राहुल के डिस्कवर इंडिया कैंपेन में उन्हें कुछ मिला हो या न मिला हो। विरासत में कांग्रेसी राजनीति के खासमखास परिवारों के दो ‘बाबा लोगों’ को आखिर ‘बड़का लोगों’ की राजनीति में जगह मिल ही गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद को चुनावी साल के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल गई है। चुनावों को ध्यान में रखकर कुछेक और छोटे-छोटे मंत्रिमंडलीय परिवर्तन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मैडम सोनिया के इशारे पर किए लेकिन, खास बदलाव यही दोनों हैं।

सोनिया गांधी, राहुल को ठीक उसी तरह से गद्दी संभालने के लिए तैयार कर रही हैं। जैसे, महाराजा-महारानी युवराज को गद्दी के लायक बनाते थे। राजशाही और लोकतंत्र में फर्क सिर्फ इतना ही है कि तब 14 साल का युवराज भी खास दरबारियों के भरोसे गद्दी संभाल लेता था। अब, लोकतंत्र में कम से कम 25 साल की उम्र तो होनी ही चाहिए। और, दरबारियों से ज्यादा हैसियत हासिल करनी ही होती है। ये दिखाता है कि जो, वो कह रहा है वो किसी भी वरिष्ठ दरबारी से ज्यादा सुना जा रहा है। वो, काम सोनिया ने राहुल के लिए धीरे-धीरे पूरा कर दिया है।

राहुल ने डिस्कवर इंडिया कैंपेन में कहा कि देश की राजनीति में युवाओं को कम मौका मिल रहा है। फिर जब उन्होंने अपनी पार्टी कांग्रेस पर भी यही आरोप लगाया तो, लोगों को लगा कि भारतीय राजनीति में गजब का ईमानदार नेता सामने आ रहा है। लेकिन, ये ईमानदारी कम थी और राजनीति ज्यादा। इसका अंदाजा इससे साफ लग जाता है कि मंत्रिमंडल में जो परिवर्तन कए गिए हैं वो, परिवर्तन कहीं से भी चुनाव को बहुत प्रभावित नहीं करेंगे। हां, राहुल के युवाओं को मौका न दिए जाने की बात उठाने पर दो युवाओं को मौका दे दिया गया। पहले राहुल के साथ के लिए राष्ट्रीय कांग्रेस में खानदानी कांग्रेसियों के घर के बच्चों को एक साथ मौका दिया गया था।

मीडिया में भले ही ये बात कही जा रही हो कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में आधार बढ़ाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद को केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया है। लेकिन, उत्तर प्रदेश की राजनीति को थोड़ा भी जानने वाला ये बात अच्छे से जानता है कि जितिन प्रसाद को कितने ब्राह्मण अपना नेता मानते हैं और ग्वालियर से बाहर ज्योतिरादित्य की कितनी ताकत है। कुल मिलाकर राहुल बिना प्रधानमंत्री बने ही मंत्रिमंडल का फैसला करने लगे हैं। तो, कांग्रेस की ओर से अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित करने की जरूरत अब भी है क्या। क्योंकि, त्याग की प्रतिमूर्ति सोनिया गांधी दुबारा विदेशी मूल का मुद्दा तो विरोधियों को देना भी नहीं चाहेंगी। त्यागी सोनिया ने ये भी बता दिया कि राहुल ने मंत्री बनने से इनकार कर दिया है।


4 Comments

Udan Tashtari · April 8, 2008 at 4:46 am

युवाओं को मौका मिलेगा, जानकर उत्साहवर्धन हुआ कि अपना चान्स लग सकता है. 🙂

Gyandutt Pandey · April 8, 2008 at 10:30 am

परिवारवाद के विकल्प के रूप में जो क्षेत्रीयता वाद/जातिवाद/छद्म-समाजवाद उभरा है; वह कम पीड़ादायक नहीं है। च्वाइस सांपनाथ और नागनाथ में ही है!

Akinogal · April 9, 2008 at 6:56 am

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