कश्मीर में अमन है। पहली नजर में देखने में ये अमन बंदूक के खिलाफ बंदूक की ताकत का अमन दिखता है। जम्मू स्टेशन पर उतरने के बाद श्रीनगर यानी धरती पर जन्नत मेंहर तरफ बंदूक के साथ चौकस सुरक्षाबल के जवान इस बात का भरोसा तो दिलाते हैंकि कश्मीर में अमन है लेकिन, साथ ही दहशतका अहसास भी दिलाते रहते है असल में दहशतगर्दी को यहां बंदूक ने नहीं बाजार ने मात दे दी है।

जम्मू से कटरा के लिए टेढ़ीमेढ़ी पहाड़ियों पर चढ़ते हुए कटरा से मां वैष्णो देवी के दरबार के लिए साढ़े बारह सौ रुपए में जाने वाले हेलीकॉप्टर के विज्ञापन के साथ ही कुटॉन्स शर्ट के भी बड़े-बड़े विज्ञापन नजर आ जाते हैं। साफ है बिना मुनाफे के विज्ञापन नहीं हो सकता। यानी बड़ी-बड़ी कंपनियों को अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए मांवैष्णो देवी के दरबार में आने वाले भक्तों पर भरोसा है।ये बाजारका वो पक्ष है जो, अक्सर इसका विरोध करने वालों को कभी नजर नहीं आता। पिछले दो दशकों से आतंकवाद की वजह से जमाने पुरानी जिंदगी जी रहे लोगों को बाजार ने नई रंगत दे दी है।

जम्मू से श्रीनगर के लिए फ्लाइटका सफर शुरू होते ही एक बार फिर सुरक्षा की कड़ी जांच इस बात का अहसास दिलाती है कि हवा में कुछ दहशत है। लेकिन, श्रीनगर हवाईअड्डे पर उतरने के बाद टैक्सी में इस दहशत को दूर करता है फिर वही बाजार। लेकिन, बाजार यहां प्रोडक्ट बेचने के बजाए सुरीले रस घोलता है।बिग 92.7 एफएम पर सबकी आंखों का तारारेडियोजॉकी सारा आपकोनए पुराने सुनाकर कश्मीर की फिजां को और खूबसूरत बनाती है।

जनवरी -फरवरी का समय कश्मीर के लिए पीक सीजन नहीं होता यानी धरती की जन्नत जाने के लिए लोग ये समय कम चुनते हैं। लेकिन, असल कश्मीतो, सर्दियों में कश्मीर की डल लेकके किनारे की सड़क पर शाम को हल्की बर्फबारी में घूमकर ही देखाजा सकता है। डल गेट से लेकर शंकराचार्य मंदिर और मशहूर मुगल गार्डन जाने वाली सड़क पर बंदूक की आंखों से लोगों की पहचान करते सुरक्षाकर्मी सिर्फ इतनी दूरी पर होते हैं कि एक की तेज पुकार दूसरे तक पहुंच जाए।

यहां डल गेट पर बाजार फिर हाजिर है। डल लेक में पांच से छे सौ हाउसबोट में ज्यादातर हाउसबोट के नाम बड़े शहरों में दुकानों के साइनबोर्ड की ही तरह किसी न किसी विज्ञापन के साथ चमक रहेहोते हैडल लेक का मजाशिकारे की सैर के बिना बेकार है और इस शिकारे के चलते ही बाजार साथ चलने लगता है। शिकारे को आगे बढाने के लिए चलने वाले हर दसवें चप्पू पर कोई न कोई नई कश्ती शिकारे के बगल में आकर कुछ बेचने की कोशिश करती है।

कश्मीर के खास केसर और शिलाजीत से कश्मीरी हैंडीक्राफ्ट तक। चलती फिरती फोटो शॉप भी है और कश्मीरी कहवा से आगे कोल्डड्रिंक का विज्ञापन भी साथ लजे और कुरकुरे तो होंगे ही। वैसे तो, कश्मीर में अॉटो से पुरानी बाजार तक जाने के पचास रुपए से कम नहीं लगते। लेकिन, हो सकता है कि कोई अॉटो वाला सिर्फ दस रुपए में आपको बाजार की सैर कराकर वापस पहुंचाने को तैयार हो जाए। इसकी वजह भी बाजार ही है।ये अॉटो शॉप की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का हिस्सा है। आप पर ये भी दबाव नहीं होगा कि आप कुछ खरीदें हीं। पसंद आए खरीदिए नहीं तो, कोई बात नहीं दस रुपए में ही अॉटो वाला वापस डल गेट छोड़ देगा। बाद में वहां से कुछ खरीदने का जी करे तो, फोन कीजिए दस रुपए वाला अॉटो हाजिर है।

मैंने सुन रखा था कश्मीर में शाकाहारी खाना मिलना मुश्किल है। लेकिन, डल लेक के किनारे ढाबे से लेकर दिल्ली के नाथू स्वीट्स के रेस्टोरेंट तक सब मिलेगा। बाजारके साथ प्रोफेशनलिज्म अपने आप आ जाता है। गुलमर्ग की बर्फ के बीच में भी बाजारचुपचाप अपना काम कर रहा है। स्लेज गा़ड़ी खींचने वाले को रोजगार मिला है तो, नए जोड़ों को उनके हनीमून ट्रिप की यादगार वीडियो हाथ के हाथ देनेवाले भी अपनी दुकान चला रहे हैं। कश्मीर में अमन है इसलिए गुलमर्ग से पहले तंगमर्ग कस्बे के रियाज को गाइड का काम भी आसानी से मिल रहा है। दो बहनों की पढ़ाई और घर का खर्च इसी अमन की वजह से ही चल रहा है।

कश्मीर में अब लोगों को जेहाद के नारे से ज्यादा बिग एफएम की सारा की बकबक ज्यादा अच्छी लगती है। लेकिन, कश्मीर के अमन कादुश्मन है कि सरकार पर यहां के लोगों का भरोसा नहीं बन पाया है। दो दशकों से इतने खुशहाल और समृद्ध राज्य को आतंक से बरबाद कर देने वालों से अभी भी यहां के कुछ लोगों को सहानुभूति है। वैसे बाजार के विरोध ये दहशतगर्द भी हैं क्योंकि रेडियो के गाने गोलियों की आवाज की दहशत कम करते हैं। डल लेक के किनारे देर शाम तक टहलते नए जोड़े भी दहशतगर्दी को चिढ़ाते हैं। यहां बाजार ही काम कर रहा है अमन लाने में। बाजार का सीधा फायदा यहां दिख रहा है। यहां सरकार और बाजार को साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। सरकार ने बाजार के चलने का पुख्ता इंतजाम कर लिया तो, अमन अपने आप जन्नत में लोगों को न्यौता दे रहा होगा। अब आप भी बाजार का शुक्रिया अदाकर जन्नत घूमने जा सकते हैं।


2 Comments

Alok Vani · April 13, 2007 at 4:47 pm

हर्ष जी,
जब भी आपका ये लेख पढ़ता हूं, तो कश्‍मीर की हसीन वादियों में जाने की इच्‍छा होने लगती है। लेकिन, इससे तो मैं सहमत हूं कि बाजार और हमेशा से ही बंदूक पर भारी पड़ता है।
-आलोक

Mohan · July 9, 2009 at 11:09 am

bahut sunder lekh hai, bahut sunder varnana hai kashmir ka, hakikat ke saath..

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