किसी
विकास के कन्हैया कुमार को थप्पड़ मारने के बाद वैचारिक दिवालिया हो चुका पूरा वाम ‪#‎JNU की
खूबसूरत कहानी इस बहाने भी पेश कर देना चाह रहा है। देखो ये जेएनयू है, जहां छात्रसंघ
अध्यक्ष को भी थप्पड़ मारने वाले को कुर्सी दी गई है। पानी पिलाया जा रहा है। देश
का दूसरा विश्वविद्यालय होता, तो क्या होता। छात्रसंघ अध्यक्ष को मारने वाले के हाथ-पैर टूट जाते।
जाने क्या-क्या। ठीक है जेएनयू की कहानी इतनी खूबसूरत होगी। मान लेता हूं। लेकिन, जब इस बहाने वामपंथ
को भी इस खूबसूरत कहानी में घुसेड़ देते हो। तब लगता है कि मक्कारी ज्यादा हो गई।
अब इन बुद्धिहीनों से कौन पूछे और पूछ भी ले,
तो ये कैसे बता पाएंगे कि केंद्र में एक ऐसी
सरकार है, जो इस
हरकत पर कन्हैया को फिर टांग सकती है। पूरी तरह से कानून के दायरे में। अंतरिम
जमानत पर रिहा आरोपी है कन्हैया कुमार। अदालत की भी पूरी नजर है। इसीलिए वामपंथ इस
तरह से निरीह, निर्दोष
बना बैठा है। वरना बताओ न जहां सत्ता रहती है। वहां क्या करते हो। दुनिया का सबसे
खूनी, हत्यारा
विचार है वामपंथ। न समझ आए, तो भारत में हुई राजनीतिक हत्याओं की सिलसिलेवार चर्चा कर लें। खूनी
क्रांति, जिसे
दुनिया को बरगलाने के लिए लाल सलाम बोलते हो। उसकी कहानी देश को अच्छे से पता है।
वैसे तो तुम देश जानते-समझते नहीं थे। इधर डर ने तुम्हें देश भी समझा दिया है।
इसलिए इस तरह की कहानियां सुनाने लगे हो। वरना तो तुम बंदूक से क्रांति के ही
पक्षधर रहे हो।

खुद से
ही खुद को विमर्श-बहस के पक्षधर साबित करने वाले वामपंथी दरअसल अपने आसपास को
छोड़कर सब पर बात कर लेंगे। आप देश की किसी समस्या पर बात करिए। वो सोमालिया की
समस्या लेकर आ जाएंगे। आप देश में पंचायत चुनाव की बात करिए। वामपंथी दुनिया के किसी भूले बिसरे से कम्युनिस्ट शासन की एकाध ऐसी खूबी टपका देंगे कि आप बहस में भौंचक रह जाएंगे। ये
कला वामपंथियों में अनोखी है। ऐसी अनोखी कि कई बार तो दो वामपंथी भी आपस में बहस
करते हैं, तो तीसरे वामपंथी को भी बहस में कम ही समझ आ पाता है कि ये वाला सरोकार कहां
से खोज लाया। लेकिन, वो गंभीर मुद्रा बनाकर ऐसे सिर हिलाता है कि लगता है सब समझ रहा है। दरअसल इसीलिए ये साबित हो जाता है कि वामपंथियों से बहस नहीं की जा
सकती। क्योंकि, बहस का केंद्र हमेशा ये वहां लेकर चले जाएंगे। जहां यही गए हैं। टापू टाइप का कुछ बनाकर रहने की इन्हें आदत रही है। इसी से तो कुछ अलग, बुद्धिजीवी टाइप अहसास हो पाता है। अब
सोचिए रह गया। नहीं तो इन विमर्श के पैरोकारों ने कन्हैया के मूतने के अधिकार पर विमर्श चलाया
होता। जेएनयू में ओपन डिबेट होती कि आखिर हिंदुस्तान में कभी न कभी तो सभी सड़क
किनारे खुले में मूतते ही हैं। उसी पर खुली कक्षा होती और प्रोफेसर पूरा दिन उसी
शोध पर निकाल देते। हो सकता है कि मामला थोड़ा और गंभीर होता, तो जेएनयू छात्रसंघ
उसी पर एक प्रस्ताव पास कर देता कि परिसर में खुलेआम मूतने की आजादी होनी चाहिए।
छात्रसंघ के समर्थन में जेएनयू की शिक्षक संघ भी आ जाता। देश को फिर बताया जाता कि
देश के दूसरे विश्वविद्यालयों और जेएनयू में कितना फर्क है। दूसरे विश्वविद्यालय
में तो खुलेआम किसी लड़की के सामने मूतने वाले छात्र को शिक्षक बुरी तरह से
डांटते। थोड़ा पुराने में तो एकाध शिक्षक पीट भी सकते थे। इससे जेएनयू का अद्भुत
चरित्र और उसमें वामपंथ की भूमिका और निखरकर दुनिया के सामने आती। लेकिन, बहस के
समर्थक वामपंथी पहले तो सोशल मीडिया की ढेर सारी फर्जी खबरों में से इसे भी एक
बताकर बचते रहे। फिर जब साबित हो गया, तो बेहूदे टाइप के वामपंथी आ गए। ये कहते
हुए कि कन्हैया पर वही उंगली उठाए जिसने कभी खुले में पेशाब न की हो। इसी तरह का
विमर्श करते हैं ये वामपंथी। आतंकवादियों के समर्थन में नारा लगाने वाले जेएनयू के
बाहर से आए या जेएनयू के ही हैं। लेकिन, अच्छा ये हो गया कि जेएनयू का सारा विमर्श
सबके सामने आ गया। टापू की खूबसूरत कहानियों के साथ वामपंथ भी सबके सामने आ रहा
है। ये भी सामने आ रहा है कि इस तरह के व्यवहार में दोषी पाए जाने, जुर्माना भरने
वाले को ये विश्वविद्यालय अपना छात्रसंघ अध्यक्ष चुन लेता है। अलग तो है जवाहर लाल
नेहरू विश्वविद्यालय। मैं पक्के तौर पर मानता हूं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में हत्या करने वाले को तो हो सकता है कि छात्रसंघ का अध्यक्ष चुन लिया जाता। लेकिन, किसी लड़की से ऐसी अभद्रता करने वाले की तो जमानत ही जब्त होती। लेकिन, जेएनयू अलग है। इसलिए वहां का अध्यक्ष ऐसा बन गया। जेएनयू की खूबसूरत कहानियां तो अब लोगों को पता चलने लगी हैं। विमर्श बढ़ाइए, कॉमरेड।