बिहार विधान परिषद के चुनाव नतीजों ने राजनीतिक पंडितों के लिए पुनर्निरीक्षण की बुनियाद बना दी है। ज्यादातर राजनीतिक पंडितों, अनुमानों ने लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के गठजोड़ के बाद बिहार में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की नैया डूबी ही मान ली है। बिहार में नीतीश का ही जनता दल यूनाइटेड है, भले इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव हों। सामान्य राजनीतिक समीकरण यही कह रहा है कि बिहार में जाति की राजनीति इस कदर हावी है कि अब  बीजेपी के लिए रामविलास का साथ होने के बावजूद चुनाव जीतना मुश्किल है। सामान्य राजनीतिक समीकरण कहता है कि यादव और दलित अगर जुड़ जाएं तो, फिर बिहार में किसी को भी सिंहासन पर बैठा सकता है। उस मुसलमान साथ आ जाएं तो, सोने पर सुहागा जैसा हो सकता है। और राजनीतिक विद्वान लालू-नीतीश के गठजोड़ से इसी सोने पर सुहागा जैसी स्थिति की कल्पना में हैं। लेकिन, ये सामान्य राजनीतिक समीकरण की बात थी। जबकि, अब बिहार का राजनीतिक समीकरण सामान्य नहीं रहा है। यादव पूरा का पूरा न लालू प्रसाद यादव के साथ है। और न ही मुसलमान। कुर्मी और दलितों में भी एनडीए ने रणनीतिक सेंध लगा दी है। रही-सही कसर खुद नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को पार्टी से निकालकर कर दी। लेकिन, राजनीतिक समीकरण सीधा जोड़, घटाना या गुणा, भाग नहीं होता। अब उसमें नया मोड़ ये है कि 23 प्रतिशत दलित और 15 प्रतिशत यादव वोट अब सीधे लालू या नीतीश के खाते में नहीं जा रहा है। बिहार विधान परिषद चुनावों ने ये साफ भी कर दिया है।
 
जीतनराम मांझी मुसहर जाति से आते हैं। ये बिहार में महादलित वर्ग है। दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी चतुराई से दलितों में भी महादलित का नारा इसलिए मजबूत किया है जिससे नीतीश कुमार के महागठजोड़ से मुकाबला किया जा सके। जीतनराम मांझी ने मुख्यमंत्री रहते कुछ बड़े शानदार फैसले किए हैं। उन्होंने महिलाओं को आरक्षण दिया। साथ ही ठेके पर नियुक्त शिक्षकों को नियमित कर दिया। विवादित बयान के लिए ज्यादा जाने गए जीतन राम मांझी कमजोर ब्राह्मण और राजपूतों को भी आरक्षण की वकालत करते हैं। ये ऐसे फैसले हैं जिसका असर मत देते समय लोगों के दिमाग में जरूर होगा। और सबसे बड़ी बात ये है कि भले ही जीतनराम मांझी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ें, मतदाता के दिमाग में लगभग साफ है कि लालू-नीतीश एक साथ और बीजेपी-रामविलास और जीतनराम के साथ। रामविलास पासवान ने अपने जन्मदिन पर जीतनराम को केक खिलाकर ये साफ कर दिया कि कौन कहां खड़ा है।  और, सबके बाद बिहार में सारी लड़ाई जाति की ही है। लेकिन, अब इस जाति की लड़ाई में कई बड़े तथ्य जुड़ गए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिला लोकसभा चुनाव में। जब रामकृपाल यादव ने बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा को हराया तो, साफ हो गया कि बिहार गोप समीकरण बदल रहा है। सिर्फ रामकृपाल यादव ही नहीं, बीजेपी के टिकट पर सीवान, उजियारपुर, और मधुबनी से भी जीतने वाले यादव ही हैं। और उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के प्रत्याशियों को हराया है। आरजेडी के बाहुबली सांसद पप्पू यादव भी अब लालू का साथ छोड़ चुके हैं। पूर्णिया, सहरसा, मुंगेर और भागलपुर में पप्पू यादव का कितना प्रभाव है, इस पर बहस हो सकती है लेकिन, इसे नकारना संभव नहीं है। पप्पू यादव ने अपनी नई पार्टी बना ली है। और राज्य में पदयात्रा पर निकल पड़े हैं। पप्पू यादव की छवि राष्ट्रीय स्तर पर कितनी भी खराब हो लेकिन, सच्चाई यही है कि यादव जाति के लोगों में पप्पू यादव का प्रभाव कई बार लालू प्रसाद यादव से भी ज्यादा दिखा है। शायद यही वजह भी रही कि लालू प्रसाद यादव ने पप्पू यादव को पार्टी से निकाल बार किया। क्योंकि, लालू प्रसाद यादव के उत्तराधिकारियों, मीसा-तेजप्रताप-तेजस्वी, में से कोई भी पप्पू यादव के आसपास भी खड़ा नहीं होता है। ये वही पप्पू यादव हैं जिन्होंने मई 2014 के लोकसभा चुनाव में मधेपुरा से शरद यादव को हरा दिया। जबकि, लोकसबा चुनावों में मोदी लहर में खुद लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती और पत्नी राबड़ी देवी चुनाव हार गईं।
 
भूमिहार ब्राह्मण और राजपूतों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय जनता पार्टी का वोटर माना जाता रहा है। बावजूद इसके कि बिहार की राजनीति में राजपूत और भूमिहार एक दूसरे के कट्टर विरोधी हैं। भूमिहार ज्यादा प्रभावशाली वर्ग है। और, लोकसभा चुनाव के बाद किसी भूमिहार को मंत्री न बनाने से भूमिहारों में गस्सा था। लेकिन, गिरिराज सिंह को मंत्री बनाकर नरेंद्र मोदी ने भूमिहारों को गुस्सा कम कर दिया है। इसके अलावा लालू-नीतीश के हाथ मिला लेने से इन दोनों जातियों के पास बीजेपी के पाले में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता है। कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में जाति खत्म नहीं हुई है। लेकिन, जातियों के नेता एक नहीं रह गए हैं। एक जाति के कई नेता हो गए हैं। और सबकी अपनी राजनीति है। इसलिए महागठजोड़ या महादलित कौन सा दांव इस विधानसभा चुनाव में हिट होगा। इसका अंदाजा लगाना सीधा तो नहीं है। कम से कम बिहार विधान परिषद के चुनाव ने तो ये साफ कर ही दिया है। विधान परिषद के चुनाव चाहे सीधे जनता के वोट से न चुने जाते हों। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि ये इशारा महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि ज्यादातर विधान परिषद चुनाव में सत्ता पक्ष के ही विधायक चुने जाते हैं। यहां सत्ता बदले भले न बदलने के तगड़े संकेत हैं, तभी ये परिणाम हैं।