawe kee zaroorat hogi?

ek doosaraa pahaloo bhee hai, ki pair chhone ke naam par ek symbolic dar chhote se bachche ke man me biThaa diyaa jataa hai, ki sawaal mat karo, n maataa-pitaa aur parivaar jano se, na teacher se, aur ham logo kee isee vazah se vaazib sawaal poochhane kee himmat TooT jaatee hai. shayad bachpan se baDe hone tak ki ye learning is kadar haavee hai, ki ye sawaal ham poochhanaa hee bhool jaate hai, aur sahee galat me antar karanaa bhee.

kaee haTanaao se man shubd hotaa hai, is aagyaakaritaa ke vidhaan se, bahut se bachche, aurate, isike chalate abuse kaa shikaar hote hai, school me, ghar par

kuch saal pahale, school me aag lagane par bhee, teacher ke dar se bachche building se bahar nahee nikale, aur saare ke saare bachche vahee mar gaye, madraas me aapako yaad hoga!
kuchh saal pahale ek laDakee ko school me teacher ne dhoop me khaDaa kiyaa, aur vo vahee dehydration se mar gayee, Lucknow me, graameen ilaako ke bachche thappaD se akasar bahare ho jaate hai.

aapane jo samasyaa uThaayee hai, ye mansikataa hamaare saamajik-parivaarik jeevan me bahut gahare paith banaaye huye hai.

siddharth · August 12, 2008 at 3:48 am

अच्छी चर्चा छिड़ रही है। इन दो विन्दुओं पर भी विचार किया जाना उचित होगा क्या?
१-किसी को ‘छोटा’ और किसी को ‘बड़ा’ मानने का आधार क्या होना चाहिए? उम्र, कुल-खानदान, लिंग, जाति, वैभव-सम्पत्ति, धर्म, ज्ञान, प्रत्तिष्ठा, रिश्तेदारी के पद-सोपान या कुछ और?
२-पैर छूने वाले को ‘छोटा’ और पैर छुआने वाले को ‘बड़ा’ क्यों माना जाय? पैर छूने से होता क्या है? इसका मनोविज्ञान क्या है? सभी मनुष्यों की मौलिक समानता जैसी कोई अवधारणा है क्या?

siddharth · August 12, 2008 at 5:01 am

हर्षजी,
एक और प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि इस दुनिया में मानव व्यवहार की जितनी गुत्थियाँ हैं, क्या सबका हल तर्कशक्ति से ढूढा जा सकता है? या आस्था और विश्वास की भी कोई भूमिका है जो प्रायः तर्कातीत है।

Sanjay Sharma · August 12, 2008 at 6:04 am

आपने सही कदम उठाया है .इसे बहस का मुद्दा यहाँ न बनाकर अपने अभियान को रंग रूप दें. थोड़ा बहुत विरोध के वावजूद आपकी मानी जायेगी .आप अपने अभियान में सफल होंगे मुझे अटूट विश्वास है .

हर जाति में भांजा और भांजी कों ब्राह्मण का दर्जा तो है हमारे इलाके में पर इनका पैर कोई मामा या मामी नही छूता . हाँ अलबता इन्हें गलती की सजा मामा मामी नही दे पाते .दान दहेज़ हथियाने और बदमाशी जम के करने का मौका मिलता है तो वह मामा का गाँव ही है .

समाज कों चाहे जिस तर्क पर कसा जाएगा साइज़ का अन्तर रहेगा ही ऐसे में छोटा बड़े को प्रणाम करे ,आदर दे ,, इसमे बुराई कहाँ है ? बड़ों के त्याग ,स्नेह को नज़रअंदाज़ करने वाले “हाय डैड ” के समर्थक हैं .

Parul · August 12, 2008 at 6:51 am

harsh ji
bahut si baaten gadmudd ho gayin hain yahan..shayad behes se bachna chahti huun isliye sabke baarey likhna nahi chahti..bas yahi ki apney badon se kabhi pair chulvana pasand nahi karti mai bhi parantu mai khud badon ke pair chuuney me koi burayi nahi samjhti..aur haan pair bhi usi ke chuuney chahiye jiske prati mun me aadar ho.ye ek bhaav hai,jismey bandish nahi honi chahiye.merey anusar ismey dastaa ya swamitv jaisey shabdon ki koi jagah nahi

सतीश सक्सेना · August 12, 2008 at 9:21 am

हमारी कुरीतियों में से एक विषय छेड़ कर आपने समाज का भला किया है ! मेरे यहाँ भांजे और भांजे की पत्नी मामा के पैर नहीं छूते, मैंने अपने भांजे की शादी में इसका विरोध किया और यह कुरीति समाप्त कराई! साथ साथ पुत्री आज भी नॉर्थ इंडिया में कई जगह अपने माता पिता के पैर नही छू सकती ! आपने ब्राह्मण होकर यह साहस किया, बधाई !

P. C. Rampuria · August 12, 2008 at 10:48 am

इस मुद्दे को उठाने के लिए आपका
अति धन्यवाद ! और जैसा की सतीश
सक्सेना जी ने लिखा–
“मेरे यहाँ भांजे और भांजे की पत्नी मामा के
पैर नहीं छूते, मैंने अपने भांजे की शादी में इसका
विरोध किया और यह कुरीति समाप्त कराई!”

कुछ ऐसा ही सभी द्वारा किया जाना भी जरुरी है !

P. C. Rampuria · August 12, 2008 at 10:49 am

इस मुद्दे को उठाने के लिए आपका
अति धन्यवाद ! और जैसा की सतीश
सक्सेना जी ने लिखा–
“मेरे यहाँ भांजे और भांजे की पत्नी मामा के
पैर नहीं छूते, मैंने अपने भांजे की शादी में इसका
विरोध किया और यह कुरीति समाप्त कराई!”

कुछ ऐसा ही सभी द्वारा किया जाना भी जरुरी है !

Suitur · August 12, 2008 at 4:54 pm

हर्षवर्धन जी, यदि बेटी का पांव छूना गलत है तो ‘कन्यादान’ भी गलत ही है क्योंकि कन्या का दान भी( क्या कन्या कोई वास्तु है?) एक कुरीति ही हुई!

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