मां-बाप के साथ शनिवार-रविवार की छुट्टियों में खिलौनों, कपड़ों से लदे बच्चों को देखकर लगता है कि इस जमाने के बच्चे कितने सुखी हैं। अमीर मां-बाप हैं, तरह-तरह के कपड़े, जूते, फैशन की हर चीज जो, टीवी पर दिखती है, इन बच्चों के पास है। चॉकलेट, आइसक्रीम, पॉपकॉर्न, इंटरनेशनल टॉयज और न जाने क्या-क्या। कितना एटीकेट, कितना सलीका। लेकिन, कितने लोग ये अंदाजा भी लगा पाते हैं कि इन बच्चों को ये सारे सुख सिर्फ शनिवार-रविवार को ही मिलते हैं। क्योंकि, दुनिया भर की सुख सुविधा और ऐशो-आराम जुटाने के चक्कर में महानगरों में रहने वाले कामकाजी जोड़ों में से बड़ा तबका सिर्फ वीकेंड पैरेंट ही बनकर रह गया है।

ऐसा नहीं है कि इस भयावहता का अंदाजा उन मां-बाप को नहीं है। स्टाफिंग फर्म टीम लीज के एक सर्वे में दिल्ली के 100 में से 62 कामकाजी जोड़ों को इस बात का अपराधबोध है कि वो अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। मुंबई में ज्यादा भागदौड़ वाली जिंदगी दिखती है लेकिन, कमाल ये है कि इस सर्वे में 100 में से 35 कामकाजी जोड़ों को ही ये गम सताता है कि वो अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। ऐसे मामलों में पुणे या दूसरे मेट्रो से बाहर के शहरों के कामकाजी जोड़े अपने बच्चों को समय ज्यादा दे पा रहे हैं और खुश भी रख पा रहे हैं।

खुद खुश रहने और बच्चों को खुश रखने के चक्कर में जुटे मां-बाप के पास ज्यादा विकल्प भी नहीं बचते। आज ही खबर आई है कि नोएडा के सेक्टर 94 में 95 एकड़ का प्लॉट बीपीटीपी कंपनी ने 5006 करोड़ रुपए में खरीदा है। बीपीटीपी के मालिक खुशी-खुशी टीवी पर बता रहे थे कि वो यहां दुबई के प्रोजेक्ट जैसा, हांगकांग जैसा जहान बसा देंगे। अब इस जहां में एक छोटा से मां-बाप और दो या फिर एक ही बच्चे भर के लिए घर भी हांगकांग और दुबई की ही शर्तों पर मिलेगा।

दुनिया बनावटी भी इसी चक्कर में हो रही है। एक दिन पत्नी को पति समय नहीं देता तो, पत्नी नाराज होती है लेकिन, अब न तो पत्नी नाराज होती है न पति। दोनों ही एक दूसरे को समय न दे पाने के एवज में तोहफे बांटकर काम चला रहे हैं। सैटर्डे-सनडे साथ-साथ छुट्टियां बिता रहे हैं। बच्चों को बड़े खिलौने मिलने लगे हैं। वीकेंड पर मिलने वाले इन तोहफों में ही बच्चा अगले पांच दिन खुशी-खुशी (पता नहीं कितना लेकिन, काफी समय तक दिखता तो ऐसा ही है।) बिना मां-बाप की याद किए समय निकाल देता है।

तोहफे की अहमियत रह गई है। तोहफे देने वाले की तो कद्र ही नहीं रही। कहते हैं समाज में बड़ा बनने के लिए काफी कुछ खोना पड़ता है। काफी कुछ सैक्रिफाइज (हिंदी में सचमुच ये शब्द ईजाद नहीं हुआ था। लेकिन, अब इसके ट्रांसलेशन की निजी-सरकारी-कामकाजी जिंदगी में बहुत जरूरत पड़ने लगी है।) बॉलीवुड स्टार शाहरुख खान का एक कोट अहा जिंदगी पत्रिका में छपा है। जो, वीकेंड मां-बाप, वीकेंड पति, पत्नी का असली मर्म समझा देता है। शाहरुख कहते हैं अगर मैं बतौर पति या पिता असफल हो जाता हूं तब मेरा काम खिलौने और हीरे कर देते हैं और ये कभी असफल नहीं होते। सबसे सफल अभिनेता शाहरुख पति और पिता के तौर पर सफल नहीं हो पाने की बात कबूल रहे हैं। हीरा और खिलौना पति और पिता की कमी पूरा कर दे रहा है।

कामकाजी पति-पत्नियों पर किए गए सर्वे से ही निकलकर सामने आ रही बात ये है कि मां-बाप समय नहीं दे रहे हैं तो, बच्चे दाइयों के साथ, अब आज के जमाने में ये पुराने जमाने की दाई मां तो हो नहीं सकती। क्योंकि, दाई मां को भी अपने बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए पैसे कमाने हैं। और, कई दूसरे घरों के भी बच्चों के मां-बाप भी इस पैसे देकर लाई गई मां का इंतजार कर रहे होते हैं। इस परवरिश में अपने मां-बाप की बात तो सुनी ही नहीं जाती तो, फिर बच्चे किसकी बात सुनेंगे। दोस्त अच्छे बुरे हो, टीवी सीरियल अच्छे-बुरे हों, ज्यादातर समय बच्चे उन्हीं के साथ गुजारते हैं। शायद यही वजह है कि कई बार टीवी सीरियल में बिना नागा किए दिखने वाले चरित्र बच्चों को अपने परिवार के ही सदस्यों से ज्यादा नजदीक लगने लगते हैं।

कई बार काम और बच्चों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश करते-करते मां-बाप ही अलग हो जाते हैं। दोनों कमा रहे होते हैं, लगभग एक जैसा ही। इसलिए घंटे देखकर बच्चे के देखभाल का भी हक तय कर लेते हैं। एक का हक टूटा तो, दूसरा चढ़ बैठता है। और, कर्तव्य तो, बेचारा अब डिक्शनरी में भी शायद ही होगा। सिर्फ हक की पढ़ाई पढ़ने वाले ये वीकेंड चिल्ड्रेन भी मां-बाप को याद करने के लिए आगे सिर्फ हैपी मदर्स डे या हैपी फादर्स डे का इंतजार करते रहते हैं।

वैसे हैपी फादर्स डे और हैपी मदर्स डे कल्चर देने वाले भी अब परेशान हैं। वहां के बच्चों को तो मां-बाप से ज्यादा दूसरी दुनिया में पहुंचा देने वाली दवाइयां ज्यादा अपनी लगती हैं। अब न्यूयॉर्क की एक ताजा खबर कह रही है कि जानकार मां-बाप को बच्चों के साथ ज्यादा समय रहने की सलाह दे रहे हैं। कह रहे हैं कि मां-बाप के ज्यादा साथ रहने से बच्चे के कम उम्र में नशेड़ी बनने की संभावना कम हो जाती है। वरना वो दोस्तों के साथ ज्यादा समय बिताता है और पार्टी और दोस्तों का साथ उसे हाईस्कूल में ही शराबी बना देता है।

मैरीलैंड युनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सब्सटेंस एब्यूज रिसर्च के मुताबिक, कॉलेज में ही छात्रों के शराब की लत पड़ने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। साथ ही मां-बाप का अगर पूरा साथ और सही सलाह न मिले तो, बच्चे इन्हीं दिनों में सेक्सुअल एक्टिविटी में भी लग जाते हैं। हमारे मां-बाप वीकेंड पैरेंट बनकर अपराध बोध में जी रहे हैं और सोच रहे हैं कि पैसा कमा नहीं कमा पाए तो, बच्चा बड़ा होकर उन्हें इस बात के लिए दोषी ठहराएगा कि उसे अगर सुविधाएं मिली होतीं तो, वो तरक्की की दौड़ में और आगे जा पाता। और, अमेरिका में रिसर्चर मां-बाप को समझा रहे हैं कि थोड़ा कम पैसे कमाओ लेकिन, बच्चे को ज्यादा समय दो नहीं तो, बच्चे शराब और सेक्स में ऐसे फंस जाएंगे कि कितना भी पैसा काम नहीं आएगा। अब विकल्प तो सबके लिए खुला है।


8 Comments

अनिल रघुराज · March 11, 2008 at 5:15 pm

अच्छा पहलू ये है कि बच्चे छुटपन से ही एकांतिक जीवन के अभ्यस्त होने लगे हैं। अपनी ज़रूरतों के प्रति सचेत होने लगे हैं। अगर उन पर निगाह रखी जाए और उचित दिशा देते रहा जाए तो उनका अच्छा विकास भी संभव है। विकसित देशों में तो बच्चे को एक-दो महीने का होते से ही अलग सुलाने लगते हैं। दो-तीन साल का होने पर उनका कमरा अलग हो जाता है। मां-बाप जान-बूझकर उन्हें अपने फैसले करने की आदत डालते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी · March 12, 2008 at 2:13 am

हर्ष भाई, हम ने नौकरी नहीं की। की वकालत। 10 से 11 के बीच घर से निकलना और चार से छह के बीच वापस आ जाना। अपनी वकालत का दफ्तर घर पर ही रखा। बच्चों और पत्नी से नजदीकी बनी रही। नतीजा भी सुखद ही रहा। बच्चे अब बाहर हैं लेकिन रोज बात होती है। लगता है सभी दूर होते हुए भी नजदीक बने हुए हैं। परिवार से ही नजदीकी नहीं तो आप जी किस लिये रहे हैं? और परिवार किस लिए है?

Sanjay Sharma · March 12, 2008 at 6:05 am

सभी कहते तो हैं कि ज़माना बदल गया है .जबकि हम सभी धीरे धीरे इतना बदल चुके कि वापस आने मे मुश्किल महसूस कर रहे है . आधुनिकता इतनी बड़ी कीमत वसूला है कि अब हम अपनी संस्कृति पर गर्व नही
कर सकते . दिनेश राय जी से सहमति और अनिल रघुराज जी से असहमति रखता हूँ . दिल को छूता आपका यह लेख काबिले तारीफ़ है . विकास जब परिवार को कब्जा ले तो उसे विकास नही विनाश ही कहा जाएगा .

Anonymous · March 17, 2008 at 12:09 pm

banawati duniya se ek cheez yaad ayi—aap ek SACHCHE INSAAN KA DHEERE DHEERE BANAVATI HO JANE KE TRANSITION PERIOD pe kyu nahi kuch likhte sir—–

Vikas · March 17, 2008 at 8:23 pm

हर्ष जी, आज दुनिया तेज़ी से भाग रही और हर कोई सफल होना चाहता है. इस आपाधापी में समय कहा है अभिभावकों के पास. शायद बदले हुए सामाजिक तानेबाने की सच्चाई यही है और हमे स्वीकार करनी भी होगी. ज़माना वीकेंड पेरेंट्स का है और शायद आगे संडे पेरेंट्स का हो जाए. भौतिक चीज़ें रिश्तों पर भारी हैं (शाह रुख़ ख़ान).

TV Digital · March 18, 2008 at 9:28 pm

Hello. This post is likeable, and your blog is very interesting, congratulations :-). I will add in my blogroll =). If possible gives a last there on my blog, it is about the TV Digital, I hope you enjoy. The address is http://tv-digital-brasil.blogspot.com. A hug.

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aane wale 3-4 din chhutti hai—ab to kuch likh dijiye sir —aapka blog padhna isliye achcha lagta hai kyunki isme hamari aur aapki jindagi ke hi kuch pahluo ko chhua jata hai—-baaki blogs par international level ya jad ho chuki problems par likha jata hai wo jyada appeal nahi karta mujhe—

Pratiksha · March 28, 2008 at 2:32 am

It’s interesting the way you are managing your blog so regularly. No, I don’t just write about movies and music. Blogs are for my blabber bouts on anything and everything. As they are my primary interests as well as connected to my area of work, I end up writing more about them. Regards.

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