मेरा छोटा भाई आनंदवर्धन नोएडा के FDDI से रिटेल मैनेजमेंट का कोर्स कर रहा है। कल मेरे जीमेल पर दिखा कि छोटे भाई ने ऑर्कुट पर कुछ स्क्रैप भेजा है। मुझे लगा शायद भैया क्या हाल है। या फिर कुछ ऐसा ही हल्का-फुल्का संदेश होगा। लेकिन, उसका संदेश मुझे अंदर तक हिला गया। पत्रकार होने के नाते ये भ्रम थोड़ा बहुत तो बना ही रहता है कि हम दूसरों से सामाजिक विषयों पर, अपने प्रतीकों के बारे में अपनी राष्ट्रीय अस्मिता या दूसरा सामाजिक मुद्दों पर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। लेकिन, MBA की पढ़ाई कर रहे छोटे भाई के स्क्रैप ने मुझे थोड़ा सुकून भी दिया और चौंकाया भी। मैं तो पत्रकारिता में आने से पहले छात्र राजनीति, सामाजिक आंदोलनों से भी जुड़ा रहा हूं। लेकिन, मेरे छोटे भाई ने तो आज तक किसी राजनीतिक हलचल या सामाजिक आंदोलन में शिरकत नहीं की है। लेकिन, शायद अपने प्रतीकों पर हमला उसे मुझसे ज्यादा खल रहा है। ये पूरा संदेश मैं नीचे डाल रहा हूं।

anand vardhan:
pranam bhaiya read it & think y this happen in INDIA
its a serious matter for all of d INDIANS

Shame on this goverment !!!

Bhagat singh, Rajguru and Sukhdev have been referred as terrorists in an ICSE 6th standard class in social science subject text book at page number 64 & 65 in Mumbai………….
Get up friends…………..
Pass this message like fire……………….
Protest against this………………

………………………………….जय HIND!!! जय HIND!!! जय HIND ……………….

Instead of forwarding stupid messages please forward this message to every1 who is an INDIAN by heart!!!!!

इस संदेश को देखने के बाद मुझे लगा कि सिर्फ करियर बनाने का नाम लेकर हम भले ही नई पीढ़ी को बुरा भला कहें। सच्चाई यही है कि ये नई पीढ़ी हमसे ज्यादा विचारवान है। हर मुद्दे को परख रही है, सोच विचार रही है। अपने प्रतीकों को लेकर संवेदनशील है। ये तो हमसे पहले की पीढ़ी से लेकर अभी तक और हमारे नेताओं की गंदी अगुवाई ने इस देश की चेतना को ग्रहण सा लगा दिया है।


6 Comments

Mired Mirage · February 6, 2008 at 8:29 pm

सही कह रहे हैं आप । नई पीढ़ी भी बहुत सचेत है ।
घुघूती बासूती

Gyandutt Pandey · February 7, 2008 at 12:22 am

संवेदना और चेतनता कभी कोई पीढ़ी अपनी बपौती मान कर दूसरी पीढ़ी को नीचा नहीं दिखा सकती। नयी समस्याओं और चुनौतियों के साथ जैसे नयी पीढ़ी सोचती है – उसकी सराहना की जानी चहिये।

Sanjay · February 7, 2008 at 12:47 am

यदि पुरानी पीढ़ी यह सोचती है कि वह जिम्‍मेदार थी तो यह कैसे भूलती है कि नई पीढी उन्‍हीं से ही तो सीख रही है और काफी कुछ अनुसरण भी करती है… छोटे हमेशा गैरजिम्‍मेदार ही होते हैं या संवेदनशील नहीं हैं, ऐसा सोचना उनके प्रति अन्‍याय है और हमारी तंगसोच का द्योतक भी है.

अनिल रघुराज · February 7, 2008 at 5:34 am

बिलकुल सच है। नयी पीढी अपने साथ साथ देश की पहचान को भी लेकर काफी व्यग्र है।

PD · February 7, 2008 at 11:37 am

मैं भी आपके भाई की पीढी से ही आता हूं और मैंने भी वो मेल पढा और फ़ारवार्ड किया था.. मुझे अपने कालेज की एक घटना याद आ रही है.. कलाम साहब उस समय राष्ट्रपति हुआ करते थे और मेरे कालेज में आये हुये थे.. उनसे मैंने उनके भाषण के अंत में एक प्रश्न पूछा था की भारत की प्रगति में हम कैसे अपना योगदान दे सकते हैं? उनका उत्तर था, “पहले अपनी जिम्मेदारी सही सही निभाओ, और फिर अपने आस-पास जरूरतमंदो की मदद करो..” मैं उनकी ये बात अभी तक नहीं भूला हूं.. शायद कभी नहीं भूलूंगा..

Sanjay Sharma · February 8, 2008 at 10:35 am

युवा की मुठ्ठी से मुद्दा तब फिसलता है जब वरिष्ठों का प्रोत्साहन नही मिल पाता .अब गेंद बड़े भाई के हाथ है ,देखें गेंद गोल पोस्ट तक भी पहुचती है या न्यूज बन कर दम तोड़ती है .

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