अब फिर से बारी बूढ़े शेर बाल ठाकरे की थी। नया नवेला मराठी शेर ‘राज’ करने के लिए बूढ़े शेर की मांद में उसके हिस्से का शिकार निपटाने की तैयारी कर रहा था। शिकार है मराठी वोटबैंक और हथियार है मराठियों की अस्मिता। महाराष्ट्र में राज करने का ये हथियार इतने काम का है कि राज ठाकरे के साथ नाना पाटेकर जैसा अभिनेता भी इस हथियार को धार देने में जुट गया है। जबकि, नाना ऐसे मराठी अभिनेता हैं जिनकी अपील मराठियों से ज्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार के भैया लोगों में है।

नाना के पीछे सलमान, साजिद और दूसरे बॉलीवुड के सितारे अमिताभ बच्चन पर हमले के समय से हम साथ-साथ हैं का राग अलापते-अलापते अब मराठी अस्मिता का हथियार लेकर खड़े हो गए हैं। अब अमिताभ बच्चन क्या सलमान खान से भी कम मुंबईकर हैं। खैर, मैं बात कर रहा था बाल ठाकरे की। ये वो बाल ठाकरे हैं जो, भले ही भाजपा के साथ राज्य से लेकर केंद्र तक की सत्ता में भागीदार रह चुके हैं लेकिन, सच्चाई यही है कि बाल ठाकरे और कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र में एक-दूसरे के हितों को बनाते-बचाते रहे हैं। अब मराठी अस्मिता का हथियार कितने काम का है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चार दशकों से भी ज्यादा समय की ठाकरे परिवार की राजनीति सिर्फ एक बार राज्य की सत्ता का स्वाद दिला पाई है वो, भी भाजपा की मदद से। क्योंकि, भाजपा को देश भर चल रही हिंदुत्व की लहर का फायदा मिला था। लेकिन, ज्यादातर ठाकरे परिवार की मराठी अस्मिता की राजनीति कांग्रेस के लिए राज्य और शिवसेना के लिए बीएमसी की सत्ता का अघोषित सौदा सा बन गया है। वैसे ये सारे लोग मराठियों की उन्नति के लिए ईमानदारी से कितना चिंतित हैं। उसे इस रिपोर्ट से समझा जा सकता है।

अब अगर मराठी-गैर मराठी जहर बोने के ठाकरे परिवार के मंसूबों के राजनीतिक निहितार्थ देखें तो, पार्टियों के लिहाज से कुछ बातें साफ-साफ दिख रही हैं। वोट करने वाले मराठियों में से करीब दस प्रतिशत मराठी ऐसा है जो, मराठी अस्मिता के नाम पर ठाकरे परिवार को आंख मूंदकर समर्थन करता है। उसे ये लगता है कि देश की इस समृद्ध मराठा संस्कृति को उसके हिस्से से बहुत कम मिला है। खासकर राजनीति में इस छोटे से मराठी समुदाय का ये मानना है कि उत्तर प्रदेश, बिहार के नेताओं ने उनके हिस्से से बहुत कुछ छीन लिया है। यही वजह है कि भाजपा का सहयोगी होने के बावजूद जब मराठी प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाने का मौका मिला तो, शिवसेना अपनी भूमिपुत्र की छवि को और पुख्ता करने में कामयाब हो गई।

लेकिन, अब अगर खांटी मराठी वोटबैंक यानी मराठियों के भी सिर्फ दस प्रतिशत लोगों की बात करें तो, वो चाचा-भतीजे की पार्टी में बंटेंगे। और, यही दस प्रतिशत वोटबैंक का बंटवार बूढ़े शेर बाल ठाकरे को पच नहीं रहा है। क्योंकि, वैसे भी भाजपा-शिवसेना की महाराष्ट्र में जो, स्थिति है। इन दोनों के ही पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। भाजपा तो वैसे भी प्रमोद महाजन के जाने के बाद से बिना मुखिया का कमजोर परिवार हो गया है। हाल ये है कि राष्ट्रीय स्तर पर गोपीनाथ मुंडे को छोड़कर राज्य के किसी नेता काम नाम भी लोग नहीं जानते। और, गोपीनाथ मुंडे भी हर दूसरे बयान में अब भी प्रमोद महाजन की आत्मा के सहारे ही राजनीति करते दिखते हैं।

कुल मिलाकर शिवसेना को तो, फिर भी कुछ वोट मिलेंगे और राज्य में मारपीट-उत्पात के जरिए इनकी उपस्थिति बनी रहेगी। लेकिन, मराठी-गैर मराठी विवाद से सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को ही होगा। भाजपा के लिए ये मुद्दा गरम आलू की तरह हो गया है जो, न निगलते बन रहा है और न ही उगलते। आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने की आखिरी उम्मीद दिख रही है इसलिए, वो दिल्ली में बैठकर थोड़ा बहुत राज के खिलाफ बोल लिए। लेकिन, राज्य का कोई नेता चूं तक करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। और, अब तो बाल ठाकरे के खिलाफ आडवाणी भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे। क्योंकि, इस असलियत का अंदाजा उन्हें भी है कि राज्य में खोखली, बिना कार्यकर्ताओं की भाजपा शिवसेना के बिना लोकसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाएगी। वैसे भाजपा को इस विवाद का नुकसान उत्तर प्रदेश-बिहार में भी हो सकता है। क्योंकि, वहां पर लालू, मुलायम, मायावती जैसे क्षेत्रीय नेता भाजपा को इस बात के लिए दोषी ठहराएंगे कि महाराष्ट्र में भाजपा ने उत्तर भारतीयों का सम्मान ठाकरे परिवार के हाथों गिरवी रख दिया।

मराठी- गैर मराठी विवाद की आड़ में एनसीपी चुपचाप अपना आधार बढ़ाने में लगी है। मेरी एक बार एक उत्तर भारतीय पत्रकार से बात हो रही थी जो, मुंबई में कुछ सालों से रिपोर्टिंग कर रहा है। उसका कहना था कि शिवसेना मराठी के नाम पर हल्ला ज्यादा करती है। लेकिन, शिवसेना बीच-बीच में उत्तर भारतीयों को भी पटाने की कोशिश में लगी रहती है। उत्तर भारतीय संघ की बैठकों में अकसर मुस्कुराते उद्धव ठाकरे को अंगवस्त्रम ओढ़ते देखा जा सकता है। संजय निरुपम भले ही अब कांग्रेस में हैं लेकिन, मुंबई का सबसे जाना पहचाना उत्तर भारतीय नेता शिवसेना की ही पैदाइश है। जबकि, एनसीपी से ज्यादा मराठी क्षेत्रीयता की राजनीति शायद ही कोई पार्टी कर पाती हो।

गृह विभाग संभालने वाले आर आर पाटिल भी खुद को खांटी मराठी नेता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। नए साल की पार्टी के बाद छेड़छाड़ के आरोपियों के साथ आए राज ठाकरे से आर आर पाटिल की मुलाकात तो सबको याद होगी ही। शरद पवार और बाल ठाकरे की सबसे बड़ा मराठी नेता बनने की लड़ाई तो जगजाहिर है ही। विदर्भ में किसान मर रहे थे तो, भी भाजपा-शिवसेना एनसीपी का वोटबैंक नहीं छीन पाई। इसी इलाके की बारामती लोकसभा सीट से शरद पवार लोकसभा में जाते हैं लेकिन, शिवसेना-भाजपा इस इलाके की बदहाली के लिए पवार को जिम्मेदार तक नहीं ठहरा पाई। जबकि, कर्ज माफी का ऐलान होते ही चिदंबरम, सोनिया, मनमोहन को धन्यवाद देने वाले बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए एनसीपी ने इसका सारा क्रेडिट अपने मुखिया शरद पवार को दे दिया। और, साफ तौर पर एनसीपी को इसका बड़ा फायदा होता दिख रहा है।

लेकिन, मराठी-गैर मराठी विवाद का असली ब्लूप्रिंट कांग्रेस मुख्यालय से ही बनकर निकल रहा है। प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन देने के बाद सारे अखबारों में छपी बाल ठाकरे के साथ मुख्यमंत्री देशमुख की मुस्कुराती हुई फोटो शायद ही अब लोगों को याद हो। देशमुख ने पहले राज को पूरी आग भड़काने की इजाजत दी और शिवराज पाटिल, श्रीप्रकाश जायसवाल को सोनिया ने उत्तर भारतीयों की सुरक्षा का भरोसा देने के लिए लगा दिया। और, अभी ये विवाद कांग्रेस कम से कम तब तक तो जिंदा रखना ही चाहेगी जब तक महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के ऐलान न हो जाएं। और, फिर अगले साल मई में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। हो सकता है थोड़ा पहले ही हो जाएं।

कुल मिलाकर राज ठाकरे और बाल ठाकरे जितना आग उगलेंगे, उस आग में विलासराव देशमुख की कुर्सी का आधार और मजबूत होगा। ठाकरे परिवार के लिए अच्छी बात ये है कि देशमुख से कमजोर मुख्यमंत्री शायद ही कोई और मिले। लेकिन, अपनी कुर्सी के लिए वोटबैंक की राजनीति में देशमुख की महारत की आने वाले दिनों में मिसाल दी जाए तो, गलत नहीं होगा। मराठी अस्मिता की लड़ाई के बीच जे डी विरकर का नाम डीजीपी के लिए तय होने के बाद एक गैर मराठी ए एन राय को महाराष्ट्र का डीजीपी बना दिया गया। हसन गफूर मुंबई के दूसरे मुस्लिम पुलिस कमिश्नर हैं। इन दोनों अधिकारियों की काबिलियत पर किसी को शक नहीं होना चाहिए। लेकिन, राज्य के दो सबसे जिम्मेदार पदों पर हुई ये नियुक्तियां और इनसे जुड़े समीकरण सिर्फ इत्तफाक तो नहीं हो सकते। अगर ये समीकरण बने रह गए तो, कम से कम एक राज्य में तो, कांग्रेस सत्ता में फिर लौटती दिख रही है। महाराष्ट्र का सारा चुनाव चाचा-भतीजा और देशमुख समीकरण पर होगा।


2 Comments

दीपक भारतदीप · March 6, 2008 at 4:13 am

आपका ब्लोग देखा. लार्ड मैकाले द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को आज भी हम ढो रहे हैं यह विचार मेरा भी है. यहाँ क्लर्क और नौकर पैदा हो रहे हैं और वह ढो रहे हैं बोझा पुराने बडे लोगों की पीढियों का बोझ. आप और हम ख्याल हैं और आपकी बढिया पोस्ट देखकर ही मैं आपकी इस बात से असहमत हूँ कि इस ब्लोग जगत पर सब खराब लिखा जा रहा है. लिखते रहिये.
दीपक भारतदीप

दीपक भारतदीप · March 6, 2008 at 4:13 am

आपका ब्लोग देखा. लार्ड मैकाले द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को आज भी हम ढो रहे हैं यह विचार मेरा भी है. यहाँ क्लर्क और नौकर पैदा हो रहे हैं और वह ढो रहे हैं बोझा पुराने बडे लोगों की पीढियों का बोझ. आप और हम ख्याल हैं और आपकी बढिया पोस्ट देखकर ही मैं आपकी इस बात से असहमत हूँ कि इस ब्लोग जगत पर सब खराब लिखा जा रहा है. लिखते रहिये.
दीपक भारतदीप

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