एक और धमाका। जगह वही दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर जहां 25 मई को कोई नहीं मरा था। अब कितने मरे, किस तरह से धमाका हुआ। सरकार की आपात बैठक। इस संगठन की चिट्ठी। अगले धमाके का इंतजार। बस ना कि और कुछ।

हां, जब धमाके न हों तो, बहस ये कर लें कि आतंकवादियों को भी फांसी देना क्या ठीक है। अब पूरा हो गया।


2 Comments

प्रवीण पाण्डेय · September 7, 2011 at 9:37 am

मोरा दर्द न जाने कोय।

डॉ. मनोज मिश्र · September 8, 2011 at 3:24 am

सही कह रहे हैं.

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