भारत गांवों का देश है। और ये बात हम भारतीयों के दिमाग में ऐसे भर गई है कि अगर कोई गलती से भी शहर की बात करने लगे तो लगता है कि ये भारत बिगाड़ने की बात कर रहा है। लेकिन, उसी का दूसरा पहलू ये है कि शायद ही नई उम्र का और काफी हद तक पुरानी उम्र का कोई भारतीय हो जो पूरे मन से सिर्फ गांव में ही रहना चाहता हो। यहां तक कि गांव में रहकर अच्छा करने वाले ढेर सारे लोग भी अपने उस अच्छे काम के बूते और इसी अच्छे काम की तारीफ पाने के लिए शहर में ही आना-रहना चाहते हैं। लेकिन, फिर भी भारत मतलब गांवों का देश और खेती करने वालों का देश रखे रहना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते एक बड़ा शानदार काम किया कि इस गांवों वाले भारत को शहरों की इच्छा रखने वाले इंडिया में बदलने की शुरुआत कर दी। और इसे बड़े सलीके से उन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने आगे बढ़ाया जिनकी मूल विचारधारा गांव, देश, भारत के गर्व से जुड़ी हुई थी। लेकिन, अटल बिहारी वाजपेयी ने न उदारीकरण चिल्लाया। न विदेशी पूंजी का हल्ला मचाया। चुपचाप काम किया। दो काम किया। एक देश के सड़क परिवहन को दुरुस्त किया और ऐसा दुरुस्त किया कि भारतीय स्वर्णिम चतुर्भुज योजना दुनिया के लिए एक मिसाल बन गई। और दूसरा काम ये किया कि देश के लोगों में ये भावना भर दी कि भारत अपने बूते कुछ भी कर सकता है। वो हुआ पोखरण परमाणु परीक्षण के समय। पहला जमीन पर किया गया तगड़ा काम था। दूसरा देश की इच्छाशक्ति को मजबूत करने वाला भावनात्मक काम था। और यही दोनों मिलकर ऐसा बन गया कि अटल बिहारी वाजपेयी की छे साल की सरकार सड़क बनाने से लेकर लगभग हर मामले में आजाद भारत की सारी सरकारों से बेहतर करार दी जाने लगी। और बिना हल्ला किए उस सरकार के सारे मंत्रियों ने शानदार काम किए। सड़क परिवहन मंत्री के तौर पर फौजी भुवन चंद्र खंडूरी, ऊर्जा मंत्री सुरेश प्रभु, पेट्रोलियम मंत्री राम नाइक, शहरी विकास मंत्री जगमोहन, मानव संसाधन मंत्री डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी या वित्त मंत्री के तौर पर यशवंत सिन्हा। ये उदाहरण मैंने दिया है। उस सरकार के किसी मंत्री के न भ्रष्टाचार की कहानियां छपीं। न उस सरकार के मंत्रियों की संवेदनहीनता की बात सामने आई। ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि, अटल बिहारी वाजपेयी को अच्छे से पता था कि उनकी सरकार को कांग्रेस का जवाब देने का मौका कम मिलेगा। पूरा पांच साल मिला भी तो दोबारा नहीं मिलेगा। इसलिए घोड़े की तरह सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अपने देश की तरक्की के लक्ष्य को सामने रखा। और शानदार तरीके से उस लक्ष्य के नजदीक भी पहुंचे।

इसका जिक्र दरअसल इसलिए मैंने किया कि आज के जिस भारत की बार-बार बात होती है। वो भारत प्रधानमंत्री नरसिंहाराव-वित्त मंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी पूरी सरकार ने बनाया, बेहतर बनाया। हालांकि, जो बात मैंने शुरु में ही की कि भले ही पूरा देश शहरों
में, शहरी सुविधाओं के साथ जीने की इच्छा रखता हो लेकिन, वो बात गांवों की ही करेगा। भावनाओं, प्रतीकों का दोहन इस देश में बड़े सलीके से होता रहा है। इसीलिए 2004 में इंडिया शाइनिंग जब फेल हो गया तो बड़े सुनियोजित तरीके से अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी पूरी सरकार के शानदार कार्यकाल को ध्वस्त कर दिया गया। लेकिन, भला हो 2008 की आर्थिक मंदी का और उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रबर स्टैंप बनाकर सोनिया गांधी की ढुलमुल नीतियों पर चलाई गई सरकार का। जिससे ये तुलना होने लगी कि आखिर बेहतर कौन। और इसी बीच बेहतर तरीके से गुजरात सरकार चला रहे नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा सामने आई। महत्वाकांक्षा रखने के साथ नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से अपने हर अच्छे काम, योजना को लोगों तक पहुंचाया वो भी शानदार रहा। शुरू में अहमदाबाद में नगर निगम चुनावों से ठीक पहले अतिक्रमण करने वाले मस्जिदों के साथ मंदिरों को तोड़ने से मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों, खासकर विश्व हिंदू परिषद के गुस्से का शिकार बने थे। लेकिन, जब परिणाम आए तो संघ का ये स्वयंसेवक ही विचारधार का असल वाहक नजर आने लगा। और इसीलिए जब नरेंद्र मोदी ने सांस्कृतिक विरासत को बचाने वाले पन्ने को घोषणापत्र के सबसे आखिर में कर दिया तो संघ के किसी नेता को परेशानी नहीं हुई और न ही घोर हिंदुत्ववादी समर्थकों को भी। इसी पन्ने में राम मंदिर, गंगा, गाय का जिक्र है। यही नरेंद्र मोदी की ताकत है। घोषणापत्र में जिस तरह राष्ट्र, राष्ट्रीय और राष्ट्रीयता तो जगह दी गई है वो भी शानदार है। इकोनॉमिक नेशनलिज्म (आर्थिक राष्ट्रवाद), नेशनल लैंड यूज पॉलिसी (राष्ट्रीय भूमि प्रयोग नीति) भारतीय जनता पार्टी के पार्टी विद डिफरेंस वाली लाइन को मजबूती से आगे बढ़ाता है। इसी घोषणापत्र में ये भी कहा गया है कि राष्ट्रीय विकास की ऐसी रूपरेखा होगी जो राज्यों के जरिए आगे बढ़ेगी। मुसलमानों को भी मुख्य धारा में लाने की बात है। मदरसों में गणित, विज्ञान, अंग्रेजी पढ़ाना और वक्फ की संपत्तियों का सही इस्तेमाल उसी बात को साफ-साफ कह रहे हैं। नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी आलोचना ये भी है कि वो अटल बिहारी वाजपेयी की तरह सर्व स्वीकार्य नहीं हैं और सबको साथ लेकर नहीं चलना चाहते हैं। घोषणापत्र के जरिए नरेंद्र मोदी ने उन आलोचकों को भी तगड़ा जवाब देने की कोशिश की है।

नरेंद्र मोदी ने घोषणापत्र में पांच टी- ट्रेडीशन (परंपरा), टैलेंट (प्रतिभा) टूरिज्म (पर्यटन), ट्रेड (कारोबार)  और टेक्नोलॉजी (तकनीक) को आगे ले जाने की बात की है। अटल बिहारी वाजपेयी की स्वर्णिम चतुर्भुज

योजना का मतलब आज समझ में आ रहा है। वरना तो शेरशाह सूरी की बनाई जीटी रोड ही भारत की पहचान थी। और अगर नरेंद्र मोदी उसी तर्ज पर बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहे हैं। तो समझिए ये योजना अगर कामयाब होती है तो क्या चमत्कार हो जाएगा। नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी का घोषणापत्र 100 नए शहर बनाने की भी बात कर रहा है। समझें तो ये दोनों जुड़ी घोषणाएं हैं। अगर बुलेट ट्रेनें चलीं तो महानगरों – दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलूरू – पर दबाव कम होगा। नए शहर बनेंगे। पहले से बने शहरों में मौके बढ़ेंगे। नदियों को जोड़ने की योजना हो या फिर पोर्ट तक रेलवे स्टेशन पहुंचाने की बात। ये नए भारत की बात होती दिखती है। कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि बीजेपी के घोषणापत्र में कई योजनाएं ऐसी हैं जो कांग्रेस पहले से ही चला रही है। सच्चाई ये है कि कांग्रेस दस प्रतिशत की तरक्की का सपना दिखाकर हम भारतीयों को साढ़े चार प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार पर ले जाकर छोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि यूपीए की सरकार के पास योजनाएं कम थीं। योजनाएं थीं लेकिन, नीतियां हर पल बदल रही थीं। नरेंद्र मोदी के साथ कम से कम अभी तक तो ये भरोसा होता है कि वो चाहेंगे, करेंगे। ये उनके विरोधी तानाशाही रवैये के तौर पर जोर से कहते हैं लेकिन, विकास की चाह रखने वाले नए भारत को यही आश्वस्त करता है। पोर्ट के विकास के साथ भाजपा के घोषणापत्र में देश के सीमावर्ती इलाकों को बेहतर रेलवे, सड़क सुविधा से जोड़ने की भी योजना है। इन योजनाओं का एक हिस्सा भी सलीके से हुआ तो बिन कहे देश दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार हासिल कर लेगा। ठीक वैसे ही जैसे बिना कहे स्वर्णिम चतुर्भुज ने इस देश के सड़क परिवहन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर खड़ा कर दिया था।  
भारतीय जनता पार्टी का घोषणापत्र बेहतर है या नहीं। इस पर बहस हो रही है। नरेंद्र मोदी के नजरिए से अच्छी बात ये है कि नरेंद्र मोदी वाली भारतीय जनता पार्टी के समर्थक ऐसे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वो अंध समर्थक हैं। लेकिन, बीजेपी घोषणापत्र की एक लाइन पर टिप्पणी का मुझे जो जवाब मिला उससे मैं आश्वस्त हुआ कि दरअसल नरेंद्र मोदी के अंध समर्थक भी पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के कार्यक्रमों के बारे में जानते हैं और उसे आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। भारतीय जनता के घोषणापत्र में कम पानी से ज्यादा खेती की बात की गई है। उसके आधार पर दूसरे खेती के अल्पज्ञानियों की तरह मैंने भी ये अंदाजा लगा लिया कि ये कैश क्रॉप या फिर उद्योगों को खेती में शामिल करने मतलब कॉर्पोरेट खेती बढ़ाने का बीजेपी का एजेंडा है। मैंने इस सवाल को जैसे ही सोशल नेटवर्किंग साइट पर डाला मुझे स्रोतों के साथ जवाब दे दिया गया। पता चला कि कम पानी से ज्यादा खेती ड्रॉप इरिगेशन है जिसे लंबे समय से गुजरात में प्रयोग किया जा रहा है। इस बात का जिक्र मैंने सिर्फ इस संदर्भ को समझाने के लिए किया कि नरेंद्र मोदी वाली भारतीय जनता पार्टी के समर्थक कितने जागरुक और नरेंद्र मोदी के विचारों को लागू करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। दरअसल भारतीय जनता पार्टी का घोषणापत्र पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल को देश भर में लागू करने का लिखित दस्तावेज है। और इसीलिए आर्थिक नजरिया पहले बेहतर हो इसकी तसल्ली के बाद ही आस्था बनी रहे इसका भी ख्याल रखा गया है। अच्छी बात ये है कि नरेंद्र मोदी के विजन का ये दस्तावेज भविष्य के बेहतर होने के संकेत दे रहा है।

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