आज मुंबई में कोई हॉर्न नहीं बजाएगा। पुलिस तो ऐसा ही कह रही है। पुलिस ने नो हॉन्किंग डे घोषित कर रखा है। महानायक अमिताभ बच्चन ने भी अपनी गाड़ी पर नो हॉन्किंग डे का स्टीकर चिपकाया है और टीवी पर लोगों से अपील कर रहे हैं कि कम से कम आज गाड़ी का हॉर्न न बजाएं। दरअसल 7 अप्रैल यानी आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है। और ध्वनि प्रदूषण (शोर) से होने वाली बीमारियों पर थोड़ा काबू के लिए मुंबई पुलिस ने हॉर्न बजाने पर एक दिन के लिए जुर्माना लगा दिया है।

मैं मुंबई के लोवर परेल में रहता हूं। बिग बाजार के बगल घर है यानी मुख्य सड़क है। घर की खिड़की खोलना तक मुश्किल है कि सड़क पर गाड़ियों के हॉर्न के शोर से घर में टीवी नहीं देख सकता। बातें भी आपस में थोड़ा तेज स्वर में ही करनी पड़ती है। हाल ये है कि कान तेज सुनने का ही आदी हो गया है। यही वजह है कि ज्यादातर समय हमारा घर खुली हवा से परिचित नहीं हो पाता है। इसलिए, आज हॉर्न पर पाबंदी के पुलिस के फैसले से मुझे तो, दूसरे नो हॉर्न दिवस के पैरोकारों से ज्यादा खुश होना चाहिए। लेकिन, मुझे खुशी नहीं हो रही है बल्कि, चिढ़ हो रही है। वजह नंबर एक- आज भी मेरे घर के सामने हॉर्न धड़ल्ले से बज रहा है, मेरे घर की खिड़की बंद है-क्योंकि, यहां कोई पुलिस वाला नहीं खड़ा है। वजह नंबर दो- क्या अच्छे काम भारत में सिर्फ दिवसों में ही मनाए जाएंगे।

मुझे लगता है कि हमारा देश ना, सिर्फ दिवसों के भरोसे ही चल रहा है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस है तो, थोड़ा आजादी की बात करेंगे। देशभक्ति गीत सुनेंगे, झंडा फहराएंगे। गांधी जयंती है तो, खादी की बात करेंगे, ग्राम स्वराज्य की बात करेंगे, अहिंसा की बात करेंगे। वैलेंटाइन डे है तो, बीवी से, गर्लफ्रेंड से ज्यादा प्यार जताएंगे। मदर्स, फादर्स डे पर मम्मी-पापा के लिए कुछ तोहफे खरीद लेंगे।

और, दिवस भी चूंकि प्रतीकात्मक हैं। इसलिए बड़े शहर, राजधानी तक ही सिमट जाते हैं। किसी भी दिवस को याद कर लीजिए। आखिर, स्वास्थ्य दिवस है तो, फिर इसी बहाने पूरे देश में हॉर्न पर सख्ती सरकार को क्यों नहीं सूझा, भले ही एक दिन के लिए ही सही। मुंबई पुलिस ये सोच सकती है तो, महाराष्ट्र पुलिस इसे पूरे राज्य में क्यों नहीं लागू कर सकती थी। और, आज यानी नो हॉर्न दिवस पर भी बिना वजह के ही हॉर्न बजाने पर जुर्माना है तो, ये बिना वजह हॉर्न बजाने वालों से पुलिस रोज सख्ती से क्यों नहीं निपटती। लेकिन, इसके लिए भारी तोंद वाले कांस्टेबल और दरोगा लोगों को ट्रैफिक के कायदे का पालन सही से करना होगा और चालान बुक का इस्तेमाल अपनी कमीशन की रकम बढ़ाने के लिए करने से बचना होगा।

दुनिया के कई देशों में मीलों जाने पर शायद हॉर्न की आवाज सुनाई दे। फिर यहां ऐसा क्यों नहीं हो पाता। यहां घर से निकलते ही हॉर्न कान के रास्ते से घुसकर माथे पर एक अजीब से विकार की तरह बैठ जाता है। हर हॉर्न मारने वाले की दलील कि आगे की गाड़ी या कुछ और वजह से रास्ता ही नहीं मिलता तो, हॉर्न बजाना जरूरत बन जाता है। लेकिन, लाल बत्ती पर हॉर्न बजाने की क्या जरूरत होती है। हॉर्न बजाने की आदत हम भारतीयों की इतनी आम हो गई है कि हम अब इसे नोटिस भी नहीं लेते। ड्राइवर को लगता है कि गेयर, ब्रेक, क्लच, स्टेयरिंग के साथ हॉर्न को भी निरंतर इस्तेमाल ही करना होता है।

हाल इतना बुरा है कि शनिवार को रात एक कुछ मित्रों के साथ पार्टी में नवी मुंबई जा रहा था तो, चेंबूर के पास एक एम्बुलेंस हमारी गाड़ी के पीछे लगातार हूटर बजाती आ रही थी। लेकिन, कोई रास्ते देने को तैयार नहीं था क्योंकि, आगे भी उतना ही जाम था। हमने अपनी गाड़ी किनारे करवाकर उसे रास्ता तो दे दिया लेकिन, अगले बीस मिनट तक हमारे आगे ही फंसा रहा।

छोटे शहरों में पहले कुछ दरोगा हुआ करते थे। जो, जिस पुलिस स्टेशन में चार्ज संभालते थे। वहां कुछ दिनों के लिए मोटरसाइकिल के प्रेशर हॉर्न ब्रेक हॉर्न सब बंद हो जाते थे। वैसे ये दरोगा लंबे बाल वाले लड़कों के बाल भी कटवा देते थे। और, चौराहे पर पुलिस के पास कटे बालों के साथ बाइक्स से निकाले हॉर्न का बड़ा गुच्छा तैयार हो जाता था। ये ज्यादती है लेकिन, दिवसों के भरोसे चल रहे हॉर्न बजाने के आदती भारत को सुधारने के लिए जरूरी है कि ऐसे दरोगाओं को सिस्टम के कुछ सुधार का जिम्मा दे ही दिया जाए। क्योंकि, खिड़की बंद करने के बाद भी मेरे कान के रास्ते से घुकर माथे पर हॉर्न के शोर का विकार बैठ चुका है और ये तब है जब आज नो हॉर्न दिवस है कल से तो, …।


8 Comments

आशीष · April 7, 2008 at 7:54 am

सर नवी मुंबई की ओर घर ले लें, लोकेशन अच्‍छी है, नो हार्न

संजय तिवारी · April 7, 2008 at 9:41 am

जब समाज की ताकत क्षीण होने लगती है तो दिवसों के सहारे हम अपनी प्रासंगिकता खोजने लगते हैं.

Gyandutt Pandey · April 7, 2008 at 10:09 am

जब व्यक्ति और समाज की ताकत क्षीण होने लगती है तो दिवसों के सहारे हम अपनी प्रासंगिकता खोजने लगते हैं.

अनिल रघुराज · April 7, 2008 at 10:31 am

मुझे तो लगता है हर किसी को नीचा समझने की मानसिकता का नतीजा है इस तरह बिना ज़रूरत हॉर्न बजाना। हम औरों का सम्मान नहीं करते। किसी के घर के कूड़ा फेंकना हमारी आदत है। सभी लोग औरों को दबाकर आगे निकल जाने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। ये दिखाता है कि हम आज भी सोच में कितने सामंती हैं। इस सोच पर बड़ी निर्ममता से चोट करने की जरूरत है।

दिनेशराय द्विवेदी · April 7, 2008 at 12:21 pm

साल में एक बार खास दिन दिवस मना कर साल भर के कर्तव्यों की इति श्री कर लेते हैं। वैसे ही जैसे सुबह -सुबह एक बार भगवान का नाम लेने से दिन भर गड़बड़झाले करने का लायसेंस लेते हैं और रात को सोते समय याद कर के उस का धन्यवाद कर देते हैं।

राज भाटिय़ा · April 7, 2008 at 12:24 pm

जिस ने सुधरना हे उसे दिवस की भी जरुरत नही,ओर जो बिगडा हे उसे रोजाना भी कोई दिवस मना कर नही सुधार सकता, हमारे शहर मुनिख मे भारतिया दुता वास हे उन की शिकायत हे जब हम २६ जनवरी, ओर १५ अगस्त मनाते हे तो भारतिया नही आते ? कयो ? क्यो की वो जो यह दिवस मनाते हे हम भारतियो के वास्ते नही उन अग्रेजो के वास्ते जो हमे गुलाम बना कर गये,सारे भाषण अग्रेजी मे तो भाई उन्ही के साथ मनाओ ऎसे दिवस, मनाने का कय लाभ अग्रेजी बोल कर कया अपनी वफ़ा दारी दिखाना चाहते हो ,हम तुम से अलग हे आजाद हे

Udan Tashtari · April 7, 2008 at 1:16 pm

उम्मीद रहती है कि साल भर न सही..आगे पीछे कुछ तो याद रहेगा.

Shiv Kumar Mishra · April 7, 2008 at 1:43 pm

दिवसों का ही तो पता नहीं…रात्रि ही रात्रि है….

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