इंदौर के राष्ट्रीय अधिवेशन से लौटने के बाद उत्तर प्रदेश के एक युवा बीजेपी नेता ने मुझसे कहाकि गडकरी जी अलग तो हैं। पार्टी सही रास्ते पर जाएगी। उस युवा नेता की आंखों की चमक नए अध्यक्ष नितिन गडकरी में भरोसा साफ दिखा रही थी। इसकी वजहें भी साफ हैं। गडकरी शायद पहले बीजेपी अध्यक्ष होंगे जिन्होंने राष्ट्रीय अधिवेशन में अपनी पत्नी को भी मंच पर जगह दी। राजनीतिक मंच पर पत्नी को बैठाना प्रतीकों की राजनीति है। और, नागपुर के इशारे पर अध्यक्ष बने गडकरी प्रतीकों की ये राजनीति अच्छे से समझते हैं। उन्हें साफ दिखता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दलितों के बीच काम करना शायद ही कभी सुर्खियां बन पाता हो लेकिन, जब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के एक दलित के यहां रात रुके तो, वो सबसे बड़ी खबर बन गया। इसीलिए अधिवेशन से पहले गडकरी खुद एक दलित के यहां पूरी मंडली लेकर भोजन करने पहुंच गए। गडकरी पैर न छूने की बात कहते हैं, फूल लाने के बजाए उस पैसे को विदर्भ की विधवा महिलाओं के भले के लिए बॉक्स में डालने को कहते हैं। प्रतीकों की राजनीति का इस देश में बहुत महत्व है। एकदम से हिंदुत्व से नाता तोड़ने का नुकसान लोकसभा चुनावों में भाजपा को दिख चुका है। इसीलिए गडकरी बीच के रास्ते की बात कर रहे हैं कि मंदिर वहीं बनेगा लेकिन, मुसलमान भाई अगर मंदिर बनाने पर सहमति बनाएं तो, बीजेपी मस्जिद बनाने में मदद करेगी। ये प्रतीकों की राजनीति है। भले ही इससे कट्टर हिंदुत्व की राह वाले भाजपाई नाराज हों और मुसलमानों का एक भी वोट बीजेपी के खाते में न जुड़े लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी का एक जो, व्यवहार होना चाहिए उसे गडकरी समझ रहे हैं। ये और भी महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि, वो पूरी तरह से संघ की ओर से नामित अध्यक्ष माने जा रहे हों।
लेकिन, असल राजनीति जमीन पर होनी है। और, बड़े अरसे बाद जमीन पर भाजपा अपने असली विपक्षी तेवर में लौटती दिखी है जिसके लिए वो जानी जाती रही है। और, ये विपक्षी तेवर अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर की अगुवाई के बगैर है। उत्तर प्रदेश में नंबर एक से नंबर तीन पर पहुंच चुकी भाजपा का महंगाई पर प्रदर्शन अरसे बाद दमदार दिखा। साफ दिखा कि भाजपाई कैडर जिंदा है बस उसका भाजपाई नेताओं से भरोसा चुक गया था। यही वजह थी कि लगातार पांच साल तक विपक्ष में रहने के बावजूद बीजेपी किसी बड़े आंदोलन के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रही थी। यहां तक कि बीजेपी के सबसे बड़े नेता और पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद पूरे देश में घूमकर कार्यकर्ताओं से हार की वजह जानने का एलान तो कर दिया लेकिन, वो योजना इसी डर से आडवाणी ने ठंडे बस्ते में डाल दी कि कहीं कार्यकर्ताओं ने इसे नकार दिया तो, बुढ़ापे में रही-सही इज्जत भी चली जाएगी।
होली जैसे मस्त त्यौहार पर भी बीजेपी की महंगाई के विरोध में बंद की रणनीति कारगर रही। होली के साथ महंगाई और बीजेपी की अच्छी चर्चा रही। साल भर से महंगाई पर विपक्ष की अप्रभावी मौजूदगी में मीडिया खुद से ही महंगाई के विरोध में आंदोलन सा चला रहा था। अब विपक्ष की अपनी भूमिका समझकर बीजेपी ने ये मोर्चा थाम लिया है। ये मोर्चा ऐसा थमा कि अरसे बाद संसद के बाहर सुषमा स्वराज के साथ यादव तिकड़ी शरद-मुलायम-लालू और लेफ्ट तक सरकार के खिलाफ एक सुर में हुंकार भरते दिखे। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने का आंकड़ा बीजेपी अपने कामों से अब पुख्ता कर रही थी। बीजेपी ने सरकार के खिलाफ ऐसी घेरेबंदी कर दी कि भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ जब बजट भाषण के दौरान पूरा विपक्ष वॉकआउट कर गया।
एक और बड़ा मौका रहा महिला आरक्षण बिल के राज्यसभा में पास होने का। बीजेपी ने अपनी सधी रणनीति से इस बिल को पास कराने का श्रेय कांग्रेस से थोड़ा बहुत झटक ही लिया। कम से कम भातीय जनता पार्टी के प्रति सहानुभूति रखने वाले वोट बैंक को इतनी उम्मीद तो जरूर हुई होगी कि पुरानी बीजेपी के दिन फिर से लौट सकते हैं। जब पहले दिन राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी के सांसदों के बेलगाम विरोध की वजह से बिल पास नहीं हो सका तो, टेलीविजन स्क्रीन पर भारतीय जनता महिला मोर्चा का बिल के पक्ष में संसद के बाहर की आवाज मजबूत संदेश दे रही थी। इतने महत्वपूर्ण महिला आरक्षण बिल का चर्चा के साथ पास होना भारतीय जनता पार्टी की उपलब्धि के तौर पर माना जा सकता है।
लेकिन, बजट सत्र के बाद क्या। ये भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ा सवाल होगा। क्योंकि, टेलीविजन स्क्रीन और अखबारी सुर्खियों के लिए संसद और सड़क का विकल्प अब कम होगा। रोज-रोज महंगाई पर प्रदर्शन तो किया नहीं जा सकेगा। अब सवाल ये होगा कि भारतीय जनता पार्टी अपने बचे कार्यकर्ताओं के बीच कैसे पहुंच रही है और खोए कार्यकर्ताओं को वापस लौटाने का क्या इंतजाम कर रही है। गडकरी का हर साल 10 प्रतिशत नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने का एलान सुनने में तो शानदार है लेकिन, इसकी परिणति का कोई फॉर्मूला अब तक नहीं दिख रहा है।
अगर कोई फॉर्मूला तैयार भी होता है तो, उसे जमीन पर उतारने के लिए चाहिए होगी एक ऐसी टीम जो, कार्यकर्ताओं को उस जमाने की याद दिला सके कि बीजेपी के पास दूसरी पांत नेताओं की लंबी कतार है जो, सड़क से संसद तक उनकी अगुवाई कर सकते हैं। इसलिए गडकरी को सबसे बड़ी चुनौती यानी अपनी कार्यकारिणी का एलान जल्द करना होगा और इस बात का खास ख्याल रखना होगा कि उसमें संतुलन बरकरार रहे। संजय जोशी को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की जिद से गडकरी को बचना चाहिए। संघ से संगठन महामंत्री पद के लिए दूसरे योग्य व्यक्ति की मांग की जा सकती है जिसे बीजेपी की राजनीति की भी अच्छी समझ हो। राजनीतिक तौर पर भी महाराष्ट्र से ही राष्ट्रीय अध्यक्ष और संगठन महामंत्री बहुत समझदारी भरा फैसला नहीं होगा।
कार्यकारिणी का गठन करते समय एक और बात का खास ख्याल रखना होगा कि पार्टी में अपील वाले नेता बड़े कम रह गए दिखते हैं। इस कमी को भरने के इंतजाम करने होंगे। कुछ नई खोज करनी होगी। जिनकी किसी जगह अपनी जमीन हो। दिल्ली कार्यालय में बैठकर राजनीति करने वाले एकाध लोगों को कार्यकारिणी में जगह देना काफी होगा। वेंकैया नायडू जैसे आधारविहीन नेता- जिनकी अपनी प्रदेश में कोई हैसियत नहीं है लेकिन, दिल्ली कार्यालय के जरिए जिनका प्रभाव बना रहता है- को कार्यकारिणी में वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर अध्यक्ष के समांतर सत्ता चलाने की कोशिशों को गडकरी को रोकना होगा। अच्छा ये है कि D4 यानी दिल्ली दरबार के चार महारथियों में से सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को लोकसभा और राज्यसभा का नेता बना दिया गया है और गडकरी इसे संगठन में उनके दखल को कम करने के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं।
वरुण गांधी की अपील को भुनाने के लिए वरुण गांधी को भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। क्योंकि, उत्तर प्रदेश में जिम्मेदारी देने से पहले ही वरुण का विरोध वहां कई मोर्चों पर हो रहा है और वरुण की अपील राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के मुकाबले ज्यादा कारगर हो सकती है। वैसे, संघ शैली के गडकरी इस बार कार्यकारिणी के एलान के साथ एक नई परंपरा की शुरुआत प्रयोग के तौर पर कर सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की मुख्य कार्यकारिणी के पदाधिकारी हों या फिर युवा मोर्चा, महिला मोर्चा और दूसरे प्रकोष्ठ हों, सभी पदाधिकारियों को कम से कम एक केंद्र को मजबूत करने की जिम्मेदारी तय हो, उसके बाद भले वो राष्ट्रीय महासचिव या दूसरे पदाधिकारी के तौर पर देश में बीजेपी को मजबूत बनाने का जिम्मा ले लें। जाहिर है जो, नेता एक केंद्र (शहर या जिला) मजबूत नहीं कर सकता तो, वो मीडिया में भले मजबूत पदाधिकारी बन जाए, असल में कितना बड़ा नेता होगा और बीजेपी को कितना आगे ले जाएगा ये पहले के दिल्ली-मीडिया के जरिए राजनीति करने वाले पदाधिकारियों की करनी से दिख चुका है। खुद गडकरी चाहें तो, इसकी शुरुआत संघ मुख्यालय वाले शहर नागपुर का जिम्मा लेकर कर सकते हैं। क्योंकि, संघ मुख्यालय वाले शहर से कांग्रेस का लगातार जीतना अकसर संघ की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।
गडकरी के पक्ष में अच्छी बात ये है कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद अचानक पार्टी सही रास्ते पर चलती दिखने लगी है भले ही ये सायास न हो। लेकिन, नौजवानों-महिलाओं की राजनीति में बढ़ती भागीदारी के समय में गडकरी को इस मोर्चे पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। गडकरी संघ को इस बात के लिए तैयार कर सकते हैं कि विद्यार्थी परिषद पूरे देश में छात्रसंघ की बहाली के लिए एक राष्ट्रीय आंदोलन की भूमिका तैयार करे। छोटे-छोटे डिग्री कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों तक छात्रसंघ प्रतिबंध झेल रहे छात्रों का बड़ा हुजूम परिषद के जरिए बीजेपी से जुड़ सकता है।
एक महत्वपूर्ण बात जो, शायद अति भोजन प्रेमी होने की वजह से गडकरी गैर जरूरी मानें और राजनीति में इसकी जरूरत एकदम से नकार दें वो, है नितिन गडकरी का लुक। ऐसे वक्त में जब गडकरी को जाने-अनजाने राहुल गांधी के साथ तुलना में उतरना पड़ रहा हो तो, जरूरी है कि गडकरी भी अपने आपको इतना तो दुरुस्त कर ही लें कि नौजवानों के साथ वो थोड़ा ही सही लेकिन, दौड़ते हुए चल सकें। इतने बड़े मिशन के लिए ये बड़ा त्याग नहीं होना चाहिए।

6 Comments

काजल कुमार Kajal Kumar · March 12, 2010 at 4:01 pm

अच्छा है. पक्ष की निरंकुंशता को दौड़ाए रखने के लिए विपक्ष का सशक्त होना भी बहुत आवश्यक है.

ZEAL · March 13, 2010 at 6:18 am

Rahul will never succeed in the name of religion. He is like 'Trishanku'. There is huge difference between social work and politics.He is simply making road for his smooth wolf- walk towards politics.

He is nothing but stale Obama !

Lets wait and watch .

Divya

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey · March 13, 2010 at 3:54 pm

मुझे उदग्र हिन्दुत्व पसन्द नहीं है। पर मुस्लिम तुष्टिकरण का सही रूप दिखा कर उदग्र हिन्दुत्व की राजनीति के लिये अभी भी काफी स्कोप है। हां, भाजपा को पत्ते सफाई से खेलने होंगे।

Mrs. Asha Joglekar · March 14, 2010 at 4:00 pm

नितिन गडकरी जी के आने से भाजपा में लोगों का विश्वास तो फिरसे जागा है । आग आगे देखिये होता है क्या, वैसे आपके सुझाव बहुत अच्छे हैं ।

संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI · March 15, 2010 at 4:29 am

sujhav shandaar hain par badkismati se party ki disha aur dasha dono theek nahin hai,iske liye iski spsht neeti na hona aur bhartiyata ka vishesh gun 'sarv-dharm-sambhav' ki kami saaf jhalakti hai.jis party ke liye narendra modi adarsh ho sakte hain uska rashtriy rajneeti me adhik samay tak tikna mushkil hai…

शरद कोकास · March 15, 2010 at 6:24 pm

आगे आगे देखिये होता है क्या ?

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