अरविंद केजरीवाल की एक के बाद एक क्रांतिकारी हरकतों के बाद कई लोग दिल्ली की जनता का
मजाक उड़ाते दिख रहे हैं। क्योंकि, दिल्ली
की जनता ने साल भर में ही दो बार अरविंद और उनकी आम आदमी पार्टी को सत्ता सौंपी।
अब जरा सोचकर देखिए कि दिल्ली की जनता कितनी समझदार है। उसका मजाक उड़ाने वाले
मूर्खता कर रहे हैं। लोकतंत्र संतुलित रहे, इसे
दिल्ली की जनता ने तय कराया। बीजेपी दिल्ली चुनाव के समय जिस तरह का व्यवहार कर
रही थी, क्या उस समय बीजेपी का दिल्ली जीतना
लोकतंत्र के लिए बेहतर होता। अरविंद को राजनीति के एक नए प्रयोग के तौर पर दिल्ली
की जनता ने परखने की कोशिश की। एक बार अल्पमत में और दोबारा बहुमत में सत्ता देकर।
भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की यही खूबी है। जब कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत के
साथ लोकतंत्र में राजशाही जैसा व्यवहार करने लगी थी। तभी क्षेत्रीय पार्टियों का
उदय हो गया। और ऐसा उदय हुआ कि कांग्रेस को इन क्षेत्रीय पार्टियों के सामने नाक
रगड़नी पड़ी। राष्ट्रीय पार्टियों की तानाशाही से क्षेत्रीय पार्टियों के चंगुल
में फंसी राष्ट्रीय पार्टियों की सरकार का चक्र पूरा हुआ। लगने लगा था कि अब तो
देश में पूर्ण बहुमत की सरकार आने से रही। उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर राष्ट्रीय
परिदृष्य तक ऐसा ही दिखने लगा। फिर अचानक उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर राष्ट्रीय
सरकार तक परिपक्व लोकतंत्र की परिपक्व जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकारें बनाना शुरू
कर दिया।
 फिर
लगने लगा कि लोकतंत्र में तो विकल्प ही खत्म हो गया है। 160-180 या अधिकतम 200 के
खांचे में पड़ी दिखने वाला बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और देश की स्वयमेय
सिद्ध सत्ताधारी पार्टी के तौर पर स्थापित कांग्रेस 44 सांसदों वाला दल बनकर रह
गया। महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना का मुकाबला देश ने देखा। उस समय महाराष्ट्र की
जनता ने लोकतंत्र परिपक्व करने का काम किया। हरियाणा की जनता ने भी साबित कर दिया
कि विकल्प देने में जनता का कोई जोड़ नहीं है। हरियाणा में चमत्कारिक तौर पर भारतीय
जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल गया। ये दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बनने से बड़ा
चमत्कार था। लेकिन, पहले से बीजेपी भारतीय राजनीति में प्रभावी भूमिका में थी।
दूसरे राज्यों में बीजेपी की सरकार रही। इसलिए राजनीतिक पंडितों को ये क्रांति
नहीं लगी। फिर जब भारतीय जनता पार्टी को ये लगने लगा था कि अब तो जीत के अलावा कुछ
कमल के निशान पर होगा ही नहीं। तब दिल्ली की जनता ने वो किया जो, मोदी-शाह की
कल्पना से भी परे था। 70 में से 67 सीटें दे दीं। ये परिक्व दिल्ली की जनता का
शानदार फैसला था। जो, लोकतंत्र का अद्भुत संतुलन कर रहा था। अब अरविंद अगर उस
विकल्प, संतुलन के महत्व को अपनी बेवकूफियों से दरकिनार करना चाह रहे हैं तो, ये
दिल्ली की जनता के फैसले की गलती नहीं है। हां, ये जरूर है कि जनता नेताओं को विकल्प
देती है। लेकिन, अगर जनता को बेवकूफ समझने की कोशिश की तो, बेवकूफियों को खारिज
करती है ये, भारतीय राजनीति में लालू प्रसाद यादव के हश्र से समझा जा सकता है। पता
नहीं अरविंद और आम आदमी पार्टी की समझ में अभी ये बात थोड़ा बहुत भी आ रही है या
नहीं।